Sunday, November 27, 2011

'बालसखा' हेमराज की यादें

(22.6.1968**25.11.2008)

मित्रो, पिछले बरस मैंने 25 नवम्‍बर को यह पोस्‍ट लगाई थी। 25 नवम्‍बर,2011 को हेमराज भट्ट की तृतीय पुण्‍यतिथि थी। यह पोस्‍ट लगभग ज्‍यों की ज्‍यों फिर से प्रस्‍तुत है। हां इस पोस्‍ट में जो नई बातें हैं वे इसी रंग में हैं। आपमें से बहुत से साथियों ने इस पर पिछले बरस टिप्‍पणी की थी। एक बार फिर से आप सबका स्‍वागत है।  
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हेमराज भट्ट ‘बालसखा’ से मेरी पहली मुलाकात 2000 के आसपास लखनऊ में नालंदा संस्‍था द्वारा आयोजित बालसाहित्‍य निमार्ण की एक कार्यशाला में हुई थी। मैं स्रोत व्‍यक्ति था और हेमराज भागीदार। कार्यशाला में मैंने उसे एक संकोची, चुप रहने वाले और विनम्र व्‍यक्ति के रूप में ही जाना था। बाद में सम्‍पर्क और गहरा हुआ।
उसका कारण था चकमक पत्रिका। हेमराज अपनी रचनाएं मुझे भेज रहा था। कई मैंने वापस भी कीं और कुछेक को चकमक में प्रकाशित भी किया। इस कारण से हेमराज से संवाद का एक सिलसिला लगातार बना रहा। पढ़ने की उसमें जबरदस्‍त ललक थी। मुझे याद है दिल्‍ली में आयोजित एक विश्‍वपुस्‍तक मेले में वह मौजूद था। मैं एकलव्‍य के स्‍टाल में था। हेमराज आया उसने किताबें देखीं। कहा, राजेश जी आप तो सबकी एक-एक प्रति दे दो। चकमक और संदर्भ के बाउंड सेट भी दे दो। मैं आश्‍चर्य चकित था एक प्राथमिक शाला का शिक्षक अपने निजी पैसे से (लगभग 3000रूपए) सब कुछ खरीदकर ले जा रहा है। एकलव्‍य द्वारा प्रकाशित तीनों पत्रिकाओं का वह ग्राहक था।
बाद में हेमराज से मेरी दो और मुलाकातें हुईं। एक लखनऊ में वैसी ही एक कार्यशाला में और दूसरी भोपाल में।
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भोपाल की दूसरी मुलाकात मेरे जीवन में बड़े परिवर्तन का कारण बनी। कुछ हुआ यूं कि अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन के साथी अनंत गंगोला के साथ हेमराज मप्र की यात्रा पर आए हुए थे। वे एकलव्‍य में भी आए। हम तीनों एकलव्‍य के परिसर में खड़े बतिया रहे थे। नालंदा के पुराने साथी और वर्तमान में अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन में कार्यरत कमलेश जोशी की चर्चा निकली। 
हेमराज ने कहा, 'जोशी जी तो फाउंडेशन में आ गए हैं। ' 
अचानक मेरे मुंह से निकला,  'हमारे बारे में भी कुछ सोचिए। ' अनंत जी ने कहा, 'अरे आप एकलव्‍य से विदा लेना चाहते हैं ? ' मैंने कहा, 'नहीं, पर मुझे लगता है कि अब मैं यहां बहुत सार्थक योगदान नहीं कर पा रहा हूं।' 
अनंत जी ने अपनी जेब से मुड़ा-तुड़ा बस का एक टिकट निकाला। उसके पीछे अपना ई-मेल पता लिखकर मुझे दिया और कहा कि अपना सीवी भेज दीजिए। मैंने सीवी भेज दिया। फिर कुछ संयोग ऐसा बना कि मैं फाउंडेशन में आ गया। पर मैं मानता हूं कि इस परिवर्तन का कारण हेमराज ही हैं। न हेमराज उस दिन ऐसा कुछ कहते और न यह राह इधर मुड़ती।
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हेमराज अब नहीं हैं यह कहना बहुत मुश्किल है। क्‍योंकि वे 40 साल की अपनी छोटी-सी उम्र में इतना कुछ कर गए हैं कि उन्‍हें सालों तक नहीं भुलाया जा सकता। उत्‍तरकाशी जनपद के एक छोटे से गांव में जन्‍मे हेमराज प्राथमिक शाला में शिक्षक थे। लेकिन अपनी नवाचारी प्रतिभा के बल पर जल्‍द ही उन्‍होंने उत्‍तराखंड के शिक्षा जगत में अपनी एक सक्रिय पहचान बना ली थी। वे प्रदेश की शिक्षा में हो रहे हर नवाचारी प्रयोग में शामिल रहते थे। लेकिन वे बंद कमरे में बैठकर काम करने वाले तथाकथित नवाचारी शिक्षक नहीं थे। उनकी प्रयोगशाला अपना स्‍कूल था। वे स्‍कूल की मिली हुई परिस्थितियों से जूझते हुए रास्‍ते निकालने की कोशिश करते थे। उन्‍होंने अपने स्‍कूल के अनुभवों को एक डायरी के रूप में लिपिबद्ध किया था। यह डायरी टीचर्स आफ इंडिया पोर्टल पर प्रकाशित हुई थी (जिसमें मैं आजकल कार्यरत हूं)। उनकी इस डायरी का अंग्रेजी अनुवाद हो हुआ है। अब तक हिन्‍दी और अंग्रेजी दोनों ही भाषाओं में यह पुस्‍तक रूप में प्रकाशित होने की बाट जोह रही थी।

अच्‍छी खबर यह है कि हेमराज की यह डायरी 'एक अध्‍यापक की डायरी के कुछ पन्‍ने'  के नाम से दोनों भाषाओं में प्रकाशित हो गई है। अंग्रेजी में इसका अनुवाद जानी-मानी शिक्षाविद् शारदा जैन जी ने किया है। इसे अज़ीम प्रेमजी विश्‍वविद्यालय ने प्रकाशित किया है। 27 नवम्‍बर,2011 को उत्‍तरकाशी में आयोजित एक कार्यक्रम में इसका विमोचन किया गया है। कुछ संयोग ऐसा बना कि इस डायरी के प्रकाशन में संपादकीय कार्यों में मदद करने का मौका मुझे ही मिला। डायरी में हेमराज की कुछ कविताएं भी हैं।  
*
छुटपुट प्रकाशनों के अलावा उनकी बाल कहानियों का एक संग्रह ‘फूलफुलियारी’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। लखनऊ कार्यशाला में तैयार उनकी एक कहानी का चयन हमने प्रकाशन के लिए किया था। जिसे बाद में नेशनल बुक ट्रस्‍ट,यूनीसेफ और नालंदा ने 'कहानी की कहानी' के नाम से प्रकाशित किया था। 
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इस ऊर्जावान दोस्‍त का 25 नवम्‍बर,2008 को उत्‍तराखंड की अतल गहराईयों में समा गई एक जीप दुर्घटना में निधन हो गया था। मुझे यह अफसोस है कि उसके जीवित रहते मैं उसके बारे में इतना सब नहीं जान पाया, जितना अब जान पा रहा हूं। ऐसा क्‍यों होता है? यह सवाल हमेशा मैं अपने आपसे पूछता रहता हूं। 
*
वे अविवाहित थे। लेकिन हेमराज जिस तरह के व्‍यक्ति थे उसके कारण निश्चित ही केवल मैं ही नहीं उत्‍तराखंड में उन्‍होंने अपने कई चाहने वाले बनाए थे और वही उनका परिवार था। 2009 में एक कार्यशाला के लिए देहरादून जाना हुआ तो उसमें शामिल हर व्‍यक्ति हेमराज से किसी न किसी रूप में परिचित था। यही वजह है कि दोस्‍तों ने मिलकर उनकी प्रकाशित और अप्रकाशित रचनाओं को जमा करके बालसखा ‘हेमराज’ नाम से एक संग्रह निकाला है। इस काम को अंजाम दिया है देहरादून में अनंत गंगोला और उनके साथियों ने।
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हेमराज के बारे में बताने को बहुत-सी बातें हैं। सच तो यह है कि दोस्‍तों की यादें कभी खत्‍म नहीं होतीं। लखनऊ में बच्‍चों के लिए पूरक साहित्‍य सामग्री निमार्ण के लिए हम दो कार्यशालाओं में मिले। कार्यशाला के दौरान हम लोग आसपास के गांवों में गए। वहां स्‍कूलों में जाकर बच्‍चों के बीच बैठकर उनसे बातचीत की। उनके परिवेश को समझने का प्रयास किया। क्‍योंकि सामग्री उन बच्‍चों के लिए ही बननी थीं। ऐसी ही एक बातचीत के समय ऊपर के फोटो में हेमराज, मैं और एक स्‍कूल की बच्‍ची रेहाना।
हेमराज की चार कविताएं ऊपर उल्‍लेखित संग्रह से साभार प्रस्‍तुत हैं।

संतुलन

न बनना इतने नीरस
कि कोई अंकुर न फूट सके
तुम्‍हारी जमीं से

और इतने भी न भीग जाना
कि खो ही जाए
अंकुर कहीं
तुम्‍हारी जमीं में

**
उसने हां कहा
मुझे खुशी हुई
उसने हां कहा
मुझे खुशी हुई,
उसने कई दिनों से ना नहीं कहा

नहीं हो सकेगा
टूट चुकी हूं मैं
अब सम्‍भलना मुश्किल है,
कुछ नहीं कर पाऊंगी मैं
बहुत कठिन है सब
भाग्‍य में नहीं है मेरे
जाने और कितने
ये टूटन भरे वाक्‍य
जबान पर चढ़ गए थे उसके
ना,नहीं मुश्किल,कभी नहीं
हो गए थे उसके तकिया कलाम

आज जब कहा उसने
कुछ सीखना चाहती हूं
कुछ पढ़ना चाहती हूं
कुछ गुनगुनाना चाहती हूं
और चाहती हूं ,लिखना एक गीत
तो मुझे लगा
आज मैं कहीं,शामिल हो गया हूं
उसकी जिन्‍दगी में।
** 

कैक्‍टस
लोग पूछते हैं मुझसे
कि मैंने
क्‍यों उगाए हैं
अपनी बगिया में
कैक्‍टस ही कैक्‍टस

मैं नहीं देखता उनमें
केवल कांटे और चुभन
और भी बहुत सी खूबसूरती
लिए हैं वे

केवल कांटे नहीं हैं कैक्‍टस
कैक्‍टस हैं धैर्य,संघर्ष और प्रतीक्षा
सोचता हूं मैं

क्‍योंकि एक दिन
लम्बी प्रतीक्षा के बाद ही सही
उन पर निकलेंगे फूल
सुंदर और दीर्घजीवी।
**

कुछ लोग
कुछ लोग नहीं छोड़ पाते
टहनियों को
और बदले में छोड़ देते हैं
एक लम्‍बी उड़ान

कुछ लोग छोड़ नहीं पाते
अपने अहंकार
और बदले में छोड़ देते हैं
ढेर सारा प्‍यार।
*
दो और कविताएं

मुझे देखकर वे क्‍यों उड़ जाते हैं?
मेरे घर के सामने
डैंकण का एक पेड़
एस पेड़ पर घिंडुड़ी का घोंसला
घोंसले में तीन(बच्‍चे) चूजे।

चूजे मुझे देखकर
सर उठा लेते थे
चूजे मुझे देखकर
मुंह खोल लेते थे
घोंसले से बार-बार मुंह निकालकर
मेरे साथ कितनी ही बार
आंख मिचौली खेलते थे।
अब हो गए हैं बड़े
फुदकने लगे हैं यहां-वहां
फिर भी कई बार वे
देख लेते हैं मुझे टकटकी लगाकर
पर जब से बदल गए हैं
वे चिडि़या में
अब वे दूर-दूर तक
घूम आते हैं,
हैरान हूं मैं
मेरे पास जाने पर
वे क्‍यों उड़ जाते हैं?
*
लोग क्‍या कहेंगे
मन करता है
रहूं खड़ी खिड़की के पास, देर तलक
और निहारूं
राह गुजरते आदमियों के झुण्‍ड को
कूड़ा बीनते किसी काले कलूटे बच्‍चे को
और आसमान में उड़ते बादल को
पर सोचती हूँ लोग क्‍या कहेंगे?

मन करता है
निकलूँ चार कदम घर से बाहर
और बतियाऊं
किसी बिन माँ के बच्‍चे से
सूने आंगन में बैठी किसी बूढ़ी मां से
या सन्‍नाटा ओढ़े किसी बूढ़े बाप से
पर सोचती हूं
लोग क्‍या कहेंगे?

मन करता है
कूद पड़ूं घोंसले से बाहर
उतर आऊं टहनियों पर
और दूर तक आसमान में
भर लूं एक लंबी उड़ान
पर सोचती हूं
लोग क्‍या कहेंगे?

मन करता है
करूं प्रथम प्रणय को
गाऊं कुछ रूंधे गले से
लूं बांध घुंघरू पांवों में
और नाचूं जी भरकर
आंगन में
पर सोचती हूं
लोग क्‍या कहेंगे?

0 हेमराज भट्ट ‘बालसखा’




                                    0 राजेश उत्‍साही 

32 comments:

  1. हेमराज जी के बारे मे बताने के लिए आपका आभार्।
    कवितायें तो उनकी एक से बढकर एक हैं बहुत कुछ कह जाती हैं……सच मे गज़ब का व्यक्तित्व थे ………पहली बार मे ही प्रभाव छोड गये।

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  2. अच्छे लोग क्यों साथ छोड़कर जल्दी चले जाते हैं, यह समझ से परे है।
    विनम्र श्रद्धांजलि हेमराज जी को।
    कविताएं अभिधेयात्मक एवं व्यंजनात्मक शक्तियों को लिए हुए है।

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  3. 'न बनना इतने नीरस
    कि कोई अंकुर न फूट सके
    तुम्‍हारी जमीं से
    और इतने भी न भीग जाना
    कि खो ही जाए
    अंकुर कहीं
    तुम्‍हारी जमीं में'
    **
    तथा
    'उसने हां कहा
    मुझे खुशी हुई
    उसने हां कहा
    मुझे खुशी हुई,
    उसने कई दिनों से ना नहीं कहा' जैसी जीवन से भरपूर कविताएँ संसार को देने वाला 'बालसखा' अब नहीं है, यह पढ़कर असीम दु:ख हुआ। लेकिन संतोष यह है कि उसने अपने जीवन में आप-सरीखे मित्र को कमाया, पाया। आपने उसको याद रखा, यह अत्यन्त महत्वपूर्ण है।

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  4. अगर यह सही है कि साहित्‍यकार की सोच से उसका साहित्‍य जन्‍म लेता है तो ये कवितायें कहती हैं कि ऐसे व्‍यक्ति को और जीना चाहिये था। ऐसी सोच के व्‍यक्ति के पास करने को बहुत कुछ रहता है, और वह जो करता है वह दिशाहीन नहीं होता।
    उसने हॉं कहा में एक अलग ही हॉं की प्रतीक्षा है, वहीं संतुलन गिने चुने शब्‍दों में जीवन के विभिन्‍न पहलुओं में संतुलन को पूरी शिद्दत से बयां करती है। कैक्‍टस निरंतर संघर्षरत रहने की प्रे‍रणा तो 'कुछ लोग' स्‍वर्गीय सर्वेश्‍वर दयाल सक्‍सेना की कविता 'मैं अक्‍सर पेड़ों के लिये जूते सिलवा लाया' की याद दिलाती है।

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  5. बड़ा दुख हुआ जानकर। चारों कवितायें बहुत ही सुन्दर हैं।

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  6. कविताएं, मानों हेमराज जी के आपके विवरण की साखी हैं.

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  7. बड़े भाई! आपने जीवंत कर दिया हेमराज जी की स्मृति को. उनकी चारों कविताएँ इस बात का प्रमाण हैं कि ऐसे व्यक्ति सदा जीवित रहते हैं हमारे मध्य. इतनी अल्पायु में हमें छोड़कर चले जाना उनको दुष्यंत और धूमिल के समकक्ष करता है और सिद्ध करता है कि अच्छे लोगों को भगवान भी जल्दी बुला लेता है. नमन हेमराज जी को, उनकी स्मृतियों को और उनकी कविताओं को!!

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  8. हेमराज जी को मेरा नमन | जितना आप ने उनके बारे में बताया उससे तो साफ है की उनमे लिक से हट कर सोचने और जमीनी रूप से कुछ करने की चाह थी और वो उसे कर भी रहे थे ,ये हिम्मत की बात है | उनकी रचनाओ का संग्रह निकाल कर आप लोगो ने उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दी है |

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  9. hemraaj ji ki kavitaaon ne aur nikhar diya hemraaj ji ko antas se bhi.

    shukriya ise prastut kar ham tak pahuchane ke liye.

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  10. सभी कविताएं बहुत अच्छी हैं....बाल सखा की स्मृतियों को हम सब से बांटने के लिए आभार।
    .. हेमराज जी को हमारी विनम्र श्रद्धांजली।

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  11. kuch logo ki shakhsiyat hi aisi jaadui hoti hai, wo rahe naa rahe unki daastan hi dilo ko unke kareeb kheench lati hai. Aise logo ka thoda saath hi zindagi saarthak bana deta hai.
    hemraj ji vritaant kay saath aapne bhi hame unke kaaphi kareeb la diya, bahut dhanyavad. Kavitaye bhi unki kaphi saarthak hai , Dil ko chhu gaye hemraj ji.

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  12. हर स्तर पर अच्छे काम हो रहे हैं पर उन्हें कोई एक प्लेटफॉर्म नहीं मिल पाता और ऐसे कर्मठ लोग चुपचाप चले भी जाते हैं। जैसे भगवान ने उन्हें इतने ही काम के लिए भेजा था।

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  13. कुछ लोग छोड नही पाते अहंकार और छोड देते हैं ढेर सारा प्यार ...भाई हेमराज का यूँ चला जाना अखर गया ।

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  14. Bhaiya aapke iss blog ke dwara shraddhye Hemraj jee ko bahut bahut naman!! bhagwan unke aatma ko shanti pradan karen........!!

    कुछ लोग नहीं छोड़ पाते
    टहनियों को
    और बदले में छोड़ देते हैं
    एक लम्‍बी उड़ान

    bahut sahi kaha.......par aise log bahut kam hote hain........bahut kam!!

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  15. न बनना इतने नीरस
    कि कोई अंकुर न फूट सके
    तुम्‍हारी जमीं से

    और इतने भी न भीग जाना
    कि खो ही जाए
    अंकुर कहीं
    तुम्‍हारी जमीं में
    हेम राज जी की स्मृतियों को आपने अनूठे नदाज़ में याद रक्खा है राजेश जी .... नमन है हमारा उन्हें ...

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  16. कुछ लोग नहीं छोड़ पाते
    टहनियों को
    और बदले में छोड़ देते हैं
    एक लम्‍बी उड़ान

    कुछ लोग छोड़ नहीं पाते
    अपने अहंकार
    और बदले में छोड़ देते हैं
    ढेर सारा प्‍यार
    .... Utsahi ji! hemant Raj ji kee smirtiyon ko aapne jis anuthe andaanj mein bayan kiya hai yah dekhakar bahut achha laga....
    ..sach mein kuch logon ke bichhudna antarman ko teesta rahta hai aur kabhi kabhi wah tees yun hi baahar aane ko tadaft uthti hai....

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  17. सभी कविताएं बहुत अच्छी हैं....बाल सखा की स्मृतियों को हम सब से बांटने के लिए आभार।
    devender ji ne bilkul sahi likh ahai

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  18. हेमराज की स्मृति उनकी रचनाओं के रूप में सुरक्षित रहेगी ! श्रद्धांजलि !

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  19. नरेंद्र मौर्यNovember 30, 2010 at 11:23 AM

    बालसखा को याद करने, उनके लेखन को सहेजने के लिए आप, अनंत गगोला जी और पूरी टीम को बधाई। ऐसे प्रेरणादायी व्यक्तित्वों की आज बहुत जरूरत है।

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  20. जिन्दगी के मोडो पर हम बहुत से मित्र बनाते है , कई से बिछ्ड भी जाते है , किन्तु बालसखा की तुलना किसी भी मित्र से नही की जा सकती । और वो बहुत किस्मत वाले लोग होते है जिन्हे बालसखा मिलते है ।
    संतुलन से मै बहुत प्रभावित हुयी

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  21. कुछ लोग छोड़ नहीं पाते
    अपने अहंकार
    और बदले में छोड़ देते हैं
    ढेर सारा प्‍यार
    सच्चाई को वयां करती हुई रचना , बधाई

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  22. कुछ लोग नहीं छोड़ पाते
    टहनियों को
    और बदले में छोड़ देते हैं
    एक लम्‍बी उड़ान
    राजेश जी, आपकी इस पोस्ट को आज देखा, सदमा लगा । इतनी कम आयु में....! उस कार्यशाला में मेरा भी उनसे परिचय हुआ था । बहुत शालीन और गंभीर व्यक्ति थे, हेमराजजी । उनकी पुस्तक कहानी की कहानी को निकालकर फिर देखा और पुरानी यादें ताजा हो गई । हार्दिक श्रद्धांजलि । वे अपने सार्थक रचनात्मक कार्यों के माध्यम से सदैव जीवित रहेंगें । ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दें ।

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  23. manohar chamoli manuApril 19, 2011 at 6:58 PM

    अच्छा लगा, .........क्या कहूँ ..........वे सब के ही मित्र थे.

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  24. हेमराज जी से जुड़ी यादों को यहाँ बांटने का शुक्रिया.
    साधनों के सीमित होने पर भी कुछ कर गुजरना उन्हें महान लोगों की पंक्तियों में खड़ा कर देता है...नमन उन्हें.
    कविताएँ बहुत ही अर्थपूर्ण है.

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  25. घूमते-फिरते गुलमोहर के फूलो तक आना हुआ और गुल्लक से चोरी तो पुरानी आदत है अपनी,आए बिना रहा नहीं गया ... आपके मित्र हेमराज की यादो और लिखतों से गुजर कर बहुत अच्छा लगा ..उनके जीवन और आपके मित्र भाव को नमन ...

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  26. विनम्र श्रद्धांजलि। मित्र भाव को नमन।

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  27. Dear Utsahi ji
    This was really great personality. Leo Vygostky had also done in the work for the world in our shot life span. Naman meri oor se.
    Regards
    Sanjay

    Sanjay Kumar Tiwari
    Azim Premji Foundation, Dhamtari
    Chhattisgarh

    Mobile No: 098272 03837

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  28. शुक्रिया, राजेशजी. क्या बालसखा था और क्या उस के दोस्त हैं आप. तीन मुलाकातों में दोस्त बन जाना आप की सहजता दिखाता है. इसे बनाये रखे.

    शुभकामनायें,
    भूपेंद्र

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  29. पूरी कविताएं नहीं पड़ी..जाने क्यों किसी का जाना उसके बाद उसको पढ़ना अजीब लगता है ..किसी औऱ समय में जब भावनाओं में नहीं होउंगा तो पढ़ूंगा...

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  30. MANAV KE JAANE KE BAAD USKAA KAHA / LIKHA HI YAAD RAH PAATAA HAI. @ UDAY TAMHANEY. BHOPAL.

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  31. भाई हेमराज जी के बारे में जाकर अच्छा लगा ......

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जनाब गुल्‍लक में कुछ शब्‍द डालते जाइए.. आपको और मिलेंगे...