आमतौर पर जब हम रेल्वे स्टेशन पर किसी गाड़ी की प्रतीक्षा करे रहे होते हैं
तो समय काटना मुश्किल लगने लगता है। खासकर तब जब गाड़ी देर से आने वाली हो। ऐसे
में आपके पास सिवाय मक्खियां उड़ाने के और कोई काम नहीं होता। अगर कोई आपको सीऑफ
करने आया है या आप किसी को सीऑफ करने आए हैं तब भी कई बार बातों का कोटा खत्म हो
जाता है और केवल अगल-बगल झांकते ही नजर आते हैं। वैसे आजकल रेल्वे स्टेशनों पर
टीवी स्क्रीन भी समय काटने का एक साधन होते हैं। पर वे हमारी मूक फिल्मों के
जमाने को याद दिलाते हैं। क्योंकि आमतौर पर उन पर केवल चित्र ही दिखाई देते हैं,
आवाज अगर होती भी है तो वह दो-तीन रेडियो स्टेशनों के एक-साथ चलने पर आने वाली
आवाज की तरह। बहरहाल....।
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Saturday, November 3, 2012
Tuesday, July 17, 2012
अराजक मानसिकता
| चित्रकार : एम एस मूर्ति, बंगलौर सिटी रेल्वे स्टेशन की चित्र गैलरी से |
प्रख्यात शिक्षाविद् और एनसीईआरटी के डायरेक्टर रहे
प्रोफेसर कृष्ण कुमार विभिन्न विषयों पर लिखते भी रहते हैं। शिक्षा के क्षेत्र
में कार्यरत संस्था एकलव्य ने कृष्ण कुमार के लेखों और टिप्पणियों का संग्रह ‘दीवार
का इस्तेमाल और अन्य लेख’ कुछ बरस पहले प्रकाशित किया था।
उसके विमोचन के अवसर पर मैंने संग्रह की एक टिप्पणी
को आधार बनाते हुए एक लेख लिखा था,लेकिन वह कहीं प्रकाशित नहीं हुआ। गौहाटी की
घटना से वह लेख याद हो आया। लेख का संपादित अंश यहां प्रस्तुत है।
(यह लेख 9 अगस्त को नई दुनिया में एंग्री युवा और ट्रेंडस शीर्षक से इस ब्लाग से लेकर प्रकाशित किया गया है।)
(यह लेख 9 अगस्त को नई दुनिया में एंग्री युवा और ट्रेंडस शीर्षक से इस ब्लाग से लेकर प्रकाशित किया गया है।)
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