Saturday, October 30, 2010

नुमाइंदे : एक लघुकथा

शहर के लगभग बाहर पत्‍थर तोड़ने वालों की बस्‍ती में मजदूरों की दयनीय स्थिति देखकर उनके बीच कुछ काम करने की इच्‍छा हुई।
*
बस्‍ती के हमउम्र लड़के और उनसे छोटे बच्‍चे मेरी बातें रुचि और ध्‍यान से सुन रहे थे। शायद कुछ कल्‍पनाओं में अपने आपको फुटबाल,व्‍हालीबॉल खेलते हुए,पढ़ते हुए भी देखने लगे थे। उनकी सपनीली आंखों में मुझे भी वह सब नजर आ रहा था।


तभी पीछे वाले झोपड़े से एक अधेड़ निकल आया।
‘ सबरा शहर मर गवा है का। यिहां आये हो फिटबाल,बिलीबाल खिलान। इन मोड़ा-मोडि़न का पढ़इएके का कलीक्‍टर बनाई दोगे। कछु नहीं हुइए यिहां। ....... भैया से पूछों हे तुमने? बस घुस आए।’
मैं हतप्रभ रह गया। मैंने कहा, ‘मैं जो कुछ करना चाहता हूं, उसके लिए......भैया मना नहीं करेंगे।’
‘ कछ़ु नहीं। पेलें.....भैया से पूंछ के आओ।’
सामने बैठे युवक से रहा नहीं गया। बोला,  ‘ हलकू दादा,ये यहां हमें पढ़ाएंगे। अच्‍छी बातें बताएंगे। एकाध घंटा कुछ खेल खिलाकर मन बहला दिया करेंगे। कोई चकलाघर तो खोलेंगे नहीं।’
उसके पास शायद इससे बेहतर तुलनात्‍मक उदाहरण नहीं था।
‘ .........भैया कहियें तो चकलाघर भी खुलिहे।’ यह हलकू दादा का स्‍वर था।
*
.......भैया उस बस्‍ती के वार्ड मेम्‍बर हैं।
                                      0 राजेश उत्‍साही

(अपने जमाने के जाने-माने व्‍यंग्‍य कवि सुरेश उपाध्‍याय के संपादन में निकलने वाले एक साप्‍ताहिक अखबार -मकालू टाइम्‍स,इटारसी,मप्र- के 14 जनवरी,1982 के अंक में प्रकाशित)

9 comments:

  1. बड़े भाई! उन पत्थर तोड़ने वालों की बस्ती ने उन्हें भी पत्थर का बना दिया है... कहीं कोई सम्वेदानाओं का सोता दबा भी होता है तो इन भैया जी (मेरे विचार से ये छुटभैया जी होने चाहिये)जैसे लोग उसमें ज़हएर घोल देते हैं... पत्थरों में सुगबुगाती सम्वेदनाओं का एहसास कराती लघुकथा!!

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  2. लघुकथा अच्छी लगी।

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  3. भैया कहियें तो चकलाघर भी खुलिहे।’

    वाकई 'भैया' की मर्जी. पर उनके अहं को चोट न पहुँचे.
    तल्ख लघुकथा

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  4. देख तेरे इस देश की हालत क्या हो गयी भगवान।

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  5. बहुत अच्छी लगी कहानी

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  6. samaj ki katu sachchhai ko ujager karti ek sundr laghukath.............

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  7. GALI-GALI KI KAHANI HAI.
    UDAY TAMHANEY.
    BHOPAL.

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