Thursday, June 30, 2011

शेष कहानी : वह जो शेष है !


वह दरवाजे के पास ही बैठा था। बस में ज्‍यादा लोग नहीं थे। यही कोई 20-22 लोग रहे होंगे। आशा के विपरीत बस अपने निश्चित समय पर रवाना हो गई थी। 
हाथ में बैंक काम्‍पटीशन गाइड जरूर थी पर हिचकोलों के कारण वह ठीक से पढ़ नहीं पा रहा था। वैसे ध्‍यान भी बराबर वाली सीट पर बैठी दो लड़कियों की ओर था। उम्र में एक-दो साल के अंतर वाली वे लड़कियां बात भी कुछ ऐसी ही कर रहीं थीं, कि किसी को भी सुनने में दिलचस्‍पी हो सकती थी। छोटी दिखने वाली लड़की बड़ी को मौसी कहकर संबोधित कर रही थी। वह कनखियों से उन्‍हें देख लेता और फिर गाइड पलटने लगता।

सड़क के दोनों ओर ऊंचे-ऊंचे पेड़ थे, सागौन और ऐसी ही अन्‍य इमारती लकडि़यों के। किसी जमाने में यानी पांच साल पहले ही यहां घना जंगल था। पर अब लकड़ी चोरों और रक्षकों की कृपा से सब चौपट हो गया है। लकड़ी चोरी के लिए बुरी तरह बदनाम इलाका है यह। कोई बोलने-पकड़ने वाला नहीं है। चोर-चोर मौसरे भाई हैं सब ।

बस जंगल से निकलकर पथरीले मैदान में आ गई थी। सड़क के दोनों ओर एक-एक फर्लांग तक कोई पेड़ नहीं था सिवाय छोटी-छोटी झाडि़यों के। सामने सड़क पर ट्रकों की कतार देखकर वह चौंका। बस भी नजदीक जाकर रूक गई। लोग उत्‍सुकता से बाहर निकलने लगे। सबके चेहरे पर बस एक ही सवाल था क्‍या हुआ?

असल में एक संकीर्ण पुलिया थी वहां। उस पर कोयले से भरा एक ट्रक फंस गया था। पुलिया कमजोर रही होगी। ट्रक के पिछले पहिए सड़क को तोड़कर नीचे चले गए थे। पुलिया पर सिर्फ इतनी जगह थी कि कार या जीप ही निकल सकती थी। मतलब साफ था कि बस आगे नहीं जा सकती थी। ट्रक के ड्रायवर और क्‍लीनर नदारद थे। शायद कुछ इंतजाम करने गए होंगे।
बस के आगे चार और ट्रक थे। पुलिया के उस तरफ भी पांच-छह ट्रक खड़े थे। बस में एक नववि‍वाहित दम्‍पति तथा दोनों लड़कियों को छोड़कर बाकी सब नीचे उतर आए थे।

उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्‍या करे। बैंक में क्‍लर्क ग्रेड के लिए भोपाल में लिखित परीक्षा थी। ठीक साढ़े बारह बजे परीक्षा शुरू हो जाएगी।
-भाई साहब कितना बजा है अभी ?
-अभी ...ग्‍यारह होने वाला है।
अभी घंटे भर का सफर बाकी है। कोई चालीस-पैंतालीस किलोमीटर दूर होगा भोपाल। इस जगह से अगला कस्‍बा कम से कम दस किलोमीटर दूर था। पैदल जाकर वहां से अन्‍य कोई वाहन पकड़ने का समय नहीं था। उसे लगा गई परीक्षा हाथ से। जैसे-तैसे करके फीस के पैसे जुटाए थे। फीस लगती भी तो बहुत है चालीस रूपए। उसके मासिक वेतन का छठा भाग। ऐसे ही एक आफिस में आठ रुपए रोज का आदमी है वह। आदमी भी कहना चाहिए या कुछ और...। आफिस का खच्‍चर कहना ज्‍यादा अच्‍छा होगा। सारा लिपकीय कार्य उसके ऊपर ही लाद दिया जाता है। ससुरी टायपिंग जो सीख रखी है उसने। यूं तो दो डिग्रियां भी हैं उसके पास पर स्‍थायी नौकरी का ठिकाना ही नहीं बैठ रहा कहीं। पांच परीक्षाएं तो रेल्‍वे की नौकरी के लिए दे चुका है। बैंक की भी यह तीसरी परीक्षा है। तीन-चार और भी जगहों के लिए परीक्षा दी है। सब जगह धांधली है । परिवार के लोग भी यह कह कर सांत्‍वना देते हैं कि जब किस्‍मत में होगी तो मिलेगी। और वह यह सोचकर कुढ़ता रहता है कि जब तक जेब में होंगे ही नहीं तो मिलेगी कहां से?

उसे अपने आप पर गुस्‍सा आने लगा। कल शाम दोस्‍तों ने पूछा था-क्‍यों यार,ट्रेन से चलोगे न?
उसने मना कर दिया था-नहीं,मैं बस से जाऊंगा।
वह जानता था,वे कहेंगे-साला डरपोक।
लगभग सभी दोस्‍त बिना टिकट ही गए होंगे आज। पिछली दफा ऐसी एक परीक्षा के लिए सब जा रहे थे तो ट्रेन पर छापा पड़ गया था। कोई बीस लड़के बिना टिकट पकड़े गए थे। उसके पास टिकट थी इसलिए बच गया था। पर अंदर से उसे अच्‍छा नहीं लगा था। सब पकड़े गए और वह बच गया। एक आत्‍मग्‍लानि ,अपराध भाव-सा आ गया था। इसलिए इस बार उसने बस से जाना ही ठीक समझा था।
एकाएक उसे एक विचार कौंधा.....। कार और जीप बराबर आ जा रहीं थीं। क्‍यों न किसी जीप या कार में लिफ्ट ले ली जाए। थोड़ी देर ऊपापोह में रहा। फिर सड़क पर जाकर खड़ा हो गया।
एक क्रीम रंग की कार तेजी से आ रही थी। उसने हाथ दिया। उसे देखकर प्रसन्‍नता हुई कि वह थोड़ा आगे जाकर रुक भी गई। वह दौड़कर कार के पास पहुंचा। ड्रायवर के बाजू में बैठे अफसरनुमा व्‍यक्ति ने पूछा-कहिए! वह मिमयाते स्‍वर में बोला-सर! मुझे नौकरी की परीक्षा के लिए भोपाल जाना है। इस बस से जा रहा था। अगर आप लिफ्ट दे दें तो बड़ी मेहरबानी होगी।
.....क्‍यों नहीं! क्‍यों नहीं!
उस अफसरनुमा व्‍यक्ति ने कहा।
.....पर तुम देख रहे हो कार में बिलकुल जगह नहीं है।
उसने पीछे की सीट पर नजर डाली। वहां एक सुंदर महिला एक झबरे पिल्‍ले को डार्लिंग डार्लिंग कहकर पुचकार रही थी। वह कुछ कहता तब तक कार आगे बढ़ चुकी थी।

आमतौर पर वह गालियां देने का आदी नहीं है। पर इस मौके पर न जाने कैसे उसके मुंह से एक भद्दी सी गाली निकली और दिमाग में अफसरों के बारे में तमाम सुनी-सुनाई बातें कौंध गईं। सब साले एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। अपने आपको पता नहीं क्‍या समझते हैं। अपने मातहतों पर बिलकुल तरस नहीं खाते, पर अपने बड़ों के आगे कैसे पिल्‍ले बन जाते हैं।
उसका खुद का अफसर कहां का भलामानुष है। जरा-जरा सी गलतियों पर पढ़ाई की दुहाई देता है। कहता है ये हैं एमए पास मि0....। खुद साले मैट्रिक पास जमाने के प्रोमोटेट हैं। ठीक है गलती सबसे होती है। फिर अनुभव भी किसी चिडि़या का नाम है या नहीं। आखिर धीरे-धीरे ही तो सीखा जाएगा काम। ये क्‍या पेट से सीखकर आए थे।

उसकी नजर बस की तरफ चली गई। दोनों लड़कियां ख्रि‍ड़की में से झांकती हुई उसकी तरफ ही देख रहीं थीं। उन्‍हें अपनी ओर देखता पाकर उसकी हाथ स्‍वत: ही बालों पर चला गया। फिर उसने अपनी शर्ट के बटन देखे वे भी ठीक थे। उसने लड़कियों की तरफ देखा, वे खिलखिलाकर हंस पड़ीं। वह झेंप गया। मुंह घुमाकर भूख के बारे में सोचने लगा। मां ने कहा था-परांठे बना दूं। पर वह चाय पीकर ही निकल आया था। सोचा था वहीं कुछ खा लेगा।

एक डीजल जीप आ रही थी। वह उत्‍सुकता से उसके पास आने का इंतजार करने लगा। एमपीजेड उसके मुंह से निकला। सरकारी गाड़ी है। वह सड़क पर आकर खड़ा हो गया। जीप अपनी पूरी गति से आ रही थी। हालांकि वह हाथ का इशारा कर रहा था, पर रुकने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे थे। वह सड़क से हटा नहीं। जीप उसके नजदीक आकर चीं चीं करती हुई रुक गई। जीप के रुकते ही ड्रायवर ने सिर बाहर निकाला।
...क्‍या है बे ! मरना है क्‍या? मरने के लिए मेरी ही जीप मिली?
ड्रायवर बहुत गुस्‍से में लग रहा था।
....भाई साहब!
...भाई साहब के बच्‍चे  मरने के और भी कई तरीके हैं।
.....सुनिए तो.... ! वह जरूरत से ज्‍यादा नम्र था।
....क्‍या सुनूं!
....भोपाल तक...।
....बाप की गाड़ी है न! चले आते हैं साले ! और जीप सर्र से आग बढ़ गई।

वह फिर बड़बड़ाने लगा। साले ! यूं तो सरकारी गाड़ी में चौबीस घंटे साहब के बीवी-बच्‍चे घुमाते रहेंगे,तब कुछ नहीं। कुछ समय पहले रेडियो पर एक विज्ञापन आता था ,-'यदिआप किसी चौराहे पर खड़े होकर आने-जाने वाली साइकिलों को देखें तो आपको ज्‍यादातर साइकिलें फलाना साइकिलें ही दिखाई देंगी।'
वह सोचता था विज्ञापन इस तरह होना चाहिए- ‘यदि आप किसी चौराहे पर खड़े होकर आने-जाने वाली जीप और कारों को देखें तो उनमें सबसे ज्‍यादा एमपीजेड सीरिज वाली गाडि़यां होंगी। और अधिकांश में आपको कुत्‍ते,बच्‍चे और महिलाएं दिखाई देंगे।’  पर उसके सोचने से क्‍या होता है।

उसकी निगाह फिर बस पर चली गई। इस बार लड़कियां चुप थीं। शायद तरस आ रहा था उस पर। हताशा में उसने सड़क पर पड़े एक पत्‍थर को ठोकर मारकर दूर उछाल दिया।
-क्‍या वक्‍त है भाई साहब!
उसने इलेक्‍ट्रानिक घड़ी वाले से पूछा!
-ग्‍यारह पच्‍चीस !
अभी भी एक घंटा है। यदि कोई कृपा कर दे। एक और जीप आ रही थी। इस बार वह सड़क के किनारे खड़ा हो गया। उसने इशारा किया। जीप मंद हुई पर रुकी नहीं।

उसकी नजरें फिर सड़क पर जम गईं।

चंद मिनटों बाद ही एक कार दिखाई दी। उसने इशारा किया, कार मंद हुई और कुछ आगे जाकर रुक गई। वह दौड़कर पहुंचा। उसके शहर के एक सेठ की कार थी। वह सेठ को पहचानता था। पर सेठ उसे पहचानता हो यह जरूरी तो नहीं।
-सेठजी नमस्‍कार !
-नमस्‍कार! क्‍या बात है?
-सेठ जी परीक्षा देने भोपाल जाना है,बस से जा रहा था। ट्रक फंस जाने से बस आगे नहीं जा पा रही है। आप कहें तो.... !
-क्‍यों भागवान! बिठा लें इसको!
-इसको क्‍या सिर पर बिठाओगे? चलो! पीछे की सीट से आवाज आई। वहां एक थुलथुल शरीर की महिला तीन बच्‍चों के साथ पसरी हुई थी।

वह लगभग रूंआसा हो आया। पिछले पंद्रह दिन से रात-दिन एक करके तैयारी की थी इस परीक्षा की। बड़ी उम्‍मीद थी उसे। लड़कियां अब बिलकुल खामोश थीं। उन्‍हें शायद अब सहानुभूति होने लगी थी उससे।

एक मिलटरी रंग की जीप तेजी से आ रही थी। उसने इशारा किया। नजदीक आकर धीमी जरूर हुई पर रुकी नहीं। उसने देखा जीप उसके शहर का छात्र नेता चला रहा था। साले चुनाव के वक्‍त कैसे आगे-पीछे घूमते थे। कॉलेज से घर तक भी जीप, मोटर साइकिल, स्‍कूटर पर छोड़ने के लिए तैयार रहते थे। इनके माई-बाप, भाई-बहन सभी हम ही होते थे। हां भाई! अब हम कौन कॉलेज में हैं जो इन्‍हें हम से काम पड़ेगा !
भगवान ही मालिक है अब। भगवान भी ठीक मुसीबत में ही याद आते हैं उसे। अब नहीं पहुंच सकता परीक्षा में। निराश होकर वह एक ओर खड़ा हो गया।

दोनों लड़कियां और नववि‍वाहित दम्‍पति भी बस से बाहर निकल आए थे। इलेक्‍ट्रानिक घड़ी वाला भी बार-बार घड़ी देख रहा था। सामने से चार-पांच आदमी तगाड़ी और फावड़े लेकर चले आ रहे थे साइकिलों पर। वे ट्रक के पास आकर खड़े हो गए। शायद ट्रक को खाली करेंगे। मगर उसका ना पहुंचना लगभग अब तय था।

तभी उसकी नजर आती हुई एक और जीप पर पड़ी। उसने सोचा एक और प्रयास कर लेने में क्‍या बुराई है। उसने इशारा किया। जीप पुलिया के उस पार जाकर रुकी। वह दौड़कर गया। चलाने वाले ने मुंडी बाहर निकाली। वह उसे देखकर थोड़ा सकपकाया। जबरन मुसीबत मोल ले ली। जीप चलाने वाला शहर का बदनाम दादा था। शराब और सट्टे के अड्डे उसके दम पर ही चलते थे। जरा-सी बात पर किसी के भी हाथ-पांव तोड़ देना उसके लिए मामूली बात थी।
-क्‍या बात है?
-वो...वो.. ! उसके मुंह से शब्‍द नहीं निकल रहे थे।
-वो....वो..... क्‍या लगा रखी है!
-वो.....मुझे भोपाल जाना है,परीक्षा देने। बस यहां.... !
-चल बैठ जल्‍दी से।

उसे यकीन ही नहीं हुआ। दादा ने घूरकर देखा, जैसे कह रहा हो, बैठता क्‍यों नहीं! वह लपककर जीप में पीछे बैठ गया। जीप ने तुरंत रफ्तार पकड़ ली। उसकी नजर बस की तरफ चली गई। दोनों लड़कियां हाथ हिला रही थीं।
(हरेराम समीप द्वारा संपादित ‘कथाभाषा’ पत्रिका में 1988 में प्रकाशित)
                                0 राजेश उत्‍साही

15 comments:

  1. क्‍या लेखक का आशय यह है कि बदनाम दादा अधिक भरोसेमंद और मददगार होते हैं.

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  2. vivash samay me bakhoobi kai chehre spasht hote hain

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  3. sayad yahi sach hai...aaaj ke badnaam logo ke dil me hi sachcha dil dharakta hai!!

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  4. कहानी अच्छी लगी और उसका अंत भी, कभी कभी जीवन में समाज के राम के बजाये उसके रावण आप के लिए राम बन जाते है |

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  5. संभव है, रोचक है, सभ्यता का विकास।

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  6. जहां उम्मीद हो उसकी वहाँ नहीं मिलता!!

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  7. बुरे लोग हर जगह बुरे नहीं होते ... ! शुभकामनायें राजेश भाई !

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  8. @जाकिर भाई,
    लेखक का काम जवाब देना नहीं है,वह सवाल खड़े करता है। जवाब तो पाठक को ही ढूंढना है।
    @ रा‍हुल जी,
    कहानी का आश्‍ाय पाठक को अपने परिप्रेक्ष्‍य के आधार पर ही समझना है। अगर कहानीकार को कहानी की व्‍याख्‍या करनी पड़े तो फिर कहानी लिखने का क्‍या औचित्‍य?

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  9. Vaha jo seash hai ki part ii padi (part I bhi dund kar padunga) kahani pad kar apne din a gaye jab BA pass karne ke bad pura din office ke chakkar kate karte the naukari ki talsah mai. Anubhav chae bhaale hi alag hon par ek aisa common dhaga hai jo muje aur lift magne wale admi ko ek banta hai

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  10. ऐसी ही एक और कहानी पढ़ी थी जिसमें एक पति रेल में अकेली सफ़र कर रही अपनी पत्नी का ध्यान रखने की जिम्मेदारी जिसे देता है वो एक छंटा हुआ बदमाश होता है और वह पूरी शिद्दत से उस अनजान महिला के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाता है।
    जिन्दगी सच में बहुत अप्रत्याशित है।

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  11. मुझे लगा कोई नई पोस्ट है....हमने तो बहुत पहले ही पढ़ ली थी ये कहानी और टिप्पणी भी की थी..पर लगता है..वो टिप्पणी DC की भेंट चढ़ गयी....

    अक्सर ऐसा देखा गया है....आम लोग..अच्छे कहे जानेवाले लोग खुद की सुख-सुविधाओं में ही मशगूल रहते हैं और किसी की सहायता के लिए आगे नहीं आते....जबकि जमाना जिन्हें बुरा समझता है...वे ही अक्सर लोगो के काम आते हैं....यथार्थ के धरातल पा र्लिखी बढ़िया कहानी

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  12. वास्तविक धरातल पर लिखी एक पढ़े-लिखे बेवस बेचारा समझे जाने वाले आदमी की कहानी लगती है यह. अपने-अपने लिए जीते लोगों को कहाँ किसी के परेशानी समझने का मौका... जब तक दो पैसा नहीं जेब में और देने के लिए कुछ भेंट सच में कहाँ आसाँ है नौकरी ..... कहने भर को बहुत मिल जाते हैं लोगों के मदद करने वाले..लेकिन जब वास्तविकता देखो तो यही हाल है.... अपनी मध्य प्रदेश में ही देखों लाखों दैनिक वेतन भोगी ऑफिस और अफसरों की गुलामी में किस तरह घुट कर जीने को मजबूर हैं... चाहे वह कितना ही पढ़ लिखा हो लेकिन उसकी न तो घर और नहीं ऑफिस में पूछ परख है... इस दिशा में कहाँ मर्म को छू गयी...आभार

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  13. कहानी पढ़कर तो ऐसा लगा जैसे आपने मेरी कहानी लिख दी.हमारा भी यही हाल है अफसरों की जी हुजूरी करके उम्र गुजर गयी पर कमबख्त ये अफसर अपनी अफसरी झाड़ने से बाज नहीं आते. जब चाहे हम पर रौब झाड़ते रहते हैं. जी में आता है ........ पर करें भी तो क्या नेता और अफसरों ने तो देश का भट्टा बिठा रखा है खूब लूट मचा रखी है.इनसे अच्छा मुझे भी कभी कभी ये दादा किस्म के लोग अच्छे लगने लगते है अरे कम से कम कुछ तो अच्छा कर ही लेते है. आपने कहानी सच्चाई के बेस पर लिखी है बस इसी तरह बार-बार और भी अच्छी तरह से इनकी पोल खोलते रहना.
    हम भी घीस रहे है कंप्यूटर,,,,.जिसमें सरकारी काम तो कम लेकिन ज्यादा अफसरों के अपने काम होते रहते है..बस चल रहा है.
    आपका शुक्रिया .

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  14. jinhen ham bura samjh baithte hai we bhi be-vqt kaam aa jate hai aur jinse hamen umeed rahtee we we samay par kaam nahi aate hain....kahani mein aaj ke samajik juban bolti hai...

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जनाब गुल्‍लक में कुछ शब्‍द डालते जाइए.. आपको और मिलेंगे...