Thursday, June 3, 2010

अर्चना जी कहती हैं.........

अर्चना रस्‍तोगी एकलव्‍य,भोपाल की पुरानी साथी हैं। वे मेरे ब्‍लाग पढ़ती रहती हैं। कभी मेल पर या फोन पर बात होती है तो अपनी प्रतिक्रिया देती हैं। मैंने उनसे कई बार आग्रह किया कि वे अपनी प्रतिक्रियाएं पोस्‍ट के नीचे टिप्‍पणी करके दें तो और लोग भी पढ़ पाएंगे । उन्‍हें यह झंझट का काम लगता है। मैंने कहा चलिए एक मेल में ही लिख दीजिए। मैं आभारी हूं कि उन्‍होंने एक संक्षिप्‍त टिप्‍पणी लिख ही डाली। उनकी अनुमति से उसे यहां प्रस्‍तुत कर रहा हूं
 * पहले तो शुक्रिया कि काफी बड़े आकार की तस्‍वीर से रूबरू होने से अब छुट्टी मिली। शुरू में तो बड़ी उमंग से आपके ब्‍लाग पर जाती थी। पर जब आपने अपनी विशाल तस्‍वीर लगा ली थी तो कुछ समय तो यही सोचने में निकल जाता था कि इतनी बड़ी तस्‍वीर क्‍यों डाल रखी है। कुछ शायद कोफ्त भी हुई। पर आपको बताना मेरे लिए आसान नहीं था। लगता था ब्‍लाग पर लिखा किसी और ने है और तस्‍वीर किसी और की है। यह मेरी अपनी राय बन गई थी बचकानी-सी। अब आपका ब्‍लाग काफी सुंदर बन गया है जो कि आपकी लेखन प्रतिभा से काफी मेल खा रहा है। 
 * देखिए आपके लिए लिखना काफी आसान है। क्‍योंकि यह आपका जुनून है। पढ़ने के बाद मेरे जैसे कई लोग चाहते तो होंगे की कुछ लिखें,टिप्‍पणी करें। पर वो कुछ ऐसा ही लगता है कि जैसे....(आगे पढ़ने के लिए बाएं तरफ नीचे Read More पर क्लिक करें।) किसी एक भाषा में निपुण इंसान के सामने आप उसकी ही भाषा में टूटा-फूटा लिखें। बस हिचक सी होने लगती है लिखने में। पता नहीं मैं अपनी बात आपको समझा पाई या नहीं। पर मुझे यह स्‍पष्‍ट है कि लिखना आप जैसे प्रतिभा सम्‍पन्‍न लोगों का काम है और उस पर टिप्‍पणी या राय देने वालों का भी एक अलग वर्ग ही है। मेरे जैसे तो पढ़ कर ही खुश हो लेते हैं।
 * लगभग सभी कुछ पढ़ डाला आपके तीनों ब्‍लाग पर। काफी कुछ पहले भी पढ़ चुकी थी। आपकी कविताओं के विषय मुझे हमेशा ही रुचिकर लगते रहे हैं। चाहे वो बच्‍चों की लिए हों या कुछ सामाजिक मान्‍यताओं को लेकर। नारी के लिए आदर, उसकी विवश्‍ताएं या आसपास घटने वाली साधारण-सी घटनाएं हों, उन पर इतनी गजब कविताएं आप बना जाते हैं सहजता से। तारीफे काबिल है आपकी यह प्रतिभा। कविताओं की यह सहजता(भाव) मुझे असहज कर देती है। बहुत अद्भुत लगता है आपका यह जादू।  
यह हमेशा ही होता है कि जिसे आप काफी कुछ निजी तौर पर जानते हैं उसकी लिखी रचनाओं से आप कुछ ज्‍यादा जुड़ जाते हैं और बेबाक टिप्‍पणी करने में आसानी होती है।
 * गुलमोहर में आपकी ताजा कविता ‘दिल चिडि़या’ शीर्षक से मुझे लगा कि कोई मासूम-सी कविता होगी। पर वो मेरी सोच से (पढ़ने से पहले) कुछ अलग ही निकली। मुझे लगा कि केवल शीर्षक से ही कन्‍टेंट क्‍या होगा ये राय नहीं बना लेनी चाहिए।
 * गर्भनाल पत्रिका में आपकी कविता ‘लिखकर एक कविता’ पढ़ी। काफी सुंदर बन पड़ी है। यह सृजन ही है और आपने इसे इतने सुंदर और सटीक सृजन से जोड़ा है वह आपकी कल्‍पना की उड़ान की ऊंचाईयों को दर्शाता है। कैसे आप इतना सब सोच पाते हैं? यानी कैसे आपको कौंधता है यह? यह मेरी जिज्ञासा है,जानने की इच्‍छा है। मुझे तो आश्‍चर्य होता है।  
 * यायावरी पर उत्‍सव की खींची तस्‍वीरें सुंदर हैं। उनके कैप्‍शन भी। वह तो जरूर ही आपका कमाल होगा।
 * आपने लिखा है, ‘कि प्रतिक्रियाओं से प्रोत्‍साहन मिलता है। वरना लगता है कि- खुद लिखो,खुद पढ़ो योजना- जैसा कुछ कर रहे हैं।‘ ऐसी बात का जेहन में उभरना एक तरह की मायूसी जैसी है। यह ठीक है कि आपको प्रतिक्रियाओं से प्रोत्‍साहन मिलता होगा। पर आप तो अपने शौक के लिए लिखते हैं, ये आप का हुनर है। ऐसा मैं मानती हूं।
 * चलिए लिखते रहिए,हम भी यूं ही पढ़ते रहेंगे और प्रतिक्रिया भी देते रहेंगे।   0 अर्चना रस्‍तोगी

3 comments:

  1. बात-बेबात के सुभाष राय जी ने अपने ब्ला‍ग पर टिप्पणियों की महिमा पर एक पोस्ट लगाई है। सो मैं टिपयाने पहुंच गया। अब जो कुछ मैंने वहां लिखा तो उसकी प्रतिक्रिया तो होनी ही थी। सो सुभाष भाई का मेल आया है। वे लिखते हैं,’यार मैंने गुल्लक पर टिप्पणी डाली,गई ही नहीं। मेल से भेज रहा हूं, वहां लग सके तो लगा देना।‘
    तो उनकी टिप्पणी इस तरह है- ’कहां है राजेश,कटोरा कहां है यार। मैंने तुम्हारी गुल्लक को इधर से,उधर से,ऊपर से,नीचे से देख डाला। पर वो वाली पोस्ट नहीं दिखी। एक बार तो मन हुआ,फोड़ दूं गुल्लक को और सारे सिक्के निकाल लूं। फिर सोचा जाने दो इतनी मेहनत से तुमने संजोकर रखे हैं।
    और हां अगर घर के मामले में दखल दिया तो ठीक नहीं होगा। मेरा कोई राज तुम्हें मालूम हो गया तो मेरी धुनाई करवाओगे क्या ? मैं कह दूंगा ये राजेश की करतूत है। फिर मियां उल्टे बांस बरेली। भुगतोगे। यार राजेश रात का पैग अभी उतरा नहीं है। देखना कुछ गड़बड़ हो तो संभाल लेना।‘
    यह घर का मामला क्या है और सुभाष भाई मुझे किस बात पर धमका रहे हैं यह तो आपको उनके ब्लाग पर जाकर ही पता चलेगा। उनके ब्लाग बात- बेबात की लिंक यहां मेरे ब्लाग पर है।
    पर साहबान यहां से जाने के पहले कृपया अपनी टिप्पणी का सिक्का गुल्लक में जरूर डालते जाएं। और जानकार लोगों से अनुरोध है कि गुल्लक में टिप्प‍णी क्यों नहीं जा रही कृपया जरा चेक करें। कुछ तकनीकी समस्या है क्या ?

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  2. Rat men aaya tha. dekh gaya. tumhen nahi jagaya. bat-bebat kisi ko pareshan karna theek nahin hai. tumhari guullak par apna anguthanishan bhhi lag gaya, chalo ye bhi theek hai. pas banaye rakhna . dost aajkal badi mushkil se milte hain.

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  3. abhi to chipak gayee dost. ab mutmayin hun ki tumhare tak bat pahunch jayegi.

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जनाब गुल्‍लक में कुछ शब्‍द डालते जाइए.. आपको और मिलेंगे...