Monday, February 27, 2012

छिपा हुआ था, अब छपा हुआ हूं

मेरा पहला कविता संग्रह 'वह, जो शेष है'  विश्‍वपुस्‍तक मेला,2012 में 27 फरवरी की शाम (बाएं से दाएं) कथाकार संजीव, लेखक-चिंतक राजेन्‍द्र अग्रवाल,व्‍यंग्‍यकार डॉ.शेरजंग गर्ग, वरिष्‍ठ कवि मदन कश्‍यप और लेखक उपेन्‍द्र कुमार जी के हाथों  विमोचित हुआ। 



इसे संभव बनाया ज्‍योतिपर्व प्रकाशन की संचालक ज्‍योति रॉय और  ब्‍लागर मित्र अरुण चंद्र रॉय ने। विमोचन कार्यक्रम का संचालन किया ब्‍लागर मित्र सलिल वर्मा(चला‍ बिहारी ब्‍लागर बनने) ने। कार्यक्रम में ब्‍लागर मित्र बलराम अग्रवाल भी मौजूद थे। फोटो उनके सौजन्‍य से ही प्राप्‍त हुए हैं। 


इस संग्रह में मेरी 48 कविताएं शामिल हैं। संग्रह का आवरण जाने-माने डिजाइनर देव प्रकाश चौधरी ने बनाया है। 

मैं इस अवसर पर वहां उपस्थित नहीं हो सका। मैं बंगलौर में प्रारम्भिक शिक्षक शिक्षा पर आयोजित एक राष्‍ट्रीय सेमीनार में भाग ले रहा था। यहां मेरे एक  मित्र ने टिप्‍पणी की, ' अब तक आप छिपे हुए कवि थे, अब आप छपे हुए हो गए हैं।' 
                                                                           
                                                                                   0 राजेश उत्‍साही

19 comments:

  1. बधाई हो राजेश जी !

    एक ना एक दिन यह तो होना ही था....:)

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  2. छिपे हुये कवि से छपे पुये कवि, भई वाह...

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  3. बहुत बहुत बधाई हो राजेश जी।

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  4. ढेर सारी बधाइयां ... यह तो शुरुआत है

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  5. बहुत बहुत बधाइयाँ ………

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  6. बहुत बहुत बधाई !!

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  7. बधाई राजेश जी .
    लगता है प्रगति मैदान में ब्लोगर्स का बोलबाला रहा .

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  8. गुरुदेव!! आपकी यह पुस्तक मैंने समारोह के उपरांत स्टॉल से खरीदी... पहली बार एक ऐसा एहसास हुआ कि मैं व्यक्त करने में स्वयं को असमर्थ पा रहा हूँ.. आपसे तुरत फोन पर बात की, आपको पूरी रिपोर्ट दी... फिर अपने मित्रों चैतन्य आलोक और मनोज भारती को सूचित किया!!
    बधाई बहुत छोटा लफ्ज़ है.. मगर रस्मे दुनिया भी है, मौक़ा भी है, दस्तूर भी है.. सो स्वीकारें!!

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  9. प्रकटीकरण की अवस्था प्राप्त करने पर ढेरों बधाइयाँ! किताब- वह अभी पढ़ना शेष है...!!

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  10. बधाई, वैसे आपकी साहित्यिकता छुपी हुई तो न थी.

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  11. आपके साहित्यकी संसार से तो मैं बहुत पहले से परिचित हूँ ,तब भी पुस्तक के प्रकाशन का अपना आनंद है । बहुत -बहुत बधाई ।
    आदरणीय शेर जंग गर्ग जी को बहुत समय के बाद आपके ब्लॉग में पुस्तक विमोचन समारोह में देखा तो दिल्ली के साहित्यकार ,कलाकार याद हो आए । उनको मेरा प्रणाम ।
    सुधा भार्गव

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  12. इस अनुपम कविता संग्रह 'वह, जो शेष है' के प्रकाशन पर बहुत बहुत हार्दिक शुभकामनायें...

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  13. आप छिपे हुए तो नही थे फिर भी इस तरह छपने पर हार्दिक बधाई ।

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  14. बहुत बहुत बधाई ... पर आप छिपे कहाँ हैं ..

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  15. कल फिर से गया था पुस्तक मेला में...तो खरीदी ये किताब आपकी..
    पता नहीं आप यकीन कर पायें या न, लेकिन कल मैं सिर्फ आपकी ही किताब खरीदने के उद्देश्य से गया था वहाँ..
    पढ़ने के क्रम में हूँ अभी..और जल्द ही बताऊंगा आपको की कैसी लगी मुझे आपकी किताब
    फ़िलहाल तो जितना पढ़ा वो बेहद खूबसूरत सा लग रहा है!!

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  16. बहुत बहुत बधाई......

    अब छप गएँ हैं तो अपनी छाप अवश्य छोड़ेंगे .....
    शुभकामनाएँ.

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  17. आपको होली की सपरिवार हार्दिक शुभकामनायें!

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  18. बधाई हो इस अवसर पर। :)

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जनाब गुल्‍लक में कुछ शब्‍द डालते जाइए.. आपको और मिलेंगे...