Friday, May 27, 2011

97...एक लुहार की

अगर मैं कहूं कि 9 जुलाई, 2010 का दिन ब्‍लाग की दुनिया में एक ऐतिहासिक दिन था, तो इसमें कोई अतिश्‍योक्ति नहीं होनी चाहिए। यही वह दिन था जब डॉ सुभाष राय अपनी बात को कविता में कुछ इस तरह कहते हुए आए-
कबीर ने कहा, आओ
तुम्हें सच की भट्ठी में
पिघला दूं, खरा बना दूं



मैंने  उनके शबद की आंच पर
रख दिया अपने आप को
मेरी स्मृति खदबदाने लगी
वेद, श्रुति, पुराण और उपनिषद
तलछट की तरह बाहर हो गये
जाति वाष्प बनकर उड़ गयी
ऊंच-नीच का दर्प भस्म हो गया
शबद रह गया सिर्फ अनहद
गूंजता हुआ मेरे महाकाश में 

कबीर ने पूछा, क्या देख रहे हो 
अब अपने भीतर, बताओ 
मैं चुप रहा, बिल्कुल खामोश 
जब मेरे भीतर-बाहर 
कबीर ही कबीर था  
जब मैं था ही नहीं तो 
कौन देता जवाब, किसे 

यही है साखी, कहा कबीर ने 
और मैं स्पंदन में बदल गया 
नाद में तबदील हो गया
अब मैं अपना घर 
फूंकने को तैयार हूँ
लुकाठा थामने को तैयार हूँ  
*
फिर उन्‍होंने कहा, साथियों, आज का सबसे बड़ा संकट यह है कि मनुष्य को ही किनारे कर दिया गया है। कविता न केवल मनुष्य को बचाती है बल्कि उसे संस्कारित भी करती है और उसे फिर से रचती भी है। इसी अर्थ में कविता आज की सबसे बड़ी जरूरत है। यूं तो यह काम साहित्य की सभी विधायें करती हैं पर कविता की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। इसी समझ के साथ इस ब्लाग की शुरुआत की गयी है। यह मेरा नहीं आप सबका ब्लाग होगा। मैं चाहूंगा कि कविता के सभी रूपों, गज़ल, गीत, नवगीत, छन्दमुक्त और पारम्परिक छन्दों में रचना करने वाले सभी मित्र इसमें शामिल हों। इसे कविता पर बहस का मंच बनाने के लिये आलोचनात्मक टिप्पणियां भी आमंत्रित हैं। अच्छी और चुनी हुई रचनाओं और टिप्पणियों का साखी में प्रकाशन किया जायेगा। अपनी रचनायें भेजकर इस आन्दोलन में शामिल हों।
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अब तक आप समझ ही गए होंगे कि यहां बात साखी की हो रही है। साखी शुरू हुआ तो लगा जैसे ब्‍लाग जगत में एक नई लहर ही आई गई है। सुभाष जी हर सोमवार किसी एक कवि या शायर की रचनाएं साखी पर प्रस्‍तुत करते और उस पर जो प्रतिक्रियाएं आतीं, उन्‍हें समेटते हुए वे शुक्रवार को एक समग्र समीक्षा का प्रकाशन भी करते। समीक्षा में उठे बिन्‍दुओं पर मूल रचनाकार अपनी बात भी रखता। प्रतिक्रिया देने वाले लौट-लौटकर आते। जल्‍द ही यह प्रयोग नई ऊंचाईयां छूने लगा। वहां कविता,ग़ज़ल ,गीत की बारीकियों और उनके सामाजिक सरोकारों पर बहस होने लगी। अरूणा राय, डॉ त्रिमोहन तरल,संजीव गौतम,गिरीश पंकज, मदनमोहन शर्मा,श्रद्धा जैन, ओमप्रकाश नदीम, प्राण शर्मा, अशोक रावत, वेद व्‍यथित, मनोज भावुक, नीरज गोस्‍वामी आदि की कविताएं, गज़लें साखी पर आईं। उन पर जमकर चर्चा हुई । इन रचनाकारों की रचनाओं और उन पर हुई चर्चा को साखी पर आज भी देखा जा सकता है। वे ब्‍लाग जगत की अमूल्‍य धरोहर हैं।
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फिर अचानक अक्‍टूबर,2010 में एक दिन सुभाष राय जी ने घोषणा की कि साखी को स्‍थगित किया जा रहा है। क्‍योंकि वे दैनिक जनसंदेश टाइम्‍स के संपादक बनकर आगरा से लखनऊ जा रहे थे। पर उन्‍होंने वादा किया कि वे जल्‍द ही ब्‍लाग की दुनिया में लौटेंगे और साखी को फिर से आरंभ करेंगे।
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वादे के मुताबिक वे अप्रैल,2011 में फिर से लौटे। उन्‍होंने कहा की कि जल्‍द ही चन्‍द्रभान भारद्धाज की ग़ज़लें लेकर आ रहे हैं। वे आए भी। साखी फिर से शुरू हो गया है। बहुत से साथियों को शायद यह खबर भी नहीं है। अगर आप अब तक वहां नहीं पहुंचे हों तो जरूर आइए। अभी उस पर पहले जैसी गहमागहमी नहीं है। पर उम्‍मीद है कि जल्‍द ही होगी। पर हां साखी के फिर शुरू होने की गहमागहमी अभी कहीं और है।
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साखी दुबारा शुरू हुआ तो मुझ जैसे कई साथियों को बहुत खुशी हुई। लेकिन कुछके को कुछ इतनी ज्‍यादा खुशी हुई कि वे ‘पगला’ ही गए और अपने ब्‍लाग पर अनाप-शनाप लिखने लगे। साखी पर आने वालों को मुर्दा,श्‍वान,दादुर आदि जैसे विशेषणों से नवाजने लगे। जैसा मैंने कहा‍ कि साखी पर प्रकाशित होने वाली रचनाओं पर जमकर बहस होती रही है। बहस करने वालों में अपना नाम भी रहा है। अब यह अलग बात है कि अपन तो साहित्‍य का क ख ग भी नहीं जानते। लेकिन इसके बावजूद अपनी बात कुछ लोगों को अंदर तक छील देती है। नतीजा यह होता है कि वे हमें किराए का गुंडा तक घोषित कर देते हैं। धृष्‍ट और दुष्‍ट तो अपन हैं ही।  शायद उन्‍हें यह मालूम भी नहीं होगा कि 'गुंडा' शब्‍द किसी जमाने में निर्बलों की मदद करने वालों के लिए उपयोग किया जाता था। हां वे बिना किसी लाभ की अपेक्षा के यह काम करते थे। जयशंकर प्रसाद जी एक मशहूर कहानी है इस नाम से। इसलिए अपन को यह लेबल भी मंजूर है। 

साखी की खासयित रही है कि उस पर आने वाली प्रतिक्रियाओं पर कोई मॉडरेशन नहीं है। हां अगर मॉडरेटर को किसी प्रतिक्रिया पर कुछ कहना होता है तो वह खुद वहां आकर अपनी टिप्‍पणी दर्ज करता है। ऐसे में मेरे द्वारा ही नहीं, औरों द्वारा कही जा रही हर बात साखी पर प्रकाशित होती रही है। तो इन प्रतिक्रियाओं से एक तथाकथित महान रचनाकार को बहुत कष्‍ट पहुंचा। उस समय उन्‍हें जो कहना था उन्‍होंने वह कहा ही। पर उतने से शायद उनका मन नहीं भरा । वे अंदर ही अंदर आठ महीने तक (अक्‍टूबर से मई) इससे तड़फते रहे और शायद अभी भी तड़फ रहे हैं। जैसे ही साखी दुबारा शुरू हुई वे अपनी ब्‍लागश्‍ाय्या पर कराहने लगे। उन्‍होंने अपने ब्‍लाग पर एक निंदा ग़ज़ल लिख डाली। उस पर जो प्रतिक्रियाएं आईं उनके बहाने उन्‍होंने अपने सब घाव खोलखोलकर दिखा डाले। अब क्‍या कहें, उनकी इस पीड़ा का इलाज तो हकीम लुकमान के पास भी नहीं है। (कृपया ऊपर दिए नामों में इन तथाकथित महान रचनाकार को खोजने का प्रयत्‍न न करें। उनका नाम आदि में है।)
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यह सब पढ़कर मैंने सुभाष जी से कहा कि ,'हुजुर हमारा मेहनताना दे दीजिए। अब तो हम आपके गुंडे भी घोषित हो गए हैं।' उन्‍होंने कहा,' मेहनताना तय करना मेरे वश की बात नहीं‍, तुमने जिनकी कुटाई की है, उनसे ही पूछना पड़ेगा।' 
अब अपन तो सुनार की तरह ठक ठक नहीं करते, बस लुहार की नाईं एक-दो हाथ में ही कुटाई या ठुकाई कर देते हैं। यानी कि सौ सुनार की, एक लुहार की।  
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मुझे पता है कि यह पोस्‍ट कई मित्रों को अच्‍छी नहीं लगेगी। संभव है कुछ तो शायद नाराज ही हो जाएं। उनकी नाराजी सिर माथे। आप ही बताएं कि क्‍या चुप बैठना उचित होगा। इस पूरे प्रकरण पर साखी पर भी सुभाष जी ने एक पोस्‍ट लगाई है - तीस मार खान शीर्षक से। आप उसे भी देख सकते हैं। 

ऐसे हालात में साखी पर ही प्रकाशित मदन मोहन शर्मा अरविंद जी की एक ग़ज़ल का शेर याद आ रहा है-

कुछ मिटने का खौफ नहीं कुछ आदत की मज़बूरी है
जो दिल में है सब कहता हूँ मैं भी कितना पागल हूँ.
                                          0 राजेश उत्‍साही


15 comments:

  1. साहित्‍य, चर्चा का नहीं, भजन-पूजन का क्षेत्र मान लिया जाता है. हमारी भी जै जै, तुम्‍हारी भी जै जै और वाह-वाह भी ब्‍लॉग साहित्‍य में अधिकतर दिखता है.

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  2. राजेश जी क्या कह रहे हैं? ऐसे कौन लोग हैं जो साखी की बुराई और उसमें छपने वालों को अभद्र शब्द कह रहे हैं...हमें तो पता ही नहीं चला...कुछ लिंक दें तो हम भी उन महानुभावों के कृत्यों पर दृष्टि डालें...आपको गुंडा कहा...???? ये तो हद हो गयी...साखी जैसा ब्लॉग इन सब बातों के बावजूद चलेगा क्यूँ के उसके चलने के पीछे की भावना बहुत पावन है...

    नीरज

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  3. हिंदी ब्लॉग जगत में संवेदनशील लोगो का काम नहीं है , एक से एक विशिष्ट मानसिकता के लोग यहाँ काम कर रहे हैं उन्हें इससे कोई मतलब नहीं कि कोई कितना बेहतरीन काम कर रहा है ....
    इस निराशाजनक स्थिति में लिखने से मन उचाट हो जाना स्वाभाविक है राजेश भाई !
    साखी को पढना अवश्य चाहूँगा ! सुभाष राय जी को तथा आपको शुभकामनायें !

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  4. priy Rajesh main kya kahoon, inka, unka, sabka kaha hua kuchh rakhana tha so taiyaar hai, abhi sakhi par dal raha hoon. tumharee is tippadee ka link bhee vahan de raha hoon. vaheen padhana. tum koi log-lapet naheen rakhkar sachchee kah dete ho, yah mera man moh leta hai.

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  5. साखी की अपनी पहचान है और उसका हमेशा दिल से स्वागत है और आप तो सिर्फ़ अपना काम करे जाइये बाकी दुनिया है कुछ तो कहेगी कहने दीजिये और मस्त रहिये।

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  6. इन सब विवादों का तो हमें पता ही नहीं...
    और कुछ तो लोग कहेंगे ही ....उनकी क्या फ़िक्र करनी.

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  7. साहित्य का रस संभवतः अच्छे या बुरे विशेषणों में बाँधने में नहीं है। बुरे को सार्वजनिक रूप से बुरा कहना सत्य हो सकता है, साहित्य नहीं।

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  8. जब ऊँगली उठे आलोचना हो धुंआ दिखे तो खुश होईये, कि खासियत है ... गलत पर ऊँगली उठाने का साहस नहीं होता , तो निश्चिन्त रहिये

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  9. बाबा भारती जी!
    आपका आदेश,सर माथे. मुझे तो पानी प्रतिभा का पता साखी पर जाकर ही लगा और तब मैंने महसूस किया कि यार अपुन भी "कुछ" ज्ञान रखते हैं. खुद को सदा एकलव्य ही मानकर शब्द संधान किया है. स्वास्थ्य अब बेहतर हो चला है.. जल्द ही साखी पर "दो दो हाथ" करने और "पोस्टमार्टम" करने हाज़िर होता हूँ. सुभाष जी की सूचना मिली थी, पर हाथ से लाचार था.

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  10. साखी के अनवरत संचालन के लिए अनेक शुभकामनाएँ...

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  11. हमें तो आपकी बात अच्छी लगी की कविता ज़रूरत है साखी के पुन: प्रकाशन के लिए शुभकामनायें ....

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  12. कुछ मिटने का खौफ नहीं कुछ आदत की मज़बूरी है
    जो दिल में है सब कहता हूँ मैं भी कितना पागल हूँ.
    ...अपनी तरफ से अच्छा सोचने वाले करने वालों को आज भला ही बहुत बुरा भला कहते है लेकिन अच्छा इंसान अच्छा ही होता है...... ....बोलने वालों का मुहं कोई बंद नहीं कर सकता है, और जिसे आलोचना करने में ही मजा आता है वह और कर भी क्या सकता है,... कबीर की बात निकली है तो उन्होंने उस समय जो आडम्बर व्याप्त था, जो आज तक जारी है, इतने सटीक और बेबाक कहा जो आज कोई बोलने से पहले दस बार जरुर सोचेयेगा..... सच बोलने वालों को आज न जाने क्या-क्या सुनना पड़ता है, लेकिन बुरा बोलने वालों की बात का जिस तरह कबीर बुरा नहीं मानते थी उसी तरह बुरा मानने में ही भलाई है... ऐसे लोग बड़े बेशर्म होते है इस बात बात यह कहावत बिलकुल सही है की " जिसकी उतर गयी लोई उसका क्या करेगा कोई" .. उनसे तो इश्वर भी दूर भागते हैं...

    बहुत बढ़िया प्रस्तुति और साखी के पुन: प्रकाशन के लिए शुभकामनायें .....
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  13. हमारे लिये ’साखी’ की साखी अब तक अनजानी थी। राजेश भाई, सही नीयत से कुछ भी करते रहिये। कहने वालों ने तो अवतारों को भी नहीं बख्शा, लुहार क्या चीज हैं:)

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  14. इस बहाने "साखी" से परिचय हुआ । धन्यवाद ।

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जनाब गुल्‍लक में कुछ शब्‍द डालते जाइए.. आपको और मिलेंगे...