Friday, November 12, 2010

जन्‍मदिन और उमरगांठ

मुझ पर क्षुब्‍ध बारूदी धुएं की झार आती है
व उन पर प्‍यार आता है
कि जिनका तप्‍त मुख
संवला रहा है
धूम लहरों में
कि जो मानव भविष्‍यत्-युद्ध में रत हैं,
जगत् की स्‍याह सड़कों पर ।

कि मैं अपनी अधूरी दीर्घ कविता में
सभी प्रश्‍नोत्‍तरी की तुंग प्रतिमाएं
गिराकर तोड़ देता हूं हथौड़े से
कि वे सब प्रश्‍न कृत्रिम और
उत्‍तर और भी छलमय,

समस्‍या एक-
मेरे सभ्‍य नगरों और ग्रामों में
सभी मानव
सुखी,सुन्‍दर व शोषण-मुक्‍त
कब होंगे?

कि मैं अपनी अधूरी दीर्घ कविता में
उमग कर,
जन्‍म लेना चाहता फिर से
कि व्‍यक्तित्‍वान्‍तरित होकर
नए सिरे से समझना और जीना
चाहता हूं, सच।
0 मुक्तिबोध

*****
आज मेरा प्रकटीकरण दिवस यानी जन्‍मदिन है। वैसे मेरे दो जन्‍मदिन हैं। एक सरकारी और दूसरा अ-सरकारी या असर-कारी। एक मानना पड़ता है और दूसरे को मनाना। हां दोनों में ही 3 आता है। एक 30 अगस्‍त और दूसरा 13 नवम्‍बर। असल 13 नवम्‍बर है। शायद इसी तीन तेरह के चक्‍कर में घर वालों को स्‍कूल में नाम लिखाते समय 30 अगस्‍त याद रह गया। तो सरकार कहती है कि हम अगस्‍त में पैदा हुए और हम कहते हैं कि नवम्‍बर में। बहरहाल हकीकत यह है कि हम पैदा हुए हैं।  



जन्‍मदिन से जुड़ी बहुत-सी बातें हैं। पर सबसे महत्‍वपूर्ण है वह  तारीख जिसका महत्‍व कभी मेरे लिए जन्‍मदिन से भी ज्‍यादा हुआ करता था। वह है 18 नवम्‍बर। जन्‍म से छठवां दिन या छठी का दिन। जी हां ,वही छठी जिसे हम मुहावरों में इस्‍तेमाल करते हैं। छठी का दूध याद आ जाएगा, छठी का दूध पिया है आदि आदि। कहते हैं कि जन्‍म के छठे दिन छठीमाता आकर बच्‍चे की किस्‍मत लिखती हैं।

मुझ से पहले मेरे माता-पिता की दो संतानें हुईं लेकिन वे महीने भर के भीतर ही चल बसीं। जब मैं गर्भ में आया तो मानता की गई कि यह बच्‍चा रह जाएगा तो इसकी छठी पूजी जाएगी। वैसे हर बच्‍चे की छठी पूजी जाती है। लेकिन इस मानता का मतलब था कि बच्‍चा जीवत रहेगा तो उसके विवाह के होने तक हर साल छठी पूजी जाती रहेगी। कुछ ऐसा संयोग हुआ कि हमें यह दुनिया रास आ गई और हम जीवित रह गए। पिछले दिनों छठ का त्‍यौहार मनाया गया। सलिल वर्मा के ब्‍लाग यानी चला बिहारी ब्‍लागर बनने पर मैंने पढ़ा कि यह त्‍यौहार बच्‍चों की खुशहाली के लिए मनाया जाता है। संभवत: छठी और छठ के बीच ऐसा ही कुछ संबंध है। 
किसी जन्‍मदिन पर मां के साथ। 

हर साल जन्‍मदिन से ज्‍यादा छठी ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण रही। हर साल मेरे लिए दो जोड़ी नए कपड़े बनवाए जाते। एक जोड़ी जन्‍मदिन पर पहनने के लिए और एक जोड़ी छठी पूजा के लिए। जन्‍मदिन पर ब-कायदा रंगोली डालकर पटा बिछाया जाता । फिर पटे पर बिठाकर तिलक लगाया जाता। आरती उतारी जाती। मिठाई खिलाई जाती और कुछ पैसे दिए जाते। यह सब मां करतीं। मैं घर के बड़े यानी मां,पिताजी तथा दादी के पैर छूकर आर्शीवाद लेता। बहनों के पैर भी छूता। कोई और बड़ा उस समय घर में होता तो उनके पैर भी छूता। जन्‍मदिन की यह तारीख ज्‍यादातर सालों में दिवाली के आसपास ही पड़ती रही। सो उन दिनों घर में त्‍यौहार का माहौल होता ही था। गुजिया,पपडि़या,खखडि़या और सेव आदि हमेशा ही बनते। लेकिन जन्‍मदिन पर घर खाने में कुछ और बने न बने पर गुलगुले जरूर बनते। गुलगुले समझते हैं न आप। गुड़ के पानी मेंआटा घोलकर उसमें सूखा नारियल और मेवा मिलाकर उसे भजिए की तरह घी में तला जाता है। 

छठी के दिन मां उपवास करतीं। उपवास शाम को छठी माता की पूजा के बाद खोलतीं। मुझे सबसे अच्‍छी बात यह लगती कि छठी माता की कोई तस्‍वीर या मूर्ति नहीं थी। बस घर के एक कोने में पूजा की जाती। पर एक मजेदार बात थी। पहली छठी पूजा में एक नारियल और पूजा का रंगीन नाड़ा जो लगभग एक मीटर लम्‍बा रहा होगा लिया गया। इस नारियल और नाड़े को संभालकर रखा गया। जब मैं एक साल का हुआ तो नाड़े और नारियल को छठी की पूजा में रखा गया। नाडे़ में एक गांठ लगाई गई। दो साल का हुआ तो दूसरी गांठ। इस तरह हर साल एक गांठ उसमें लगा दी जाती। मां नारियल और उस नाड़े को अपनी संदूक में संभालकर रखती थीं। हर छठी पूजा पर उन्‍हें बाहर निकाला जाता। पूजा की जाती,गांठ लगाई जाती और फिर वापस संदूक में रख दिया जाता। आज सोचता हूं तो लगता है बच्‍चों की उम्र का हिसाब रखने के लिए यह देशज तरीका किसी मां ने ही ईजाद किया होगा। जितनी गांठें उतने साल की उम्र। इसे मैंने एक नाम दिया था-उमरगांठ।

पर उमरगांठ के साथ एक दुर्घटना हो गई। 1964 के आसपास पिताजी होशंगाबाद के पास पवारखेड़ा रेल्‍वेस्‍टेशन पर नियुक्‍त थे। हम वहीं रेल्‍वे क्‍वार्टर में रहते थे। पिताजी को कई बार रात की डयूटी के लिए होशंगाबाद जाना पड़ता था। ऐसी ही एक रात मां और हम तीन भाई-बहन एक कमरे में सो रहे थे। चोर घुसे और दूसरे कमरे में रखे संदूक उठाकर घर के पीछे खेत में ले गए। वहां बैठकर उन्‍होंने संदूक खोले। जेवर और कुछ नगदी के अलावा वे नारियल और उमरगांठ भी लेते गए। मैं आज तक यह समझ नहीं पाया हूं कि उन्‍होंने आखिर उसका क्‍या किया होगा। 

मां के सामने समस्‍या थी कि अब क्‍या करें। नानी ने कहा ,दूसरा नारियल रख लो और नया नाड़ा लेकर उसमें पिछली सब गांठ लगा लो। यही किया गया।

फिर से उसे मां ने संदूक में संभालकर रखा। हर साल वह छठी के दिन संदूक से बाहर आता। पूजा होती। उमरगांठ में एक गांठ लगती और फिर संदूक में वापस चला जाता। यह क्रम शादी होने तक यानी 27 साल की उम्र तक चलता रहा। शादी के बाद जो जन्‍मदिन आया तो छठी पूजा का उद्यापन कर दिया गया। नारियल और उमरगांठ नर्मदा में सिरा दी गई। मैंने मां से पूछा शादी के बाद इसे जारी क्‍यों नहीं रखेंगे। उन्‍होंने कहा अब इसकी जरूरत नहीं। शादी के बाद तुम्‍हारी किस्‍मत के साथ एक और किस्‍मत जुड़ गई है। यानी कि जीवन डोर किसी और के हाथ में सौंप दी गई है। 

बहरहाल जन्‍मदिन मनाना बदस्‍तूर जारी रहा। मां हर साल ब-कायदा टीका लगाकर, आरती उतारकर अपने हाथों से कुछ पैसे देकर आर्शीवाद देती रही हैं। कपड़े दो की जगह एक जोड़ी तो बनते ही रहे। कभी-कभी दो जोड़ी भी। पिछले कुछ सालों से मैं मां से कहता आ रहा था कि अब इस जन्‍मदिन समारोह का भी उद्यापन कर दो। बहुत हुआ। पर हर मां के लिए उसके बच्‍चे सदा बच्‍चे ही रहते हैं। तो वे भी नहीं मानीं। पर अब यह सिलसिला थमता लग रहा है। पिछले साल जन्‍मदिन पर मैं बंगलौर में था और इस साल भी यहीं हूं। परिवार भोपाल में है। मां होशंगाबाद में हैं।
वे फोन पर कहेंगी, ‘जहां रहो, खुश रहो।’
पिताजी भी ऐसा ही कुछ कहेंगे।
बेटे कबीर और उत्‍सव भी फोन में कहेंगे, ‘जन्‍मदिन मुबारक हो।’
और श्रीमती जी पूछेंगी, ‘मुन्‍ना जी कितने साल के हो गए?’मेरा बचपन का नाम मुन्‍ना है। सो वे मजाक में यही नाम इस्‍तेमाल करती हैं।
*
किसी एक जन्‍मदिन पर दोस्‍तों के साथ घर में



जब यह पोस्‍ट लिख रहा था तभी पहली शुभकामना फेसबुक के जरिए पुराने मित्र लालबहादुर ने दी और दूसरी कृष्‍णकुमार जी ने जो केरल शास्‍त्र साहित्‍य परिषद और भारत ज्ञानविज्ञान समिति से जुड़े हैं। यहां फोटो में बाएं से दाएं एकलव्‍य की सहयोगी कविता सुरेश , टुलटुल विश्‍वास, छाया दुबे और पत्‍नी निर्मला वर्मा हैं।पीछे लालबहादुर ओझा और मैं। तस्‍वीर छोटे बेटे उत्‍सव ने ली है। 
*
शुभकामनाओं से याद आया कि जन्‍मदिन पर मित्र शुभकामनाओं के साथ कुछ भेंट भी देते रहे हैं। कुछ भेंटें जो याद रह गई हैं उनका जिक्र कर रहा हूं। 1981 में जन्‍मदिन पर मैंने अपने मित्रों के लिए एक छोटी सी दावत घर में ही रखी थी।होशंगाबाद की रेल्‍वे कालोनी में ही रहने वाले एक मित्र दिनेश बरेले ने मुझे शुभकामनाओं के साथ कमलेश्‍वर द्वारा संपादित ‘गर्दिश के दिन’ भेंट की थी। पर साल की सबसे महत्‍वपूर्ण भेंट थी नई दुनिया अखबार की। 15 नवम्‍बर 1981 को मेरी पहली कहानी ‘सुचिता का फैसला’ उसमें प्रकाशित हुई थी। उन दिनों अखबार में यह सूचना भी दो दिन पहले प्रकाशित हो जाती थी,सो 13 नवम्‍बर को यह खबर मिल गई थी।
*
ए‍क दोस्‍त ने जिसका जिक्र मैंने भूले-बिसरे दोस्‍तों में किया था एक डायरी भेंट की थी जो अब तक मेरे पास है।
*
चकमक की कला-सज्‍जाकार और सहयोगी रहीं जया ने एक जन्‍मदिन पर कपड़े की बनी एक फाइल भेंट दी थी। वह भी मेरे पास अब तक सुरक्षित है।
*
एकलव्‍य की ही एक और सहयोगी शोभा‍ शिंगणे ने एक जन्‍मदिन पर मुझे एक कम्‍पास भेंट किया था जिसमें पेंसिल,रबर,कटर और एक स्‍टेप्‍लर था। बाकी सब सामान तो इधर-उधर हो गया पर कागजों को जोड़ने वाला स्‍टेप्‍लर मैंने संभालकर रखा है।
*
और अंत में एक यादगार भेंट का जिक्र। रास्‍ता इधर है..प्रगतिशील कवियों की प्रतिनिधि कविताओं का संकलन है। यह मुझे श्‍याम बोहरे जिन्‍हें मैं श्‍याम भाई कहता हूं से 1980 में मिला था। श्‍याम भाई होशंगाबाद में नेहरू युवक केन्‍द्र के समन्‍वयक थे। नेहरू युवक केन्‍द्र में ही मैंने अपनी नौकरी की शुरुआत की थी। श्‍याम भाई ने संकलन में लिखा.... प्रिय राजेश को इस विश्‍वास के साथ कि उसका लेखन सर्वहारा के संघर्ष को प्रखर स्‍वर देगा। स्‍नेह ... । पता नहीं मैं उनके विश्‍वास पर खरा उतर पाया हूं या नहीं, पर हां कह सकता हूं कि मैंने कोशिश जरूर की है।

उनके भेंट किए गए संकलन में मुक्तिबोध की दो कविताएं हैं। एक  ऊपर आपने पढ़ी। दूसरी की चार पंक्तियां मुझे बेहद प्रिय हैं। आज मुक्तिबोध का जन्‍मदिन भी है।
मुझे प्रिय और हमेशा याद रहने वाली पंक्तियां हैं-
रास्‍ता इधर है....
बशर्ते तय करो
किस और हो तुम
सुनहले ऊर्ध्‍व-आसन के
दबाते पक्ष में,
अथवा
कहीं उससे लुटी-टूटी
अंधेरी निम्‍न-कक्षा में तुम्‍हारा मन
कहां हो तुम ?

अब आपको जो कहना हो आप भी कह ही डालिए।
0 राजेश उत्‍साही  

34 comments:

  1. तीन-तेरह, अधिकारिक-अनाधिकारि के चक्कर में न पड़ते हुए आपको जन्मदिल की बधाई।

    ReplyDelete
  2. जन्म दिन की बधाई, गिफ़्ट और पार्टी वाली एंटरी मैचिंग में मानी जाये:)

    ReplyDelete
  3. राजेश भाई जन्‍मदिन की ढेरों बधाइयां। वैसे पूर्व में भी अन्‍य पोस्‍ट पर दे आयी थी। लेकिन इस पोस्‍ट ने बहुत सारी नवीन बातों का पता लगा। हमारे यहाँ भी विवाह के अवसर पर छोटे बच्‍चे की छठी पूजी जाती है और बहुत ही धूमधाम से रश्‍म होती है लेकिन उसका महत्‍व आज ही मालूम हुआ। आपको पुन: बधाई। अब उपहार स्‍वरूप तो हमारा प्रेम ही है।

    ReplyDelete
  4. jab bhi in yaadon ke kamron se gujarti hun ek geet sunayi deti hai... kadam chale aage mann piche bhage....... aapne in palon ko kis tarah sanjoya hai , ek ek lamha jivant ho utha hai, ek ek ehsaas apna wajood batate hain

    ReplyDelete
  5. जन्म दिन के लिए शुभकामनाएं और अपने सुखमय पलों को साझा करने के लिए धन्यवाद. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

    ReplyDelete
  6. आपको जन्मदिन की बहुत शुभकामनायें। संस्मरण पढ़कर बहुत ही अच्छा लगा।

    ReplyDelete
  7. जन्म दिन के लिए शुभकामनाएं

    ReplyDelete
  8. राजेश जी ,
    तीन तेरह का कुछ भी चक्कर हो आज जन्मदिन है तो बस ढेर सारी बधाई ....बहुत अच्छी पोस्ट लिखी है ...यादों की पिटारी खोल कर ...

    ReplyDelete
  9. @शुक्रिया रोहित भाई।
    @शुक्रिया संजय भाई। पार्टी आप कर लीजिए। मिलने पर भूल चूक लेनी देनी कर ली जाएगी।
    @अजीत जी आपका प्रेम ही सबसे अनुपम उपहार है। शुक्रिया। मेरा लिखना सार्थक हुआ।
    @ रश्मि जी मैं आपको भी यादों के कमरों में ले गया, यह मेरी उपलब्धि है। आभार।
    @ प्रवीण द्वय जी शुक्रिया।
    @ डोरोथी जी शुक्रिया।
    @ शुक्रिया संजय भास्‍कर जी।

    ReplyDelete
  10. अनूठी पोस्ट
    जन्म दिन की शुभ कामनाएं

    ReplyDelete
  11. राजेश भाई (शायद चाचा कहना ज्यादा उपयुक्त हो). जन्मदिन की बधाई स्वीकारें..एकलव्य वालों की पुरानी फोटो देखकर कई धुंधली यादें ताज़ा हो गयी. मुक्तिबोध को समझने की कोशिश करता हूँ कभी कभी, लेकिन भवानी दद्दा और दुष्यंत से इतना प्रेम है की ज्यादा अमूर्त में जाने का मन बिरले ही करता है...

    ReplyDelete
  12. ... knock ... आपके इस जन्‍मदिन पर बधाई का गुलदस्‍ता लिए यहो हम भी हाजिर हैं, कृपया स्‍वीकार करें.

    ReplyDelete
  13. राजेश जी ... हमने तो आने में देरी कर दी ... आपको जनम दिन की बहुत बहुत बधाई ... ढेरों शुभकामनाएं ....

    ReplyDelete
  14. सर्वप्रथम तो आपको जन्‍मदिन की बधाई। ‘मुक्तिबोध’ कहीं से ध्‍वनित होते ही मुझे उर्जा मिलती है। 'लेखन में चिंतन का मौलिक समावेश' के प्रती‍क मुक्तिबोध जी से एक संयोग साम्‍य मेरा भी है जन्‍म स्‍थली का। मुझे गद्य कविता की समझ तो नहीं मगर आपको आपके जन्‍मदिन पर भेंटस्‍वरूप एक प्रयास प्रस्‍तुत कर रहा हूँ।

    दिन का महत्‍व नहीं,
    हॉं हर वर्ष मुझमें पड़ जाता है
    एक नया वर्ष वलय,
    समेटे हुए पूर्व के सभी वर्ष वलय,
    बिना किसी लाग-लपेट, भेदभाव के, यथावत्।
    हॉं मैं एक वृक्ष हूँ,
    तथाकथित, मूढ़, अचर,
    मुझे नहीं ज्ञात,
    मनुष्‍य के लिये, वर्षगॉंठ का अर्थ क्‍या होता है,
    वर्ष के अनुभवों का सार गॉंठ में बॉंध लेना या .....।

    ReplyDelete
  15. @शुक्रिया भतीजे अभिमन्‍यु। बेशक राजेश चाचा कहो। और हम तो ब्‍लाग जगत में बने चाचा नहीं हैं,बल्कि सचमुच की दुनिया के परिचय से चाचा-भतीजे हैं। सुनील भाई यानी कि तुम्‍हारे पिताजी से से तो हमारा जीवंत रिश्‍ता रहा है। बात तुम्‍हारी सही है। पर मुक्तिबोध की ये कविताएं इतनी मुश्किल भी नहीं हैं और न ही अमूर्त। हां मुक्तिबोध जटिल कवि हैं इसमें कोई शक नहीं। भवानी भाई और दुष्‍यंत का तो खैर कोई जवाब ही नहीं। मैं भी उनका उतना ही प्रेमी हूं जितने तुम।

    ReplyDelete
  16. सबसे पहले तो जन्मदिन की आपको हार्दिक बधाई। दूसरे इस बात का आभार कि आपने इतनी दूर (विप्रो, सुरजापुर रोड से भी 3 किमी आगे)से यहाँ कगदासपुरा के हमारे निवास पर आने का अनुरोध स्वीकार किया। साथ निभाने के लिए भाई सैय्यद का भी आभार। माँ ने जिस जतन से 27वीं गाँठ तक आपको पाल-पोस कर 28वीं पर आ0 भाभीजी के सुपुर्द किया वह दिल को छू लेने वाला मार्मिक वर्णन आपने लिखा है। माँएँ अपने बच्चों के जीवन और स्वास्थ्य के लिए असम्भव व्रत भी धारण करती हैं, यह उसका प्रमाण है। वस्तुत: तो भारतीय, उनमें भी ग्रामीण परिवेश की, माँएँ दुनियाभर की माँओं में श्रेष्ठ है, अतुल्य हैं, पूज्य हैं।
    जन्मदिन की एक बार पुन: बधाई।

    ReplyDelete
  17. जन्मदिन की विलम्बित बधाई स्वीकारें. बहुत सुन्दर संस्मरणात्मक पोस्ट है. गुलगुले तो हमारे यहां भी बनते है, जन्मदिन पर.

    ReplyDelete
  18. नरेंद्र मौर्यNovember 14, 2010 at 11:45 AM

    जन्मदिन मुबारक।

    ReplyDelete
  19. राजेश जी,

    जन्मदिन की विलंबित शुभकामनाएं, सब कुछ वैसे ही होता है जैसे हमारे यहाँ होता है. पहले केक कहाँ होता था. गुलगुले और टीके से ही जन्मदिन मनाया जाता था. टीका करके मिठाई खिला दी और शगुन के लिए कुछ रुपये दे दिए. वैसे अपनी परम्पराओं से दूर नहीं गयी हूँ. मैंने केक के साथ आज भी टीका लगाती हूँ . यादों को बहुतसहेज कर रखा है.

    ReplyDelete
  20. जन्म दिन,मिल का पत्थर, यादों कि गठरी,पुराने तोहफों की बंद गुल्लक की खुशबू और यायावर से भटकते किसी रोज कैलेण्डर को देखकर याद याद कर लिया कि आज वो मनहूस १३ तारीख है जिस दिन को मेरे माँ बाप ने शुभ मान लिया, गोद हरी हो जाएँ के कारन और समझ लिया कि वही असली जन्मदिन है.. ३ हो ३० हो या १३ हो.. है यही सच है और आप सशरीर उपस्थित हैं हमारे बीच..
    गुरुदेव आपकी छाया हम पर बनी रहे..
    आज लौटा हूँ..मगर जब ब्लॉग देखो तभी जन्मदिन कि बधाई दे डालो.. १३ का भूला अगर १६ को बधाई दे डाले तो उसे भूल नहीं कहते!!

    ReplyDelete
  21. @शुक्रिया गिरीश जी।

    @स्‍वागत है राहुल जी आपका। और शुक्रिया भी।

    @कोई बात नहीं दिगम्‍बर जी। मेरा जन्‍मदिन तो 18 यानी छठी तक चलता ही रहता है।

    @तिलकराज जी आपकी कविता मेरे लिए उपहार है। शुक्रिया।

    @बलराम जी जन्‍मदिन के मौके पर घर से दूर एक और घर में आत्‍मीयता के साथ भोजन का उपहार मिले तो और क्‍या चाहिए। शुक्रिया आप सबको, आपने मेरे‍ लिए यह दिन खास बना दिया।

    ReplyDelete
  22. @शुक्रिया वंदना जी।

    @शुक्रिया नरेन्‍द्र भाई।

    @शुक्रिया रेखा जी। मजे की बात यह है कि मेरे जन्‍मदिन पर आजतक केक नहीं काटा गया।

    @सलिल भाई शुक्रिया। अपना तो जन्‍मदिन नहीं जन्‍मदिन सप्‍ताह चलता है यानी छठी तक जन्‍मदिन मनता ही रहता है । सो आप बिलकुल समय पर हैं।

    ReplyDelete
  23. छाया दुबे अमेरिका से-

    rajesh bhai... janmdin ki dher sari shubhkamnaen....

    aapki rachna umargath padkar achcha lagaa..

    photo share karne ka bahut bahut shukriya .. purana time yaad dila diya... miss those days...

    janmdin per patiye per baithaker tilak kerna, chhat ki pooja, nariyal aur pooja ka nadaa, lohe ka sandook... sab shabd aise hai jinhe padhker har aadmi apne bachpan mei pahuch jaata hai....

    likhte rahiye...

    chhaya

    ReplyDelete
  24. आदरणीय उत्साही जी,
    जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें। जन्मदिन के बहाने संस्कृति और परम्पराओं का स्मरण करना-कराना खास लगा। इस तरह की चीजें हमें अपनी मिट्टी, अपने परिवेश से न सिर्फ जोड़े रखती हैं बल्कि हमें ऊर्जावान भी बनाती हैं। दूसरी खास बात इस पोस्ट की मुक्तिबोध जी की रचनाएँ पडवाना रहा। उन्हें पढ़ते हुए एक अलग सी आत्मसंतुष्टि मिलती है, प्रेरणादायी तो होता ही है। आपका लिंक देकर आदरणीय बलराम अग्रवाल जी ने हमेशा की तरह उठने-बैठने का एक और सही ठिकाना दिखाया।

    ReplyDelete
  25. जन्मदिन की बहुत शुभकामनायें। संस्मरण बहुत ही अच्छा लगा

    ReplyDelete
  26. तो आज 18 नवम्बर है फिर तो आज खास बधाई।
    अब चाहे घर से दूर हैं मगर छठी तो यहीं मन जायेगी …………हमेशा की तरह्।्घर वालों ने चाहे बन्द कर दी है तो क्या हुआ एक बार फिर सही।
    आपको जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें।

    ReplyDelete
  27. बशर्ते तय करो
    किस और हो तुम

    राजेश भाई सच में हम आपकी ही और हैं लेकिन थोडा इधर उधर भटक गए इस लिए जनम दिन की शुभकामनाएं देने में देरी हो गयी...वैसे शुभकामनाओं की एक्सपायरी डेट नहीं होती जब देदो तभी नयी होती हैं...छठ देवी के आशीर्वाद से आप हम पाठकों को मिल गए इसके लिए हम उनके ऋणी हैं और रहेंगे...
    जहाँ रहें खुश रहे आनंद करें ये ही कामना करते हैं.

    नीरज

    ReplyDelete
  28. आपको अपना असर-कारी जन्मदिन के अवसर पर अनेक शुभकामनायें ... थोड़ी देर हो गई सो माफ़ी चाहता हूँ ...
    रचना सुन्दर और अद्भुत है ...

    कि मैं अपनी अधूरी दीर्घ कविता में
    सभी प्रश्‍नोत्‍तरी की तुंग प्रतिमाएं
    गिराकर तोड़ देता हूं हथौड़े से
    कि वे सब प्रश्‍न कृत्रिम और
    उत्‍तर और भी छलमय,

    बेहतरीन पंक्तियाँ !

    ReplyDelete
  29. अच्छे प्रसंगों के साथ लिखी गई पोस्ट
    मुक्तिबोध की कविता दिल को छू गई
    आपका आभार

    ReplyDelete
  30. प्रकटीकरण के सत्य के लिये बधाई।

    ReplyDelete
  31. ब्लॉग बुलेटिन की ५५० वीं बुलेटिन ब्लॉग बुलेटिन की 550 वीं पोस्ट = कमाल है न मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

    ReplyDelete
  32. बढ़िया पोस्ट | जन्मदिवस मुबारक

    ReplyDelete

जनाब गुल्‍लक में कुछ शब्‍द डालते जाइए.. आपको और मिलेंगे...