Saturday, November 14, 2009

एक जन्‍मदिन ऐसा भी


साल 2000 के अक्‍टूबर के दिन थे। एकलव्‍य का कार्यालय अरेरा कालोनी के ई-1/25 में था।  शाम के साढ़े सात बजे रहे थे। बाकी सब लोग जा चुके थे। मैं रोज की तरह अपने काम में व्‍यस्‍त था। मैंने अपने कमरे के दरवाजे पर एक मधुर और विनम्र आवाज सुनी,’क्‍या हम अंदर आ सकते हैं।‘ मैंने देखा एक उम्रदराज पुरूष और महिला वहां खड़े हैं। मैंने कहा आइए और अभिवादन के साथ उन्‍हें बैठने का इशारा किया।

औपचारिक बातचीत के बाद उन्‍होंने आने का मकसद बताया। वे थे प्रेम सक्‍सेना और उनकी पत्‍नी श्रीमती शंकुलता सक्‍सेना। प्रेमजी बीएचईएल से सेवानिवृत हैं और शंकुतला जी कार्मेल कान्‍वेट स्‍कूल में अध्‍यापिका थीं। अब वे भी सेवानिवृत हो गई हैं।  

उन दिनों भोपाल के आंचलिक विज्ञान केन्‍द्र में एकलव्‍य के प्रकाशनों की एक प्रदर्शनी चल रही थी। उस प्रदर्शनी को देखने सक्सेना दम्‍पति भी गए थे। उनके साथ उनकी चार साड़े चार साल की नातिन शुभि भी थी। प्रदर्शनी में एकलव्‍य के स्‍टाल पर छोटी-छोटी कहानियों की लोकप्रिय किताबें तीन साथी,दो तोते और हलीम चला चांद पर भी थीं। रूसी-पूसी सीरिज की किताबें भी थीं। ये सब किताबें शुभि ने पसंद की तो प्रेमजी खरीदकर ले गए। 
ये किताबें और उनकी कहानियां शुभि को इतनी पसंद आईं कि वो इन्‍हें अपने तकिए के नीचे रखकर सोती थी। रात को जब भी उसकी नींद खुलती किताबें लेकर बैठ जाती। पढ़ना उसे नहीं आता था, पर अपने दादा-दादी से सुनी कहानी के आधार पर वह बोल-बोलकर पढ़ती। और कभी-कभी दादा-दादी को नींद से जगाकर सुनाने के लिए कहती। दादी-दादा शुभि की इस दीवानगी से चकित थे। पर उतने नहीं जितने मैं और आप यह बात सुनकर हो रहे होंगे ।

असल में शुभि कविताएं भी करती थी। वो कविताएं बोलती और दादी अपनी डायरी में उसे लिपिबद्ध कर लेंती। दादी की डायरी में उसकी कुछ बीस-पच्‍चीस कविताएं एकत्रित थीं। दादा-दादी भी कविताएं करते हैं। दादाजी तो एक जमाने में मंच पर कविताएं सुनाए करते थे। खैर। शुभि कुछ दिनों में पांच साल की होने वाली थी। दादा-दादी के मन में एक अनोखा विचार आया कि क्‍यों न शुभि के पांचवें जन्‍म दिन पर उसकी कविताओं का एक संग्रह प्रकाशित किया जाए। बस वे इसी सिलसिले में एकलव्‍य आ पहुंचे थे। एकलव्‍य की उन छोटी किताबों को देखकर उन्‍हें लगा कि एकलव्‍य से इस बारे में जरूर कुछ मदद मिलेगी।

मैं बच्‍चों की पत्रिका चकमक में काम कर रहा था। शुभि के बारे में सुनकर और उसके ऐसे अनोखे दादा-दादी से मिलकर सचमुच अभिभूत था। मैं इस काम के लिए तुरंत तत्‍पर हो गया। हालांकि मैंने उन्‍हें यह सुझाव दिया था कि वे संग्रह की जगह अगर एक कैलेंडर प्रकाशित करें तो उसका ज्‍यादा प्रभाव होगा। क्‍योंकि किताब तो अंतत: कहीं अलमारी में बंद हो जाती है या दब जाती है। कैलेंडर कम से कम साल भर दीवार पर टंगा रहता है। पर सक्‍सेना दम्‍पति चाहते थे कि संग्रह ही प्रकाशित हो। मैंने कहा ठीक है।

22 कविताओं का चयन किया गया। मजेदार बात यह कि इन कविताओं के लिए चित्र शुभि ने ही बनाए हैं। किताब का साइज सोचा गया। किताब की डिजायन और ले आउट के लिए मेरे दिमाग में शिवेन्‍द्र पांडिया का नाम आया। शिवेन्‍द्र पांडिया आज भोपाल के जानेमाने लेआउट  डिजायनर हैं। शुरूआत उन्‍होंने जब वे आठवीं में पढ़ते थे तो चकमक से की थी। चकमक के लिए वे काम कर ही रहे थे। मैंने शिवेन्‍द्र से बात की । वे भी तुरंत तैयार हो गए। प्रेमजी ने कह‍ दिया था कि इस संग्रह के प्रकाशन में जो भी खर्चा होगा उसका इंतजाम वे कर लेंगे।

शुभि का पांचवां जन्‍मदिन 6 जनवरी,2001 को था। उसके पहले संग्रह तैयार होना था। योजना यह थी कि जन्‍मदिन के कार्यक्रम में ही संग्रह का विमोचन किया जाएगा। किसी बच्‍चे के जन्‍मदिन पर किताब का विमोचन। यह मैं पहली बार ही सुन रहा था। सुन क्‍या रहा था अब तो उसे साकार होते देख रहा था। मेरे लिए सबसे खुशी की बात तो यह थी कि मैं इस आयोजन का हिस्‍सा था। किताब का डिजायन बना,लेआउट हुआ। शुभि के बनाए चित्र डाले गए। डमी बनी। अतंत: संग्रह ने अंतिम रूप लिया। संग्रह का आवरण बहुरंगी रखा गया और अंदर की छपाई ब्‍लैक एंड व्‍हाइट । छापने के लिए आदर्श प्रिंटर्स को चुना गया। आखिरकार शुभि की कविताओं का संग्रह छपकर आ गया।

लेकिन मेरे लिए अभी एक सरप्राइज बाकी था। ऐसे अनोखे जन्‍मदिन समारोह में तो मुझे जाना ही था,लेकिन प्रेमजी ने मुझसे आग्रह किया कि किताब का विमोचन भी मैं ही करूं। मना करने का तो प्रश्‍न ही नहीं था।


      (यहां चित्र में बाएं से दाएं राजेश उत्‍साही,शुभि के मम्‍मी-पापा और दादी-दादा हैं। बीच में आंखें बंद किए शुभि हैं।)



तो छह जनवरी की उस शाम को शुभि ने अपनी पांचवीं वर्षगांठ मनाई और जन्‍मदिन मनाने वालों को एक नई राह भी सुझाई। संयोग से 13 नवम्‍बर को मेरा जन्‍मदिन था। जन्‍मदिन पर मुझे यह अनोखा जन्‍मदिन समारोह याद आया। और दूसरे संयोग से आज बालदिवस है तो मैंने सोचा इस का जिक्र अपने ब्‍लाग पर करने का इससे अच्‍छा दूसरा दिन नहीं होगा।




शुभि के इस संग्रह की कुछ कविताएं यहां प्रस्‍तुत हैं। फिलहाल मैं शुभि के बनाए चित्र नहीं दे पा रहा हूं। बाद में कभी संभव हुआ तो कोशिश करूंगा।

।।कुर्सी में फंसे भगवान।।

एक थे भगवान
वो कुर्सी में
फंसे ही रहते

और मुन्‍नू-चुन्‍नू
उनके मटके में पानी
भर देती थी

जो टपकता रहता
उनके ऊपर पानी
तब वो नहा भी लेते थे
और चुन्‍नू से
खुश होकर
सो जाते थे।

।।घड़ी।।
टिक-टॉक
टिक-टॉक
घड़ी बोली
घड़ी बोलकर
रूक जाती
रूक रूक कर
वो समय बताती

कभी उसमें छ: बजते

कभी बजाती बारह

और कभी

पौने बारह


।।प्रदर्शनी।।
एक दिन मैं
देखने गई प्रदर्शनी

कीड़े-मकोड़े थे
उसी दिन मुझे
काटा था मधुमक्‍खी ने

प्रदर्शनी में हमें
ग्रासहॉपर दिखा

वो टेड़ा-मेड़ा मुंह करके
मुझे ही देखे जा रहा था।

।।सूखा मेरा देश।।
एक देश
मेरा सूखा-सूखा

उसमें एक बच्‍चा
प्‍यासा प्‍यासा

वो
कुएं में पानी
पीने जाता

तब उसने देखा
झुककर
पानी-मानी कुछ नहीं है
बच्‍चू ऐसा ही वापस आ जाता।



Sunday, November 8, 2009

अलविदा बिस्‍वास साहब !


हिमांशु बिस्‍वास यानी एचके बिस्‍वास यानी बिस्‍वास साहब यानी बाबा नहीं रहे। 7 नवम्‍बर की सुबह भोपाल से कार्तिक ने मोबाइल पर यह सूचना दी। 6 नवम्‍बर की रात लगभग दस बजे से साढ़े दस बजे के बीच उन्‍होंने आखिरी सांस ली। पिछले कुछ समय से वे बीमार चल रहे थे। इस 20 नवम्‍बर को वे 86 साल पूरे करके 87 वें वर्ष में प्रवेश करते।

1980 के आसपास वे भोपाल के भारत हैवी इलेक्ट्रिकल लिमिटेड से वे प्रिटिंग मैनेजर के पद से सेवानिवृत हुए थे। स्‍क्रीन प्रिटिंग उनका शौक भी था और आय का साधन भी। वे घर में ही विजिटिंग कार्ड बनाया करते थे। बस उसी सिलसिले में एक दिन घूमते हुए एकलव्‍य, भोपाल के कार्यालय जा पहुंचे। तब एकलव्‍य अरेरा कालोनी के ई-1 में अर्जुन तरण पुष्‍कर के सामने 208 में होता था। एकलव्‍य में किसी ने विजिटिंग कार्ड  बनवाने में रूचि नहीं दिखाई। पर हां, बिस्‍वास साहब में जरूर दिखाई। उन दिनों यानी 1985 में चकमक पत्रिका निकालने की तैयारी चल रही थी। चकमक के प्रशासनिक कामों खासकर वितरण और मार्केटिंग के  लिए एक अनुभवी व्‍यक्ति की जरूरत थी। बस वे भी चकमक का हिस्‍सा हो गए। 

ऊंचे पूरे बंगाली बाबू अपनी लाल रंग की मैजेस्टिक लूना पर बैठकर एकलव्‍य आया करते थे। लंबे होने के कारण चलते वक्‍त उनकी कमर पर हल्‍का सा झुकाव आता था। उनके मुंह से बंगाली अंदाज में हिन्‍दी सुनना बहुत अच्‍छा लगता था। वे हंसते तो उनकी हंसी देर तक गूंजती रहती। एक कान से उन्‍हें थोड़ा कम सुनाई देता था,सो वे कान में मशीन लगाते थे। इसलिए कभी किसी वाक्‍य या शब्‍द को सुनने के लिए वे अपनी गरदन थोड़ी तिरछी करके अपनी आंखें फैला देते। चश्‍मे से झांकती उनकी बड़ी-बड़ी आंखें और बड़ी लगने लगतीं। जहां तक मुझे याद पड़ता है वे मैं शब्‍द का उपयोग बहुत कम करते थे। उनके मुंह से हम ही ज्‍यादा निकलता था।  

चकमक को रेल्‍वे स्‍टेशन पर व्‍हीलर बुक स्‍टाल पर रखने की बात चली तो मैं और बिस्‍वास साहब व्‍हीलर के मालिकों से मिलने इलाहाबाद गए थे। और फिर कुछ पुरानी किताबें खरीदने इंडियन प्रेस भी।

नब्‍बे–इक्‍यानवें के आसपास उन्‍होंने चकमक छोड़ दी थी। उनका स्‍वास्‍थ्‍य ठीक नहीं रहने लगा था। पर बिस्‍वास साहब की छोटी बिटिया टुलु यानी टुलटुल उनके साथ कभी-कभी एकलव्‍य आया करती थी। चकमक के पहले अंक का जब लोकापर्ण हुआ तो टुलटुल दसवीं में पढ़ती थी। लोकापर्ण समारोह में चकमक की प्रतियां टुलटुल ने ही मुख्‍य अतिथि के सामने प्रस्‍तुत की थी़। बिस्‍वास साहब ने एकलव्‍य आना छोड़ दिया, लेकिन टुलटुल ने जारी रखा। नतीजा यह कि टुलटुल बाद में चकमक की संपादकीय टीम की सदस्‍य बनी।

बिस्‍वास साहब चलती-फिरती वर्कशाप थे। कागज से,मिटटी से,कबाड़ी चीजों से वे तरह-तरह के खिलौने और  माडल बनाते थे। वे किताबों में नए-नए खिलौने ढूंढते रहते और जब कोई खिलौना पसंद आ जाता तो उसे बनाकर ही दम लेते। उनके बनाए खिलौनों में से कुछ हमने चकमक में भी छापे थे। स्‍क्रीन प्रिटिंग तो वे जानते ही थे। फोटोग्राफी का भी उन्‍हें शौ‍क था। उनके खींचे कुछ फोटो भी चकमक में प्रकाशित किए थे।  एकलव्‍य में उन्‍होंने स्‍क्रीन प्रिटिंग का पूरा सामान जुटाया था और कुछ लोगों को सिखाया भी था। फोटो डेवलप करने के लिए ऑफिस के एक बाथरूम को उन्‍होंने डार्करूम में बदल डाला था।  

बिस्‍वास साहब की न जाने कितनी बातें हैं जो याद आ रही हैं। पर एक घटना मुझे अक्‍सर याद आती है। चकमक में गांव के किसी बच्‍चे ने एक लोकगीत लिखकर भेजा था। गीत दिअर्थी शब्‍दों वाला था। संभवत: गीत भेजने वाला बच्‍चा भी यह बात नहीं जानता था। चकमक के संपादक रेक्‍स डी रोजारियो को यह गीत बेहद पसंद आया था। वे उसे चकमक में छापना चाहते थे। मैं उनकी राय से सहमत नहीं था और मैंने  प्रतिरोध किया था। संपादक जी ने पूरी चकमक टीम के सामने वह गीत रखा और पूछा कि बताएं लोग क्‍या सोचते हैं। बाकी सब लोगों ने गोलमोल जवाब दिए थे। पर बिस्‍वास साहब का जवाब मुझे आज भी याद है। उन्‍होंने कहा था कि 'हर चीज को पढ़ने की एक उम्र होती है। मुझे नहीं लगता कि यह गीत बच्‍चों को पढ़ने के लिए दिया जाना चाहिए।' बात केवल यहीं नहीं रूकी। वह गीत एकलव्‍य के कुछ और लोगों को भेजा गया। उन्‍होंने क्‍या कहा मुझे नहीं पता। पर अंतत: वह गीत चकमक में नहीं छपा।

गीत से याद आया कि चकमक के पहले अंक में छपा मेरा गीत आलू मिर्ची चाय जी बच्‍चों के बीच बहुत लोकप्रिय हुआ था। पिछले कुछ दिनों से वे मुझे उस गीत के जरिए ही याद रखते थे। वे मुझे देखकर कहते आलू मटर जी। बिस्‍वास साहब भोपाल में अरेरा कालोनी के ई-7 सेक्‍टर में रहते थे। कुछ संयोग ऐसा हुआ कि मेरा परिवार भी 2002 उनके घर के पास ही रहने लगा था। वे सुबह-सुबह घूमने जाते थे और मैं छोटे बेटे को छोड़ने स्‍कूल। अक्‍सर उनसे मुलाकात हो जाती। पिछले लगभग एक डेढ़ साल उनका सुबह का घूमना कम हो गया था। अपने आपको कैसे चुस्‍त दुरूस्‍त रखें इसके लिए वे सदा सतर्क रहते थे। योग करते थे। मेरी पत्‍नी निर्मला योग सिखातीं हैं। जब निर्मला से भेंट होती तो वे योग आसनों के बारे में पूछते और बताते भी।


पिछले साल जब वे अस्‍पताल में भर्ती थे तो मैं उनसे मिलने गया। वहां उन्‍होंने जिक्र किया कि निर्मला ने योग की किसी किताब की प्रति देने का वादा किया था। पर वह किताब उन्‍हें अब तक नहीं मिली। मैंने उनसे वादा किया कि मैं किताब लाकर उन्‍हें दूंगा। फिर मैं भी भूल गया। एक दिन जब शाम को घर पहुंचा तो पता चला कि बिस्‍वास साहब किताब लेने आए थे। मुझे बहुत शर्मिन्‍दगी महसूस हुई कि मैंने वादा करके भी नहीं निभाया। असल में किताब की प्रति निर्मला के पास भी नहीं थी। अंतत: अगले दिन मैंने किसी तरह किताब की एक प्रति ढूंढकर बिस्‍वास साहब तक पहुंचायी। किताब पाकर वे बहुत प्रसन्‍न हुए।

मैं दिवाली पर भोपाल गया था। अक्‍टूबर की 22 तारीख की शाम को ही उनसे मिला था। उनका चलना-फिरना बंद था। अपने तख्‍त पर लेटे-लेटे उन्‍होंने अपने पुराने अंदाज में ही आलू मटर जी कहकर मुझे पहचाना। गोलू-मोलू (मेरे बेटे) के बारे में पूछा,निर्मला के बारे में पूछा। यह भी संयोग ही था कि उसी दिन मैंने एकलव्‍य में अपना औपचारिक इस्‍तीफा लिखकर दिया था। मालूम नहीं था कि बिस्‍वास साहब से भी आखिरी मुलाकात हो रही है। और मालूम भी क्‍योंकर होता। क्‍योंकि चलते समय मैंने जब उनसे हाथ मिलाकर कहा कि फिर मिलेंगे। तो उनकी सफेद दाढ़ी में से झांकते होंठों पर वही मुस्‍कान थी और हाथ में वही मजबूत पकड़ जो जीने की उत्‍कंठा से भरे किसी व्‍यक्ति में होती है। लगता नहीं था कि वे इतनी जल्‍दी अलविदा कह देंगे। सच कहूं तो उनके हाथ कि गर्मी मैं अभी तक महसूस कर रहा हूं।

बिस्‍वास साहब आपको बहुत-बहुत सलाम । 

 (बाबा के दोनों फोटो राजेश खिन्‍दरी के सौजन्‍य से। प्रसंगवश यह उल्‍लेखनीय है कि राजेश बाबा के दामाद यानी टुलटुल के पति हैं।)

Wednesday, October 14, 2009

नाजिम हिकमत की कविताएं


बंगलौर आकर मैंने अपने ब्‍लाग गुल्‍लक को सक्रिय करने की कोशिश की। गुल्‍लक के मार्फत ही एक नए दोस्‍त  मिले दिनेश श्रीनेत। यहां वनइंडिया के हिन्‍दी पोर्टल के संपादक थे। थे इसलिए कह रहा हूं कि इस महीने की पहली तारीख को ही उन्‍होंने कानपुर में जागरण में नई जिम्‍मेदारी संभाल ली है। वहां भी उन्‍हें हिन्‍दी पोर्टल पर ही काम करना है। दिनेश ने ही मुझे इस बात के लिए उकसाया कि मैं वनइंडिया के लिए शिक्षा के मुद्दों पर जनसंवाद में लिखूं। मैंने लिखा और अब भी लिख रहा हूं।

एक दिन दिनेश अपने घर ले गए थे। उनके घर की दिलचस्‍प यात्रा के बारे में मैंने अपने दूसरे ब्‍लाग यायावरी में लिखा है। वहां उनकी किताबों की अलमारी में मुझे ऐसी बहुत सी किताबें दिखीं,जिन्‍हें मैं पढ़ना चाहता था। एक किताब मैं साथ ले आया। यह है बीसवीं सदी के महान क्रांतिकारी तुर्की कवि नाजिम हिकमत की कविताओं का हिंदी अनुवाद ‘देखेंगे उजले दिन’। कविताओं का चयन और अनुवाद सुरेश सलिल जी ने किया है। यह संग्रह 2003 में मेधा बुक्‍स से प्रकाशित हुआ है। संग्रह में तिरपन कविताओं के साथ नाजिम हिकमत का विस्‍तृत परिचय भी है। 

नाजिम हिकमत को मैं उनकी दो कविताओं की वजह से जानता रहा हूं। पहली है- ‘तुम्‍हारे हाथ और उनके झूठ’। इस कविता का पहला हिस्‍सा हम लोगों ने  1987 में चकमक बाल विज्ञान पत्रिका के एक अंक में पोस्‍टर कविता के रूप में प्रकाशित किया था। चकमक का यह अंक हाथ पर केन्द्रित था। दूसरी कविता है- ‘पॉल राब्‍सन के लिए’। यह कविता गीत के रूप में जनांदोलन में बहुत गाई जाती रही है। यूं नाजिम की कई अन्‍य कविताएं लघु पत्रिकाओं में पढ़ने को मिलती रही हैं। पर एक साथ इतनी कविताओं को एक जगह पढ़ने का यह मेरा पहला मौका था।

संयोग कुछ ऐसा हुआ कि दिनेश भाई को यह संग्रह मैं चाहकर भी वापस नहीं कर पाया और वे कानपुर चले गए। मुझे पता है कि यह संग्रह दिनेश के लिए बहुत महत्‍व रखता है।

बहरहाल मैं जब भी संग्रह उठाता हूं उसे छोड़ने का मन नहीं करता । हर कविता हर बार एक नए अर्थ में सामने आती है। यह कमाल सुरेश सलिल जी के अनुवाद का भी है। संग्रह के फ्लैप पर लिखा है, ‘ कविता के रसज्ञ के नाते हमारी यह इच्‍छा तो रहती ही है कि किसी कविता के अनुवाद में उसके कवि का खास अपना स्‍वर भी बजता हुआ भावक को सुनाई दे। ’ इसी में आगे लिखा है, ‘ यहां हिंदी के उस श्रोता समाज को भी ध्‍यान में रखा गया है जिसका कविता-मात्र से भले ही कोई खास लेन-देन न हो,भाषा पर जिसकी पकड़ न हो, लेकिन जो भावनाओं के आवेग को पहचानता है और उस पर प्रतिक्रिया भी करता है।’ मुझे लगता है संग्रह दोनों ही कसौटियों पर खरा उतरता है।


यहां इस संग्रह से कुछ कविताएं साभार प्रस्‍तुत हैं।

।। मेरी शायरी।।

चांदी की काठी वाला घोड़ा नहीं है मेरे पास सवारी के लिए
नहीं है गुज़ारे के लिए कोई विरासत
ज़र न ज़मीन
कुल जमा शहद की एक हांडी है मेरे पास
आग की लपटों जैसे शहद की हांडी।


मेरा शहद ही मेरा सब कुछ है
सभी किस्‍म के कीड़े-मकोड़ों से
हिफ़ाजत करता हूं मैं अपने ज़र-ज़मीन की
मेरा मतलब अपनी शहद की हांडी की।
ज़रा ठहरो,बिरादर
मेरी हांडी में जब तक शहद है
टिम्‍बकटू से भी आएंगी
मधुमक्खियां उसके पास।


।।बीसवीं सदी।।
’जानेमन आओ अब सो जाएं
और जगें सौ साल बाद’

नहीं
मैं भगोड़ा नहीं
अलावा इसके,अपनी सदी से मैं भयभीत नहीं।
मुसीबतों की मारी मेरी यह सदी
शर्म से झेंपी हुई
हिम्‍मत से भरी हुई मेरी यह सदी
बुलंद और दिलेर

मुझे कभी अफसोस नहीं हुआ
कि क्‍यों इतनी जल्‍दी पैदा हो गया।

बीसवीं सदी में पैदा हुआ
फ़ख्र है इसका मुझे
जहां भी हूं अपने लोगों के बीच हूं,काफी है मेरे‍ लिए
और यह कि एक नई दुनिया के लिए मुझे लड़ना है


‘जानेमन सौ साल बाद’
मगर नहीं,पहले ही उसके और सब कुछ के बावजूद
मरती और फिर-फिर पैदा होती हुई मेरी सदी
मेरी सदी,जिसके आखिरी दिन ख़ूबसूरत होंगे
सूरज की रोशनी जैसी खुल-खुलेगी मेरी सदी
जानेमन,तुम्‍हारी आंखों की तरह।
(1941)

।।हल्‍की हरी हैं मेरी महबूबा की आंखें।।
हल्‍की हरी हैं मेरी महबूबा की आंखें
हरी
जैसे अभी अभी सींचा हुआ
तारपीन का रेश्‍मी दरख्‍त
हरी
जैसे सोने के पत्‍तर पर
हरी मीनाकारी

ये कैसा माजरा, बिरादरान,
कि नौ सालों के दौरान
एक बार भी उसके हाथ
मेरे हाथों से नहीं छुए।

मैं यहां बूढ़ा हुआ
वह वहां।
मेरी दुख्‍तर-बीवी
तुम्‍हारी गुदाज़-गोरी गर्दन पर
अब सलवटें उभर रहीं हैं।

सलवटों का उभरना
इस तरह नामुमकिन है हमारे लिए
बूढ़ा होना।
जिस्‍म की बोटियों के ढीले पड़ने को
कोई और नाम दिया जाना चाहिए,

उम्र का बढ़ना
बूढ़ा होना
उन लोगों का मर्ज़ है जो इश्‍क नहीं कर सकते।
(1947)


।। तुम्‍हारे हाथ।।
तुम्‍हारे हाथ
पत्‍थरों जैसे मजबूत
जेलखाने की धुनों जैसे उदास
बोझा खींचने वाले जानवरों जैसे भारी-भरकम
तुम्‍हारे हाथ जैसे भूखे बच्‍चों के तमतमाए चेहरे


तुम्‍हारे हाथ
शहद की मक्खियों जैसे मेहनती और निपुण
दूध भरी छातियों जैसे भारी
कुदरत जैसे दिलेर तुम्‍हारे हाथ,
तुम्‍हारे हाथ खुरदरी चमड़ी के नीचे छिपाए अपनी
दोस्‍ताना कोमलता।

दुनिया गाय-बैलों के सींगों पर नहीं टिकी है
दुनिया को ढोते हैं तुम्‍हारे हाथ।
(‘तुम्‍हारे हाथ और उनके झूठ’ कविता का एक हिस्‍सा,1949)



।।यही तो सवाल है।।
दुनिया की सारी दौलत से पूरी नहीं हो सकती उनकी हवस
चाहते हैं बनाना वे ढेर सारी रकम
उनके लिए दौलत के अंबार लगाने के लिए
तुम्‍हें मारना होगा औरों को,खुद भी मरना होगा दम-ब-दम।

झांसा पट्टी में उनकी आना है?
या धता बताना है?
तुम्‍हारे सामने यही तो सवाल है!
झांसें में न आए तो जियोगे ता-क़यामत
और अगर आ गए तो मरना हरहाल है।
(1951)(लंबी कविता का एक अंश)
(नाजिम में ज़ इस तरह होना चाहिए। पर यहां कम्‍प्‍यूटर की तकनीक की वजह से यहां ज़ में ि‍ मात्रा लगाते ही नुक्‍ता गायब हो जाता है। कृपया नाजिम को नुक्‍ते के साथ ही पढ़ें।)
 
   

Saturday, September 26, 2009

मदद के लिए आगे आएं




अनिल सरगर मेरे पुराने साथी हैं। वे एकलव्‍य संस्‍था में काम करते हैं जो कि मध्‍यप्रदेश में शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रही है। वे मध्‍यप्रदेश के बैतूल जिले के शाहपुर कस्‍बे में रहते हैं। हाल ही में उनका एक मेल मुझे मिला जो उनके और मेरे एक और साथी निदेश सोनी ने सबको भेजा है। वे एक विकट समस्‍या से जूझ रहे हैं। उनकी समस्‍या उनके ही शब्‍दों में कुछ इस तरह है,
’मेरा पुत्र हर्षित(ऊपर चित्र में) सात वर्ष का है और मेरी पुत्री 22 माह की है। दोनों ही बच्‍चों को जन्‍म के समय पीलिया हो गया था। पीलिया का इलाज नागपुर में करवाया था। इलाज के दौरान दोनों का ही खून बदलना पड़ा था। दोनों के इलाज में लगभग एक लाख चालीस हजार रुपए का खर्च आया है। फिर भी दोनों बच्‍चे सामान्‍य नहीं हो पाए हैं।
दोनों को इंदौर के चौइथराम अस्‍पताल में डाक्‍टर पासी को दिखाया है। दोनों बच्‍चों के कानों में समस्‍या है। हर्षित केवल 20 प्रतिशत ही सुन पाता है। वह बोलता भी नहीं है। जबकि पायल के कान केवल 5 प्रतिशत ही सुन पाते हैं। पायल अपने शरीर का संतुलन भी नहीं बना पाती है। वह पूरे समय बिस्‍तर पर ही लेटी रहती है। डाक्‍टर की सलाह पर हर्षित के लिए श्रवण मशीन की व्‍यवस्‍था की है।
लेकिन पूरी तरह से ठीक करने के लिए डाक्‍टरों का कहना है कि बच्‍चों के कान का ऑपरेशन करना पड़ेगा। एक बच्‍चे के ऑपरेशन पर लगभग सात लाख रुपए का खर्चा आएगा। यह खर्चा वहन करना मेरी क्षमता के बाहर है। मेरा आप सबसे अनुरोध है कि कृपया मेरी मदद करें। ‘
निश्चित ही सात लाख रुपए के हिसाब से दो बच्‍चों के इलाज पर पंद्रह लाख से ज्‍यादा का खर्चा आएगा। हम जैसे सामान्‍य लोगों के लिए यह राशि जुटाना सपना देखने जैसा है। पर कहते हैं कि उम्‍मीद पर आसमान टिका है। मैं यही सोचकर यह अपील यहां डाल रहा हूं कि अनिल की मदद कैसे की जा सकती है इस पर विचार करें। अगर ऐसे बच्‍चों के इलाज के लिए कोई संस्‍थाएं या ट्रस्‍ट आदि काम कर रहे हैं, तो उनकी जानकारी भी अनिल के लिए उपयोगी होगी।

अनिल तथा उनके बच्‍चों के बारे में अधिक जानकारी के लिए anil.sargar@yahoo.co.in पर मेल किया जा सकता है। या उनसे मोबाइल नंबर 91-9425608760 पर बात की जा सकती है।
 

Monday, September 14, 2009

शिक्षा की खलनायिका : दो और टिप्‍पणियां

इस लेख का आशय यह कतई नहीं है कि शिक्षक समुदाय को नीचा दिखाया जाए। उद्देश्‍य केवल यह है कि हम सब इस बात के प्रति संवेदनशील रहे हैं कि शिक्षा प्राप्‍त करने वाले बच्‍चों के कोमल मन पर कौन सी बातें चोट पहुंचाती हैं। विडम्‍बना यह है कि ये चोट जीवन भर सालती है। मेरी यह टिप्‍पणी जनसंवाद में प्रसारित हुई थी। प्रतिक्रिया में वहां मारीशस से मधु गजाधर एक टिप्‍पणी आई थी जिसे मैं जनसंवाद से साभार प्रस्‍तुत कर रहा हूं। दूसरी टिप्‍पणी मेरे मेल बाक्‍स में आई है,जिसे भोपाल की पारुल बत्रा ने भेजा है। संयोग कुछ ऐसा है कि पारुल के पिता गुरवचनसिंह स्‍वयं एक शिक्षक हैं। फिर भी पारुल ने यह आवश्‍यक समझा कि वह थोथे आदर्श को छोड़कर एक कड़वे सच को सामने रखे। पारुल ने अपने स्‍कूल का नाम भी लिखा था। लेकिन मैंने उसे हटा दिया है। क्‍योंकि यह किसी स्‍कूल विशेष की बात नहीं है,यह एक ऐसी समस्‍या है जो कहीं भी हो सकती है।

शाबास पारुल

ह बात बिलकुल सही है कि 100 साल के अंतराल में भी कुछ नहीं बदला पहले जब माँ-बाप बच्चे को स्कूल छोड़कर आते थे तो बुन्‍देली में कुछ इस तरह कहते थे कि, "मांस तुमाओ और हड्डियाँ हमाई"|

आपका लेख पढ़कर मुझे भी अपने हाईस्कूल, टीकमगढ़ की कुछ बातें याद आ गई जहाँ अनुशासन बना रखने के नाम पर हमें बेवजह मारा जाता थाकभी बुखार की वजह से स्कूल लेट पहुंचे या कक्षा में बात की या बेल्ट या स्वेटर का रंग स्कूल द्वारा निर्धारित रंग से थोड़ा भी अलग हुआ तो आपसे वजह पूछे बिना सजा दी जाती थी

कक्षा दसवीं तक अंग्रेजी की शिक्षिका कम नंबर आने पर या कक्षा में बात करने पर पूरी कक्षा को अपने स्कूल बैग सर पर रखकर एक घंटे तक खड़े रहने की सजा देती थी। इतना ही नहीं फिर बड़ी शान से प्रिन्सिपल को बुलाकर कक्षा का वह दृश्य दिखाती थी कि देखो मैंने ऐसी सजा दी है इनको गणित के शिक्षक भी ऐसे ही थे। इन दोनों का इतना आंतक था कि इन दोनों ही विषयों के साथ सहज होने में मुझे बहुत समय लगा

एक दिन मैंने हिम्‍मत करके अंग्रेजी की शिक्षिका को मुझे पर हाथ उठाने से रोक दिया था। मैंने उन्‍हें कहा था, आप मुझे मार नहीं सकतीं।’ वे फिर मुझे सचमुच नहीं मार सकीं। हां, वे मुझे प्रिन्सिपल के पास जरूर ले गई थीं

विडम्‍बना यह है कि इस सबके बावजूद यह स्कूल आज भी शहर का सबसे प्रतिष्ठित स्कूल है

मधु गजाधर की पीड़ा

जनसंवाद पर शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर लिख रहे राजेश उत्साही का एक लेख 'बचपन, शिक्षा और खलनायक' हजारों किलोमीटर दूर मॉरिशस में बैठी मधु के दिल को छू गया। उन्होंने इसी मुद्दे पर अपनी वेदना को शब्द दिए हैं। इससे हमें मानवीय मुद्दों, अच्छाइयों और बेहतर जिंदगी के सपने की वैश्विक अपील का भी पता लगता है। तो जिंदगी में जब भी आप कुछ बेहतर सोचें और उसे समझने वाला आसपास कोई न हो, तो निराश न हों, भरोसा रखें इस दुनिया में बहुत से लोग हैं जिनके लिए आपकी बात उनके दिल की बात है। संपादक http://thatshindi.oneindia.in/

राजेश उत्साही जी के लेख ने [मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें] तो बरसों से छिपा मेरा एक सा जख्म सा कुरेद दिया, जिसे उम्र के इस दौर में आकर भी मैं कभी भर नही पाई। हमारी संस्कृति हमे गुरु या अध्यापक का सम्मान करना सिखाती है। गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काको लागू पायं जैसी भावनाओं के साथ गुरु को तो ईश्वर के समकक्ष बिठा देती है परंतु गुरु को कभी नहीं सिखा पाती कि शिष्य को गढ़ने की जिम्मेदारी गुरु का कर्तव्य है।

यदि आज कुछ लोग आप को ऐसे मिलें जो कि यह कहते हों कि आज जीवन का जिस मुकाम पर वो पहुंचे हैं उसमें उनके गुरु का बहुत बड़ा हाथ है, तो विश्वास कीजिए उससे कहीं अधिक संख्या में ऐसे लोग भी मिलेंगे जो वेदना से भर कर कहेंगे कि यदि आज हम जीवन में आगे नहीं बढ़ पाए, जो बनना चाहते थे नहीं बन पाए वो सिर्फ़ अपने एक अध्यापक के कारण।

मैं स्वयं इस वेदना से आज तक पीड़ित हूं। बचपन से मैंने एक सपना देखा था कि मैं एक डाक्टर बनूंगी ओर युद्ध क्षेत्र में जाकर अपने जवानों की सेवा करूंगी। भोले बचपन का वो पवित्र सपना कभी पूरा नहीं हो पाया। इसका कारण थीं मेरी गणित की अध्यापिका अरुणा गुप्ता (पता नही वो आज जीवित हैं या नहीं)। मगर उनके क्रोधी स्वभाव ओर व्यंगात्मक शब्दों ने मुझे गणित से इतना डरा दिया, इतना दूर कर दिया कि भय के कारण मैं साइंस नही ले पाई।

छोटी सी भूल पर बाल खींचना, कक्षा से बाहर खड़ा करना.. उनके व्यवहार का आम हिस्सा थीं। बचपन की उन बातों के लिए मैं खुद को आज भी अपमानित महसूस करती हूं। मैं एक मेधावी छात्रा थी लेकिन कभी न तो स्कूल में ओर न कभी घर में किसी ने ये जानने की कोशिश की कि यह लड़की जो बाकी विषयों में अव्वल आती है सिर्फ गणित में क्यों पीछे रह जाती है।

हमारे जमाने मे अध्यापक पर माता-पिता का इतना अंधविश्वास था कि घर आ कर अध्यापक की शिकायत करना मानो अपने लिए मुसीबत मोल लेना होता था। "अध्यापक कभी बिना बात नहीं डाँटते, या तुम ही ठीक से नहीं पढ़ती होगी या तुम्हारा ही कसूर होगा। टीचर कोई पागल थोड़ी है जो बिना बात सज़ा देगा..."

ये कुछ ऐसे जुमले थे जो लगभग हर घर में दोहराए जाते थे। आज जीवन के इस मोड़ पर आकर जब पलट कर देखती हूं, तो पाती हूं कि मैंने हार नहीं मानी। आगे बढ़ी। एक वकील बनी। दुनिया घूमी। अनेक लोगों से मिली। बहुत कुछ लिखा। बहुत कुछ पढ़ा.... लेकिन एक डाक्टर न बन पाने की पीड़ा आज भी मेरे अंदर है।

मैं सभी अध्यापकों और माता-पिता से कहना चाहूंगी वे हमेशा इस बात का ध्यान रखें कि कहीं आपकी क्रूरता से, लापरवाही से या बच्चे के अंतर्मन को ठीक से न समझने के कारण कोई मासूम अपना सपना आपके हाथों से टूटते देखकर पूरा जीवन सिसक-सिसक कर गुजारने पर मजबूर न हो जाए। कहीं ऐसा ना हो कि हम किसी बच्चे के अंदर पनपते डाक्टर, इंजीनियर, वकील , आर्किटेक्ट या फिर संगीतकार का निर्माण होने से पहले उसका गला घोंट दें।

राजेश जी बधाई के पात्र हैं। इस लेख को पढ़ने वाले सभी लोगों को उनकी बातों का वजन समझते हुए खुद पर जि्म्मेदारी लेनी चाहिए। बच्चा सिर्फ़ माता-पिता का नही बल्कि पूरे समाज का होता है। वेदों में जिस माँ को माता निर्माता भावती कह कर सम्मानित किया गया है, उस गुम माँ को खोज निकालना है।

[मधु गजाधर मारिशस में रेडियो तथा टीवी प्रस्तुतकर्ता हैं। वह मारिशस में हिन्दी भाषी समुदाय की संस्कृति, रहन-सहन तथा उनके सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर लिखती हैं।]

Sunday, September 6, 2009

असंवेदनशीलता : शिक्षा की खलनायिका

इस शिक्षक दिवस पर हर बार की तरह मुझे मेरे वे शिक्षक एक बार फिर याद आए जिनकी दी हुई शिक्षा की बदौलत मैं यहां तक पहुंचा। पर ये शिक्षक केवल स्‍कूल में नहीं थे। स्‍कूल के बाद और उसके बाहर की दुनिया में मैंने बहुत कुछ जाने अनजाने कई सारे लोगों से सीखा। वे सब मेरे शिक्षक हैं। सबको मेरा प्रणाम। कभी विस्‍तार से इनके बारे में जरूर लिखूंगा।

आज कुछ ऐसी बातों का जिक्र करना चाहता हूं जिनका उल्‍लेख करना शायद अशालीनता समझा जाए। पर मुझे लगता है हर सिक्‍के के दो पहलू होते हैं। आप हमेशा एक ही पहलू को देखते नहीं रह सकते। इसीलिए मैं यह अशालीनता कर रहा हूं।

मेरी दादी अब नहीं हैं। होतीं तो सौ साल की होतीं। उन्‍नीस सौ सत्‍तासी में उनका देहांत हो गया था। मप्र के छतरपुर जिले की बिजावर रियासत में वे पैदा हुईं। वे स्‍कूल गईं, लेकिन केवल कुछ दिन ही। जब हम उनसे पूछते कि उन्‍होंने स्‍कूल क्‍यों छोड़ दिया। तो वे ठेठ बुन्‍देली अंदाज में अपने मास्‍टर को कोसतीं। फिर अपने बाएं हाथ की मध्‍यमा को दिखाकर कहतीं, ‘ठठरी बंधे ने जामें(इसमें) इतने जोर से छड़ी मारी कि अब तक पिरात (दुखती) है।’ और उनके चेहरे पर एक असहनीय पीड़ा और आंखों में क्रोध उतर आता। हम थोड़ी देर के लिए सहम जाते।

मैं 1975 में ग्‍यारहवीं मैं था। इटारसी के पीपल मोहल्‍ला के हायर सेंकडरी स्‍कूल में। उन दिनों हर मां-बाप की इच्‍छा थी कि उनकी संतान या तो इंजीनियर बने या फिर डॉक्‍टर। किसी और प्रोफेशन के बारे में न तो सुनते थे, न मां-बाप जानते थे। मैंने बायलॉजी लिया था। मतलब कि डॉक्‍टर बनने की इच्‍छा रखता था। हमारे एक पीटी टीचर थे-चौहान सर। वे रोज प्रार्थना करवाते। किसी न किसी बहाने वे हमारी कक्षा को यह कहने से नहीं चूकते कि इनके बाप तो कंपाउडर भी नहीं बने, ये डॉक्‍टर बनने चले हैं। उनके ये शब्‍द पिघले सीसे के तरह कान में उतरते थे। हम लोग अपमान से भरे सिर झुकाए बस सुनते रहते।

छोटी बहन ममता अब 35 पार कर चुकी है। उसने आठवीं के बाद से स्‍कूल से मुंह मोड़ लिया था। उसकी शिक्षिका अंग्रेजी में कमजोर होने के लिए हमेशा ताने कसती थी। बहुत समझाने के बाद भी उसने स्‍कूल जाना स्‍वीकार नहीं किया।

बड़ा बेटा कबीर 23 का हो गया है। हमने उसे भोपाल के एक जाने-माने अंग्रेजी माध्‍यम स्‍कूल में दाखिल करवाया था। जब वह दूसरी में था,तो उसकी शिक्षिका भी अंग्रेजी पर ताने कसती थी। ऐसे ताने जो बच्‍चे की अस्मिता को चोट पहुंचाते थे। वह कहती क्‍यों अपने मां-बाप के पैसे बरबाद कर रहे हो। जाओ किसी हिन्‍दी स्‍कूल में पढ़ो। ये ताने बच्‍चे को तो मानसिक रूप से चोट पहुंचाते ही थे, उसके नन्‍हे मुंह से सुनकर हम भी पीड़ा से भर उठते थे। मेरी और पत्‍नी की अंग्रेजी भी इतनी अच्‍छी नहीं थी कि हम उसे घर में मदद कर पाते। अंतत: हमने उसे वहां से निकालकर हिन्‍दी माध्‍यम स्‍कूल में डाला। नतीजा यह हुआ कि कई अन्‍य कारणों से उसने बारहवीं तक चार स्‍कूल बदले।

छोटा बेटा उत्‍सव बड़े से पांच साल छोटा है। जब बड़े बेटे को अंग्रेजी माध्‍यम स्‍कूल से निकालकर हिन्‍दी माध्‍यम स्‍कूल में डाला तो उसके साथ छोटे को भी नए स्‍कूल में दाखिल करवाया। बड़ा तीसरी में था। छोटा नर्सरी में। पन्‍द्रह दिन सब ठीक चला। एक दिन छोटे ने जिद पकड़ ली कि वह बड़े के साथ बैठेगा। शिक्षिका ने नाराज होकर उसके कान कुछ इस तरह खींचे कि उसने स्‍कूल न आने का ऐलान कर दिया। फिर वह अगले साल ही स्‍कूल गया।

मैं सोचता हूं दादी स्‍कूल गईं होतीं तो शायद उन्‍होंने हफ्ता बाजार में मजदूरी नहीं की होती। दादी शादी के बाद अपने पति के साथ इटारसी आ गईं थीं। दादा रेल्‍वे में थे,एक एक्‍सीडेंट में उनकी मृत्‍यु हो गई थी। उसके बाद दादी को अपनी और बच्‍चों परवरिश के लिए इटारसी के हफ्ता बाजार में मजदूरी करनी पड़ी।

जहां तक मेरी जानकारी है मेरी ग्‍यारहवीं कक्षा से कोई डॉक्‍टर नहीं बना। पर चौहान सर के शब्‍द आज भी आत्‍मा पर चोट पहुंचाते हैं। वे किसी गाली से कम नहीं लगते हैं।

छोटी बहन अगर आगे पढ़ पाती तो उसे आज अपनी शिक्षा के बारे में बताने में संकोच नहीं होता। बड़े बेटे ने अगर चार स्‍कूल नहीं बदले होते तो उसकी दुनिया शायद कुछ अलग होती। छोटा अगर कान खींचने से आतंकित नहीं होता,तो उसका एक साल बरबाद होने से बच जाता।

ये सब कहानियां अलग-अलग समय की हैं। लगभग सौ साल के लम्‍बे समय में फैली हुईं। इनके नायक या नायिका अलग-अलग हैं। लेकिन इन सबमें खलनायक या खलनायिका एक ही है- वह है शिक्षक या शिक्षिका की असंवेदनशीलता। यह असंवेदनशीलता किस हद तक जिंदगी को प्रभावित करती है या कर सकती है यह इन कहानियों में और आगे जाकर देखा जा सकता है। बहुत संभव है आप के परिवार में या आपके आसपास भी आपको ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे। उनके प्रभाव भी आप देख सकते हैं।

क्‍या इस खलनायक को यानी असंवदेनशीलता को नष्‍ट किया जा सकता है। शायद हां। जो शिक्ष्‍ाक या शिक्षिका इसे पढ़ रहे हों तो वे इस बात पर जरूर गौर करें।

** राजेश उत्‍साही

(इस लेख का एक संपादित रूप में http://thatshindi.oneindia.in/cj/rajesh-utsahi/ जनसंवाद में प्रकाशित हुआ है।)

Tuesday, August 18, 2009

बिन नाम सब सून : राजेश उत्साही

शेक्सपीयर ने कहा था कि ‘नाम में क्या रखा है।’ सवाल वास्तव में यही है कि आपने उसमें रखा क्या है। अगर कुछ नहीं रखा है तो कुछ नहीं दिखेगा। सच तो यह कि हम हर किसी को नाम से ही तो याद करते हैं। आजकल तो नाम का ही दाम है। मैं नई जगह, नए लोगों के बीच आया हूं। हर कोई जानना चाहता है कि मेरा यह नाम कैसे बना,किसने रखा। पहले भी लोग मुझसे पूछते रहे हैं। मैं बताता भी रहा हूं। मैंने सोचा एक नाम पुराण भी हो जाए। लेकिन जब बात निकली है तो दूर तलक जाएगी।

बात पिता से शुरू करता हूं। उनका नाम है प्यारेलाल पटेल। अपनी रेल्वे की नौकरी के दौरान वे नाम से कम सरनेम ‘पटेल’ से ज्यादा जाने जाते रहे हैं। वहीं अपने परिचितों और रिश्तेदारों के बीच वे घरेलू नाम ‘दुर्जन’ से मशहूर थे। दुर्जन यानी बुरा आदमी। इस अर्थ को जानने वाले लोग उनके बारे में कुछ ऐसी ही राय बना लेते थे। पिता इससे बहुत परेशान थे। अक्सर अपनी मां से कहते कि ये कैसा नाम रख दिया। कुछ और नहीं मिला। मेरी दादी जिनका अपना नाम-जानकी-बहुत सुंदर था बेचारी नाम के इस अर्थ से अपरिचित थीं। असल में पिता का जन्म दीवाली की दूज को हुआ था,सो उन्हें दूजन कहा जाने लगा। यह दूजन ही बिगड़ते-बिगड़ते दुर्जन हो गया। अब चूंकि नाम की बात चल रही है इसलिए आगे बढ़ने से पहले एक बहुत ही दिलचस्प संयोग की चर्चा भी करता चलूं। दादी का नाम जानकी था, तो नानी का देवकी। मां का नाम गणेशी और मौसियों के नाम दुर्गा और शारदा। बात यहीं नहीं रूकी। विवाह हुआ तो सासूजी का नाम पार्वती निकला। यानी आसपास देवियां ही देवियां।

तो पिता अपने इस घरेलू नाम से बहुत दुखी रहे। इसलिए शायद उन्होंने तय किया होगा कि वे बच्चों के नाम सोच समझकर रखेंगे। जब मेरा जन्म हुआ तो मेरा नाम राजेश रखा गया। यह वह जमाना था जब ज्यादातर लोग अपने बच्चों के नाम फिल्म एक्टरों के नाम पर रखते थे। लेकिन तब तक राजेश खन्ना का उदय नहीं हुआ था। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि मेरा नाम किसी फिल्म एक्टर से प्रभावित था। यहां भी एक दिलचस्प तथ्य है कि मेरे बाद जो बच्चे हुए उनके नाम एक लय में रखे गए। जैसे बेटियों के नाम गीता,रीता,बबीता और ममता। बेटों के नाम सुनील और अनिल। मेरा नाम इनमें कहीं भी फिट नहीं होता है। बहरहाल मेरा भी एक घरेलू नाम है-मुन्ना। इस नाम से मुझे पिता और मां ही संबोधित करते थे। यह भी पन्द्रह-सोलह साल तक चलता रहा।

स्कूल में नाम लिखवाया गया राजेश कुमार पटेल। साठ के दशक में अगर लड़कों का नाम कुछ आधुनिक किस्म का होता था तो उसके साथ कुमार जरूर जोड़ा जाता था। इसी तरह लड़कियों के नाम के साथ कुमारी। राजेश कुमार पटेल आठवीं तक यानी 1972 तक चलता रहा। दोस्तों और स्कूल में पटेल के नाम से पुकारा जाता रहा। बचपन मुरैना जिले की सबलगढ़ तहसील में बीता। माधोसिंह और माखनसिंह के नाम उस समय वहां दस्यु के रूप में कुख्यात थे। मन में तय किया अपन भी या तो प्रख्यात होंगे या फिर कुख्यात ।‍ उसी समय साहित्य में कुछ रुचि जागी तो लगा नाम भी कुछ अलग होना चाहिए। बस राजेश कुमार पटेल के पीछे ‘उत्साही’ जोड़ दिया। इनवरटेड कोमा लगाकर।

याद नहीं कि उत्साही कैसे सूझा। हां इसकी प्रेरणा पिता से मिली। जब-तब। मैं चुपके से उनके कागजात और डायरी उलटता-पलटता रहता था। उनमें मुझे कहीं-कहीं उनके नाम के साथ ‘रजवाड़ा’ लिखा हुआ मिला। उसी से यह भी समझ आया कि पिता कविताएं ही नहीं कहानियां भी लिखते थे। हालांकि वे कहीं प्रकाशित नहीं हुईं। उनमें कुछ कविताएं ऐसी भी थीं जो शायद उस समय तो कहीं प्रकाशित हो भी नहीं सकती थीं। और ईमानदारी से कहूं तो उन्हें पढ़ने की मेरी उम्र भी नहीं थी। पर मैंने पढ़ डालीं। उनका कहना है कि एक कहानी उन्होंने पचास-साठ के दशक की मशहूर पत्रिका मनोहर कहानियां में प्रकाशन के लिए भेजी थी। तब मनोहर कहानियां अपराध कथाओं की पत्रिका नहीं थी,बल्कि अपने नाम के अनुरूप उच्च कोटि के साहित्य की पत्रिका थी। पत्रिका की ओर से उन्हें कोई जवाब नहीं मिला। लेकिन कुछ दिनों बाद उन्होंने देखा कि उनकी कहानी पर आधारित एक फिल्म सिनेमाघरों में धूम मचा रही है। यह फिल्म थी मदनमोहन के संगीत से सजी अदालत। जिसके गाने आज भी उतने ही कर्णप्रिय हैं। दो गाने तो मुझे भी बहुत अच्छे लगते हैं, ‘यूं हसरतों के दाग मोहब्बत में धो लिए और जाना था हमसे दूर बहाने बना लिए ।‘ दोनों ही लता जी ने गाए हैं और राजेन्द्र कृष्ण ने लिखे हैं। इस बात में कितनी सच्चाई है यह पिता ही जानते हैं। पर हां मैंने उनके पास रेल्वे के पुराने कागजों पर पेंसिल से लिखी यह कहानी देखी है।

तो राजेश कुमार पटेल ‘उत्साही’ चल पड़ा। जहां मौका मिलता अपन यह नाम लिखने से नहीं चूकते। लिखते-लिखते लगा कि यह कुछ ज्यादा ही लंबा है। क्यों न इसे छोटा किया जाए। मैंने सोचा ‘कुमार’ तो बहुत ही आम है। और यह हर किसी के नाम में है। इसके नाम में होने न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। तो कुमार साहब को चलता किया। रह गया राजेश पटेल ‘उत्साही’।

सबलगढ़ से इटारसी,खंडवा होते हुए मैं होशंगाबाद जा पहुंचा था। 1980 के आसपास तक मेरी पहचान होशंगाबाद कस्बे में एक छोटे-मोटे लेखक के रूप में स्थापित हो गई थी। जब भी किसी को परिचय देना होता तो राजेश पटेल
‘उत्साही’ कहना बड़ा उबाऊ-सा लगता। जो मेरी साहित्यिक अभिरुचि से परिचित नहीं होते वे पूछते ये पटेल तो ठीक है पर ये ‘उत्साही’ क्या है। क्या यह गोत्र है? धीरे-धीरे मुझे भी अपने नाम में पटेल कुछ अखरने लगा। कभी-कभी लगता कि पटेल बोलना कुछ ऐसा हो जाता है जैसे हम सामने वाले के सिर पर हथौड़ा मार रहे हों। शायद यह ट वर्ण की वजह से महसूस होता था। मैंने विचार किया कि पटेल की वाकई जरूरत है क्या। मुझे इसका केवल एक ही उपयोग समझ आया कि यह जाति का कुछ-कुछ अंदाजा देता है। इसको हटाने का केवल एक नुकसान है कि जात-बिरादरी में जो लोग अपनी कन्या के लिए योग्य वर तलाशते रहते हैं,आप उनकी नजरों से दूर हो जाएंगे। लेकिन मेरे लिए यह कोई अफसोस की बात नहीं थी। क्योंकि न तो जात-बिरादरी में मेरा विश्वास था (और न अब है) और न तब मैं इतना योग्य था कि किसी कन्या के‍ अभिभावक की नजरों में चढ़ पाता। तो मैंने बिना देर किए अपने नाम से ‘पटेल’ साहब को भी विदा कर दिया। अब रह गया राजेश ‘उत्साही’। कुछ मुश्किल अब भी बाकी थी। लोग पूछते कि राजेश के बाद क्या छूटा हुआ है। मुझे समझ आया कि यह सारी गड़बड़ उत्साही को इनवरटेड कोमा में रखने से हो रही है। तो एक दिन उत्साही को इनवरटेड कोमा से आजाद कर दिया। लेकिन कहानी यहां खत्म नहीं होती।

शादी हुई तो उसके निमंत्रण पत्र में भी मैंने केवल राजेश उत्साही ही लिखा था। लिखा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि निमंत्रण पत्र मैंने अपने हाथ से बनाया था। असल में निमंत्रण पत्र सायक्लोस्टाइल करके बनाया गया था। स्टेशिंल मैंने ही काटा था। एकलव्य में काम शुरू किया तो वहां के सब कागजों में भी यही नाम है। मेरे नाम से पटेल साहब तो ऐसे गायब हुए जैसे गधे के सिर से सींग। एकलव्य में कभी कोई पुराना दोस्त या परिचित फोन पर कह देता कि पटेल से बात कराओ तो फोन सुनने वाला पूछता कौन पटेल। यहां तो कोई पटेल नहीं है। कभी तो वे मुझ से ही पूछ लेते कि अपने यहां पटेल कौन है। सामने वाला कहता कि राजेश पटेल। तो भी मुश्किल होती। क्योंकि एकलव्य में एक दो नहीं सात राजेश थे। अंतत:सामने वाला या तो कहता कि चकमक वाला राजेश या होशंगाबाद वाला राजेश, या उसे भी याद आ जाता कि अरे यह बंदा अपने नाम में उत्साही भी लगाता है,तब जाकर मामला निपटता। अब तो एकलव्य में मेरे नाम से राजेश भी गायब हो गया है, केवल उत्साही ही लोगों की जबान पर होता है। हां, स्कूल, कॉलेज के सारे कागजों में राजेश कुमार पटेल विराजमान हैं। यहां तक कि मेरे हस्ताक्षर में भी इनका ही संक्षिप्त रूप होता है।

राज की बात यह भी है कि मेरे दो और नाम थे, जो कुछ ही दिन रहे। बात 1979-80 की है। अपन कालेज में थे-होशंगाबाद के नर्मदा महाविद्यालय में। बीएससी करने की कोशिश कर रहे थे। कोशिश इसलिए कि इसकी एक अलग कहानी है, जो फिर कभी। कालेज में लायब्रेरी थी। लायब्रेरी को लेकर कुछ शिकायतें थीं। चूंकि सीधे-सीधे कालेज वालों से नहीं भिड़ा जा सकता था। सोचा क्या करूं। उन दिनों अखबार में सम्पादक के नाम पत्र लिखने का जुनून सवार था। हर दूसरे-तीसरे दिन एकाध पत्र दैनिक भास्कर,भोपाल में छपता ही था। पर वास्तविक नाम से भी पत्र नहीं लिखा जा सकता था। मैंने एक और नाम बनाया-यूआर भारतीय। यानी कि उत्साही राजेश भारतीय। और इस नाम से लायब्रेरी में फैली अराजकता का लंबा चिट्ठा लिख भेजा। पत्र छपते ही लायब्रेरी में हड़कम्प मच गया। व्यवस्थाएं ठीक होने लगीं। मुझे लगा कि यह तो कारगर तरीका है। जिसके बारे में खुलकर नहीं लिख सकते उसके बारे में इस नाम से लिखो।

उसके बाद हाल यह था कि अखबार में एक ही दिन राजेश उत्साही और यूआर भारतीय के नाम से पत्र छपते थे। दोस्तों को भी नहीं मालूम था कि वह भी मैं ही हूं। यूआर भारतीय का इतना चर्चा था कि जहां-तहां लोग पूछने लगे कि यह कौन बंदा है। क्योंकि कस्बे में अखबार में पत्र लिखने वाले सब एक-दूसरे को जानते थे। और सबमें यह होड़ लगी रहती थी कि किसके ज्यादा पत्र छपेंगे। ‍इस नाम से मैंने कुछ लेख भी लिखे,जो अखबारों में छपे। लोकप्रियता का आलम यह था कि होशंगाबाद के एक लल्ला भारतीय नामक सज्जन ने अपने आपको यूआर भारतीय कहना शुरू कर दिया। बाद में मैंने भारतीय जी को भी विदा कर दिया। फिर सोचा अगर उत्साही नहीं होता तो दूसरा नाम क्या होता। दूसरा नाम मैंने रखा राजेश सीमांती। अब आप यह मत पूछिए कि यह सीमांती क्या बला है। यह बिलकुल निजी है और इसे सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। कुछ पत्र इस नाम से भी अखबारों में छपे।

अभी भी मैं किसी के लिए मैं ‘राज’ हूं,तो किसी के लिए ‘राजू’ भी। अपने रंग के कारण ‘कालिया’ नाम से भी मुझे पुकारा जाता रहा। मेरी ससुराल में मुझे ‘माथापच्ची’ कहा जाता है। माथापच्ची चकमक बाल विज्ञान पत्रिका का नियमित और लोकप्रिय कालम रहा है,जिसका मैंने वर्षों संपादन किया। अब लोग मिलते हैं जो नाम का अर्थ जानते हैं, वे तुरंत कहते हैं अरे आप तो नाम से भी और स्वभाव से भी उत्साही हैं। मैं बस मुस्कारा देता हूं।

यह नाम पुराण पूरा नहीं होगा यदि मैं अपने बेटों के नाम रखने की कहानी बयां न करुं। शादी हुई। पत्नी का नाम निर्मला है। उन दिनों यानी 1985 में बाजार में निरमा वांशिग पावडर का जितना नाम था, उससे कहीं ज्यादा हल्ला टेलीविजन पर उसके विज्ञापन गीत का था। मेरी एक मौसेरी बहन सरस्वती उर्फ सरू ने निर्मला को निरमा-ला कहकर ही पुकारना शुरू कर दिया था। इसलिए मैंने निर्मला को नीमा में संक्षिप्त कर दिया। हालांकि उसे मायके में पहले से ही नीमू कहा जाता था।

बहरहाल तो जब पहला बच्चा होने वाला था तो हमने लड़की और लड़के दोनों के लिए नाम सोचे। लड़की हुई तो नाम रखेंगे नेहा या आस्था। लड़का हुआ तो उत्सव। पहला बच्चा बेटा हुआ। लेकिन बहुत तकलीफ के साथ । नीमा रात भर दर्द से परेशान रहीं। एक प्रायवेट अस्पेताल में लेबर रूम में टेबिल पर लगी राड को पकड़े-पकड़े उसकी बांहों में सूजन आ गई। बेटा हुआ तो उसके गले में गर्भनाल की आंटे लगे हुए थे। पैदा होने के बाद छह घंटे तक उसे आक्सीजन पर रखा गया। मैंने उम्मीद छोड़ दी थी। सोचा ऐसे बच्चे का नाम उत्सव कैसे रखा जा सकता है। तब मुझे कबीर याद आए। उनकी जीवटता याद आई। मैंने तय किया कि इसका नाम कबीर रखेंगे। नीमा को बताया। नीमा हिन्दी साहित्य में एमए हैं। पांच साल कालेज में पढ़ाती रही हैं। कबीर को खूब पढ़ा और पढ़ाया था,इसलिए स्वीकारने में कोई समस्या नहीं हुई। तो इस तरह बड़े बेटे का नाम कबीर हुआ।

समय बीतता गया। जब दूसरा बच्चा गर्भ में आया तो नाम सोचने की जरूरत नहीं पड़ी। जेहन में नेहा ,आस्था और उत्सव थे। इन नामों के प्रति एक तरह का लगाव-सा हो गया था। संयोग से दूसरा बच्चा भी बेटा ही हुआ। हमने जन्मते ही उसका नाम उत्सव रख दिया। हमारे यहां तीसरा बच्चा नहीं हुआ। इसलिए नेहा और आस्था जेहन में ही रह गए। किसी परिचित या रिश्तेतदार के यहां लड़की जन्मती तो मैं उन्हें यही नाम सुझाता। छोटे भाई अनिल की शादी हुई। अनिल और रानी के यहां पहला बच्चा लड़की हुई। उन्होंने उसका नाम पूजा रखा। संयोग से उनका दूसरा बच्चा भी लड़की हुई । इसका नाम उन्होंने आस्था रखा। आखिरकार हमारे सोचे नामों ने एक-एक रूप धारण कर ही लिया। ‍

यह मुझे बहुत पहले मालूम हो चुका था कि हिन्दुस्तान में मेरे अलावा केवल एक और उत्साही हैं। वे हैं नामी गिरामी शायर बेकल उत्साही। कहा जाता है कि उनका मूल तख़ल्लुस बेकल था, उत्साही नाम उन्हें नेहरू जी ने दिया। फिर मुझे दो और उत्साही मिले। एक नटवर पटेल ‘उत्साही’, जो भोपाल में रहते थे। वे भी साहित्य में रूचि रखते थे। उनसे नाम के कारण ही मित्रता हुई। फिर वे भीड़ में कहीं खो गए। अब कहीं नजर नहीं आते। दूसरे हैं राजस्थान के महेन्द्र सिंह ‘उत्साही’। वे भी लिखने-पढ़ने से सरोकार रखते हैं। इंटरनेट पर जब गूगल पर एकाउंट खोला तो पहली ही बार में केवल उत्साही नाम से ही मिल गया। तो मैं कह सकता हूं कि कम-से-कम नाम के मामले में तो अपन कुछ ‘निराले’ हैं ही, भले ही ‘निराला’ न हों।
0 राजेश उत्साही
(इस लेख का संपादित रूप udanti.com पत्रिका के जुलाई,2009 अंक में प्रकाशित हुआ है।)