Saturday, January 29, 2011

जब बुद्ध फिर मुस्‍कराए....


पान,बीड़ी-सिगरेट,तम्‍बाकू न शराब
अपन को मोहब्‍बत का नशा है जनाब

जब मैं कहता हूं कि मैंने अब तक शराब,बीड़ी,सिगरेट और तम्‍बाकू या अन्‍य किसी नशे की चीज को हाथ भी नहीं लगाया है तो लोग अफसोस जताते हुए कहते हैं उत्‍साही जी आपने यह क्‍या किया। आपने जिंदगी का मजा लिया ही नहीं। क्‍या सचमुच?

सोचता हूं आखिर मैं कैसे बचा रहा। मित्र मण्‍डली में भी बीड़ी- सिगरेट पीने वाले दोस्‍त रहे। तम्‍बाकू खाने वालों की संख्‍या भी अच्‍छी खासी रही। फिर भी कभी मन नहीं हुआ। जब 16-17 साल का था तो दो साल घर से बाहर रहने का अवसर भी आया। लेकिन वहां भी ये आदतें नहीं पाल सका। पिछले दो साल से बंगलौर में हूं घर से दूर। कोई भी देखने वाला या टोकने वाला नहीं है,फिर भी इन नशों को नस में उतारने का मन नहीं हुआ। न जाने क्‍यों ?
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घर में पिताजी और दादी को मछली खाने का शौक था। सो जब तब घर में बनती तो खाना ही पड़ता। हालांकि मुझे कभी पसंद नहीं रही। मछली में कांटे होते हैं, खाते समय बहुत संभालकर खाना पड़ता है।मुझे यह हमेशा झंझट का काम लगता था। फिर जिस दिन घर में मछली बनती उस दिन घर का माहौल तनाव पूर्ण हो जाता, क्‍योंकि मां को यह पसंद नहीं था। वे रोटियां बना देतीं, मसाला पीसकर दे देतीं। सिगड़ी को रसोई से बाहर आंगन में निकालकर रख देतीं।पिताजी से कहतीं, यहीं बनाओ और यहीं खाओ। अच्‍छी बात यही थी कि ऐसा मौका महीने में एकाधबार ही आता। आमतौर पर पिताजी अपना यह शौक बाहर ही पूरा कर लेते। जब कभी दादी का मन होता तभी घर में मछली बनती।
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शादी हुई तो श्रीमती जी मटन और चिकन की शौकीन निकलीं। पर बस इतनी कि महीने में उन्‍हें एक-दो बार ही खाना अच्‍छा लगता। पर उसी बीच अंडे ने अपनी उपलब्‍धता के कारण रसोई में अपनी उपस्थिति अनिवार्य बना ली थी। आमतौर पर शाम के वक्‍त अगर कुछ अधिक खाने या बनाने का मन न हो तो अंडे की भुर्जी पहली पसंद होती। खासकर बच्‍चों की, जो सब्‍जियों के नाम सुनते ही बिदक जाते।

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फिर एक दिन अचानक कुछ ऐसा हुआ कि मैं शुद्ध शाकाहारी हो गया। अंडा तक खाना छोड़ दिया। बात 1998 की है जब बुद्ध फिर मुस्‍कराए थे। (भारत ने 11 मई 1998 को दूसरा परमाणु परीक्षण किया था। 'बुद्ध मुस्‍कराए', 1974 में किए गए पहले परमाणु परीक्षण का कोडवर्ड था।) मेरे पास इसका कोई ऐसा कारण नहीं है जिसे मैं तर्क के रूप में रख सकूं। पर हां पिछले 12 सालों से मैं अपने प्रण पर कायम हूं। यहां दोपहर में कैंटीन में अन्‍य साथी सामने ही बैठकर नानवेज खाते हैं। पर मुझे न तो कभी कोई समस्‍या हुई और न ही कभी मन किया कि फिर शुरू किया जाए। श्रीमती जी और बच्‍चे अब भी खाते हैं। हां पर बहुत नियमित नहीं। दो-तीन महीने में एकाध बार। अंडा तो उनसे भी छूट गया है।

अपने इस प्रण से मुझे यह ताकत तो मिली कि अगर मैं किसी चीज से दूर रहने या उसे छोड़ने का मन बना लूं तो वह कर सकता हूं।
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एक और चीज है जो अब आदत नहीं रही। पहले सुबह-सुबह अगर एक कप चाय न मिले तो लगता था कि दिन शुरू ही नहीं होगा। पर अब तो कई बार इसके बिना ही दिन गुजर जाता है।  

पिछले दो साल में दो और चीजें मुझ से दूर हो गई हैं। पहली टीवी और दूसरी अखबार। पहले सुबह-शाम के दो-तीन घंटे टीवी के सामने ही गुजरते थे। अखबार भी रोज आधा पौना घंटा खाता ही था। लेकिन यहां बंगलौर आया तो टीवी नहीं लिया। हिन्‍दी अखबार मिलता नहीं है और अंग्रेजी अखबार अपने से पढ़ा नहीं जाता। शायद यही वजह है कि ब्‍लागिंग का यह नया शौक लग गया। पर कोशिश यही है कि इसका नशा भी सिरकर चढ़कर न बोले ।
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...और मोहब्‍बत। उसके तो अपन लती हैं और हमेशा रहेंगे।
                                     0  राजेश उत्‍साही   

16 comments:

  1. साकाहारियो की मंडली में स्वागत है , चाहे नशे से दूर रहना हो या मासाहार का त्याग करना हो यदि व्यक्ति खुद की इच्छा से इनसे दूर रहने की सोच ले तो ये कोई भी मुश्किल काम नहीं है किन्तु लोगों की इच्छा की कमी इसे एक मुश्किल काम बना देती है | १२ -१३ साल की उम्र तक मै भी मासाहारी थी या ये कहिये की बस घर में बाकि बच्चो को देख बचपना में खाती थी समझ आते ही मैंने छोड़ दिया इसलिए उसे छोड़ने में मुझे कोई तकलीफ नहीं हुई किन्तु अपने पति को भी मैंने बड़ी आसानी से उसे छोड़ते देखा तब मुझे लगता था की कैसे लोग कहते है की ये आदत जल्दी छूटती नहीं शायद लोगों में खुद ही उसे छोड़ने की इच्छा नहीं होती है | बाकि ब्लोगिंग ने तो टीवी अखबार के साथ ही और कई चीजे छुड़ा दी है मेरी, पर अब ये नशा भी मेरे नियंत्रण में आ चूका है |

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  2. आप जीवन को सरल करते जा रहे हैं, आपसे तो सीखना पड़ेगा।

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  3. बड़े भाई! अब समझ में आया कि पानी कैसे अपनी सतह खोज लेता है.. मैं पैदायशी शाकाहारी, एक सम्पूर्ण मांसाहारी परिवार में, मैं धूम्रपान से लाइट ईयर दूर जबकि परिवार के तीनों बड़े पुरुष सदस्य (दादाजी, पिताजी और चाचा जी)धूम्रपान के माहिर.
    अपौन पर तो पैदायशी बुद्ध मुस्कुराते रहे हैं.. हाँ मोहब्बत की शराब ख़ूब छक कर पी है और उम्र भर यह मिलती रहे यही दोआ है मालिक से!!

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  4. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (31/1/2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
    http://charchamanch.uchcharan.com

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  5. लत लगी रहे, हम तो दुआ करेंगे।

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  6. पता नहीं बुद्ध दोबारा कब मुस्कुराएंगे। पर हां सिगरेट ऐसे ही छोड दी थी.....रही बात मोहब्बत के नशे की..तो वो तो जन्मजात है बेशर्म सी.....

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  7. जो बिन पाले पली रहे, वही लत अच्‍छी और मुबारक.

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  8. राजेश जी अपना भी हाल ऐसा ही कुछ है...किसी प्रकार की लत ने अभी तक तो पीछा किया नहीं और आगे करे इसकी सम्भावना अभी तक तो नज़र नहीं आती...मैं भी आपकी तरह पिछले दस सालों से घर से दूर हूँ लेकिन अपने में मस्त...लत उन्हें पड़ती हैं जो समय बिताना नहीं जानते हमें तो पढने लिखने से फुर्सत ही नहीं मिलती किसी चीज़ की लत कहाँ से पड़ेगी...और टी.वी. देखने से तो हम सोना अधिक पसंद करते हैं...अखबार से दोस्ती सिर्फ दस मिनट की है इस से अधिक नहीं...बाज़ार भाव कभी समझ आये नहीं इसलिए ख़बरें पढ़ कर छोड़ देते हैं...बकौल निदा फाजली साहब, हम तो भाई नादान की श्रेणी में आते हैं, हमें मालूम है दो और दो हमेशा चार नहीं होते कभी एक तो ग्यारह भी हो सकते हैं...

    दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहाँ होता है
    सोच समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला

    नीरज

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  9. अपने जैसे लगते हो यार !!
    कोई आदत और लत नहीं पाली आज तक ऐसी कोई चीज नहीं जिसके बिना गुजरा नहीं हो सकता ! सुबह की चाय मिल जाये तो अच्छा है न मिले तो याद नहीं आती ! बड़ा प्यारा लेख लिखा है एक विषय दिया है आपने !
    शुभकामनायें !

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  10. मन में निश्चय कर ले तब कुछ भी छोड़ना ,शायद दुष्कर नहीं होता...क्यूंकि उस तरफ से मन ही उचाट हो जाता है...जो लोग नहीं छोड़ पाते, वे सच्ची कोशिश नहीं करते शायद.

    आप अखबार पढना छोड़ कर खुश हैं....और मुझे हमेशा अपराधबोध होता है...अगर समय ना मिल पाए...अखबार जमा होते जाते हैं...अपने पढ़े जाने की राह तकते...अब ऐसे भी सोच कर देखूंगी...कि कोई फर्क नहीं पड़नेवाला.

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  11. ...और मोहब्‍बत। उसके तो अपन लती हैं और हमेशा रहेंगे।

    हम भी...

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  12. मेरे हिसाब से जो लोग नशे का सहारा लेते हैं वे बहुत कमजोर इंसान होते हैं! बहानेबाजे करते हैं... आखिर जो लोग नशा नहीं करते वे भी तो जीवित रहते हैं फिर लत लगने पर न जाने किस मुहं से कहते हैं की छोड़ी नहीं जाती, अरे जब इंसान जीना छोड़ फाँसी के फंदे पर झूल सकता है तो नशा क्यूँ नहीं छोड़ सकता...
    मैं तो यही कहूँगी की यदि नशा अच्छे काम करने का हो तो फिर इसमें बुरा क्या !!
    बहुत अच्छी लगी आपकी यह पोस्ट .. शुभकामनायें

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  13. ..शायद यही वजह है कि ब्‍लागिंग का यह नया शौक लग गया। पर कोशिश यही है कि इसका नशा भी सिरकर चढ़कर न बोले ।................... हाँ भैया बचकर रहना बहुत रोगी हैं ब्लॉग्गिंग के... वैसे तो बुरा तो कुछ नहीं मगर फिर भी ..... और
    ...और मोहब्‍बत। उसके तो अपन लती हैं और हमेशा रहेंगे... ये तो अच्छी बात है पर इधर उधर देखभाल कर इसमें भी आजकल धोखे ही धोखे हैं .....
    बहुत बढ़िया लगी आपकी पोस्ट ..मजा आ गया पढ़ कर ... सोचता हूँ कि मैं भी लिखा शुरू कर दो ब्लॉग ....धन्यवाद जी .....

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  14. जीभ और मन पर नियंत्रण बड़ी बात है। अपने विचार से तो न कुछ पकड़ो ना कुछ छोड़ो।...उम्दा पोस्ट।

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जनाब गुल्‍लक में कुछ शब्‍द डालते जाइए.. आपको और मिलेंगे...