Sunday, March 17, 2013

वह एक इतवार

                                                                              राजेश उत्‍साही
इतवार। मई का गर्म इतवार। इतवार यानी आराम का दिन। पर पिछले कुछ दिनों से रूप का इतवार काम या झंझटों का दिन ही बना जा रहा था। जैसे गए शनिवार पास के शहर में एक बैठक थी। बस की भीड़-भाड़ से बचने के लिए रूप स्‍कूटर से चला गया था। धूप तेज थी। अगले दिन इतवार को वापस लौटते समय स्‍कूटर का पिस्‍टन बैठ गया। आधा दिन स्‍कूटर खींचते और आधा दिन स्‍कूटर ठीक कराते बीता। रूप सोच रहा था कि यह इतवार तो कम से कम आराम से बीते।

बच्‍चों के स्‍कूल में छुट्टियां लग गई थीं। बच्‍चे मां के साथ अपनी ननिहाल जा रहे थे। किसी बात पर पत्‍नी से तू-तू मैं-मैं हो गई थी। सुबह-सुबह मूड खराब।
स्‍टेशन जाने के लिए आटो की जरूरत थी। रूप पास के स्‍टैंड से आटो लेने गया। वहां एक ही आटो था। आटो वाले से संवाद कुछ इस तरह से हुआ,
-    स्‍टेशन चलना है कॉलेज के पीछे से।
-    हां जी चलो।
-    क्‍या लोगे।
-    पैंतीस होते हैं, तीस दे देना।
-    पच्‍चीस ले लेना। आ जाओ।
-    अरे साब, आप लोगों की कुछ आदत ही हो गई, कम करने की।... आटो वाला झल्‍लाया।
-    चलना है कि नहीं। पच्‍चीस ही दूंगा।.... रूप भी ताव खा गया।
-    नहीं चलना है।.... आटो वाला लगभग चिल्‍लाया।

आटो वाले ने जिस अंदाज में उत्‍तर दिया, रूप को लगा कि वह मजबूरी का फायदा उठाना चाहता है। रूप की इच्‍छा हुई दो-चार खरी-खरी सुना दे। पर घर में पत्‍नी और बच्‍चे इंतजार कर रहे थे। ट्रेन का समय हो रहा था। रूप बड़बडाता हुआ लौट आया। पत्‍नी और बच्‍चों को स्‍कूटर से ही दो चक्‍कर लगाकर स्‍टेशन छोड़ा।

ऐसा कितनी बार होता है कि मन करता है कि सामने वाले को उसी टोन में जवाब दिया जाए, जिसमें वह बात कर रहा है। पर बात बढ़ने की कल्‍पना करके रूप मन ही मन जल-भुनकर रह जाता है।

पत्‍नी टिकट ले चुकी थी। बच्‍चे और पत्‍नी सामान लेकर प्‍लेटफार्म पर जा चुके थे। रूप स्‍कूटर पार्क करने चला गया। लौटा त‍ब तक पत्‍नी तथा बच्‍चे ओव्‍हरब्रिज लगभग पार कर चुके थे।

रूप के आगे एक नवयुवती ओव्‍हरब्रिज की ढलान पर चढ़ रही थी। नवयुवती ने बड़े-बड़े फूलों के प्रिंट वाली हल्‍के आसमानी रंग की साड़ी पहनी थी। एक बड़ा फूल उसके नितंबों पर कदमताल के साथ दाएं-बाएं आ-जा रहा था। कलाईयां चूडि़यों से भरी हुई थीं। हाथों में फूलों का एक गुलदस्‍ता था। ओव्‍हरब्रिज पर ऊपर पहुंचकर जब वह मुड़ी तो रूप ने अंदाजा लगाया, वह नवविवाहिता थी। पर यह क्‍या कहीं कुछ खटक रहा था। चप्‍पल की खट-खट कुछ अजीब-सी ध्‍वनि पैदा कर रही थी। हां उसने ऊंची एड़ी की चप्‍पल पहन रखी थी। ऊंची एड़ी में एडी़ के नाम पर पतली कीलनुमा रचना थी। इसकी वजह से उसे चलने में भी असुविधा हो रही थी। बार-बार उसकी साड़ी भी उसमें फंस-फंस जा रही थी।

रूप का मन हुआ, नवयुवती को रोककर कहे, ‘आप बहुत सुंदर लग रही हैं। पर अच्‍छा होता कि आपने यह ऊंची एड़ी की चप्‍पल नहीं पहनी होती।’  

पर नवयुवती क्‍या सोचेगी। कहीं कुछ उल्‍टा-सुल्‍टा बोलने लगी तो बेकार में मिट्टी पलीद हो जाएगी। फिर अगले ही पल रूप ने तय किया आज तो वह बोलकर ही रहेगा। चाहे जो हो जाए।
रूप तेज कदमों से नवयुवती से थोड़ा आगे निकला। एक क्षण को ठिठका। बोला, ‘आप सुंदर लग रही हैं। पर ये ऊंची एड़ी की चप्‍पलें। कुल मेल नहीं खा रहीं हैं।’  

नवयुवती ने अचकचाकर उसे देखा। नवयुवती वहीं ठिठककर रह गई थी। रूप उसकी प्रतिक्रिया का इंतजार किए बगैर तेज कदमों से ओव्‍हरब्रिज की ढलान पर उतर गया। ट्रेन आने में अभी समय था। रूप बुकस्‍टाल पर पत्रिकाएं पलटने लगा।
‘धन्‍यवाद।’  अचानक रूप के कानों में एक सुरीली आवाज गूंजी।
रूप ने चौंककर देखा । नवयुवती उसके सामने खड़ी थी।
‘धन्‍यवाद। आपके इस फीडबैक के लिए। मुझे भी लगता है ये चप्‍पलें इस परिधान के साथ मेल नहीं खा रही हैं।’
रूप नवयुवती को सामने देखकर झेंप-सा गया था। जब तक वह कुछ कहता, वह आगे बढ़ गई थी। भोपाल एक्‍सप्रेस प्‍लेटफार्म पर आ चुकी थी।

उसके परिवार को जिस ट्रेन से जाना था, वह भी आ चुकी थी। परिवार को विदाकर वह वापस लौट रहा था। नवयुवती एक नवयुवक की बांह में अपनी बांह डाले लौट रही थी। गुलदस्‍ता युवक के हाथों में था।
नवयुवती की प्रतिक्रिया ने रूप में जैसे एक नई ऊर्जा का संचार कर दिया था। उसे महसूस हुआ जैसे वह कह रही हो सही बात कहने का साहस होना चाहिए। बाकी सारी परिस्थितियां उसके अनुकूल हो जाती हैं।

रूप ने देखा नाले पर बने स्‍टैंड पर वह आटो अब भी खड़ा था। रूप ने स्‍कूटर उसके करीब रोका और आटो वाले से कहा,  ‘सुनो। दुनिया तुम्‍हारे कंधे पर ही नहीं टिकी है।’  

आटो वाले को कुछ भी समझ नहीं आया। जब तक वह समझने की कोशिश करता, तब रूप वहां से जा चुका था।                                              
                                      0 राजेश उत्‍साही

Thursday, January 24, 2013

इसे क्‍या नाम दें..!



किशोरों का एक दल हवाओं और ठिठुरा देने वाले मौसम से जूझते हुए एक खड़ी चट्टान पर रेंगता हुआ ऊपर चढ़ रहा था। ऊँचे हिमालय के पिछवाड़े एक सँकरी चट्टानी दरार के आर-पार हवाएँ साँय-साँय करते हुए गुजर रही थीं। उस खड़ी चट्टान पर टिके-टिके जब वे एक दूसरे को दुफन्दी गांठ लगाते हुए रस्सी से खुद की सुरक्षा का इन्तजाम कर रहे थे, जज्बात अपने उफान पर थे, उत्तेजना भी अपने शबाब पर थी। तभी एक पर्वतारोही जोर से चिल्लाया, “टेंशन!”, यानी “मुझे कसके पकड़े रहो, वर्ना मैं गिर सकता हूँ!” और सब-के-सब उसकी मदद को जुट गए। होंठ भिंच गए, शरीर सुन्न पड़ गए और चेहरे सुर्ख हो चले। अगले पाँच मिनट सन्नाटे में बीते। इसी दौरान कगार पर लटका वह संकटग्रस्त पर्वतारोही अपने पूरे जीवट के बूते कगार के ऊपर जा पहुँचा। उसकी इस कोशिश के पूरा होते ही पूरी टीम खुशी से सराबोर हो गई। सबके चेहरों से राहत और उल्लास छलके जा रहे थे। अन्दर का तूफान अब थम चला था। उनका सहपाठी सुरक्षित था और वे अपनी ‘संयुक्त’ विजय मना रहे थे। अपने पीछे खड़ी एक लड़की को मैंने उसकी दोस्त से यह कहते हुए सुना, “कितना अजीब है न - शशांक को कगार के ऊपर चढ़ते देख मैंने राहत महसूस की। इस ट्रिप के पहले मैं उसे अपने आसपास बर्दाश्त नहीं कर सकती थी। लेकिन आज, उसे सुरक्षित देख मुझे बहुत अच्छा लगा।”
उसकी इस बात से सहसा मुझे कर्ट हाह्न की बात याद हो आई, “संकट में पड़े अपने किसी साथी की मदद करने का अनुभव, या ऐसी मदद कर पाने के लिए हासिल यथार्थवादी प्रशिक्षण का अनुभव भी, एक युवा मन के भीतरी शक्ति-सन्तुलन को कुछ इस तरह बदलने लगता है कि संवेदना, प्रधान प्रेरणा बन जाती है।” वाकई कितनी सही थी यह बात!
(अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन द्वारा प्रकाशित लर्निंग कर्व पत्रिका के 'शिक्षा में खेल' अंक में प्रकाशित निधि तिवारी के लेख से साभार।)
                                                             0 राजेश उत्‍साही

Saturday, January 5, 2013

कल, आज और कल



यह जैसे कल ही की तो बात है। कुछ भी तो नहीं बदला है।
**
यह 1978 की फरवरी की रात है। बहुत ठंड है। बाहर भी और घर में भी। रेल्‍वे कॉलोनी में एस्बस्‍टास की छत वाले इस घर में तो और भी ज्‍यादा ठंड लगती है।  छोटी बहन रीता को अस्‍थमा की शिकायत है। ठंड बढ़ती है तो उसकी तकलीफ भी बढ़ने लगती है। शाम से बढ़ने लगी है। कोयले की सिगड़ी के चारों तरफ जमा हम सब भाई-बहन रीता को संभालने की कोशिश कर रहे हैं। दादी कह रही हैं, अरे विक्‍स मल दो छाती में। न हो तो जरा ब्रांडी की मालिश कर दो। अभी आराम लग जाएगा। मां कह रही हैं, मुन्‍ना कुछ कर भैया। इसकी हालत ठीक नहीं है।

पिताजी घर में नहीं हैं। घर में क्‍या वे शहर में ही नहीं हैं। वे अपनी एक ट्रेंनिग के सिलसिले में भुसावल गए हैं।  

रात के आठ बज रहे हैं। मुझे कुछ सूझ नहीं रहा है। ठंड के कारण सब लोग सई शाम से घरों में बंद हो जाते हैं। मैं साइकिल लेकर अपने एक दोस्‍त से सलाह करने निकल पड़ा हूं। उसने सलाह दी है कि रीता को अस्‍पताल ले जाना चाहिए, तुरंत सरकारी अस्‍पताल। अब प्राइवेट अस्‍पताल तो कोई है ही नहीं।  

मैं दोस्‍त के साथ घर वापस आता हूं। तांगा करता हूं। मां और मैं दोनों रीता को तांगे में बिठाकर जिला चिकित्‍सालय ले जा रहे हैं। अस्‍पताल में जगह नहीं है। पहली मंजिल के बरामदे में उसे फर्श पर भरती कर लिया गया है। डॉक्‍टर ने परचा बना दिया है। नर्स ने दवा बाजार से लाने के लिए परची बना दी है।

मां और दोस्‍त को वहां छोड़कर, दवा लेने दौड़ पड़ा हूं। दवा की दुकान में भीड़ है। दुकानदार कह रहा है, जरा सब्र रखो। जल्‍दी है तो दूसरी दुकान पर चले जाओ।

लौटकर देखता हूं रीता चुपचाप लेटी है। ऑक्‍सीजन की नली उसकी नाक में ठुंसी हुई है। दोस्‍त अपने दोनों हाथ सीने पर बांधकर एक किनारे खड़ा हुआ है। दोस्‍त बताता है नली की अकबकाहट ने रीता की सांस को और उखाड़ दिया था। और वह ऐसी उखड़ी कि उसके प्राण ले उड़ी। मां, उसके सिरहाने बैठीं अपनी रूलाई रोकने की कोशिश कर रही हैं।

डाक्‍टर कह रहा है..घर ले जाओ..कुछ नहीं बचा है अब। रोना,गाना घर जाकर करो। यहां और मरीजों को तकलीफ होगी।

मैं अपनी आंख में अंगारे भरे, तेरह साल की रीता की ठंडी देह को अपने दोनों हाथों में उठाए सीढि़यां उतर रहा हूं। मां रेलिंग का सहारा लेकर उतर रही हैं।

दोस्‍त सीने पर हाथ बांधे आगे-आगे दूरी बनाकर चल रहा है।  

मृतदेह को ले जाने के लिए तांगेवाले भी तैयार नहीं हैं। मां को रीता के शव के पास बिठाकर कुछ इंतजाम करने निकलता हूं। आखिर एक परिचित का हाथ ठेला मिलता है, उसी पर उसका शव लेकर लौटता हूं।
**
कल की तो बात है।
इन बीते सालों में कितनी बार यह घटना याद आती रही। हर बार मैं सोचता हूं, आखिर दोस्‍त ने रीता की मृत देह को हाथ क्‍यों नहीं लगाया? उसे अस्‍पताल की पहली मंजिल से नीचे लाने में मेरी मदद क्‍यों नहीं की? क्‍यों नहीं उसने डाक्‍टर को उसकी असंवेदनशीलता के लिए बुरा-भला कहा? क्‍यों उसने किसी तांगे वाले को डांटकर अपने कर्त्‍तव्‍य की याद नहीं दिलाई? क्‍यों नहीं वह कुछ और इंतजाम होने तक वहां रूका ?

आज फिर से सोच रहा हूं। जैसे यह कल की नहीं आज ही की तो बात है।                            0 राजेश उत्‍साही
                                                             
  

Tuesday, January 1, 2013

नीमा के बहाने



                                   मैसूर वृदांवन गार्डन : जून 2010
मित्रो आज मेरी पत्‍नी नीमा का जन्‍मदिन है। दो साल पहले अपने विवाह की पच्‍चीसवीं वर्षगांठ पर मैंने नीमा को केंद्र में रखकर एक लम्‍बी कविता लिखी थी। यह कविता चार भागों में मेरे कविता ब्‍लाग गुलमोहर पर प्रकाशित हुई थी। यह कविता मेरे पहले संग्रह ‘ वह जो शेष है..’ में भी संकलित है।

हम आज जिस अजाब से गुजर रहे हैं, उसमें चल रही बहस के बीच मैं अपनी पत्‍नी में बसी स्‍त्री को किस तरह देखता हूं, यह इस कविता में कहने की कोशिश की है। आपमें से बहुत से साथियों ने उस समय भी इसे पढ़ा था, अपनी प्रतिक्रिया दी थी। एक बार फिर मैं उस कविता को यहां आप सबके सामने रख रहा हूं। 


यह कविता नीमा के प्रति मेरी एक सार्वजनिक आदरांजलि है। बहुत संभव है इसका कोई साहित्यिक महत्‍व न हो।



मेरी
जीवनसंगिनी
यानी कि पत्‍नी का नाम
निर्मला है
यह असली नाम है
बदला हुआ या काल्‍पनिक नहीं
पर हां प्‍यार से
या समझ लीजिए सुविधा से
मैं नीमा कहकर बुलाता हूं।

Saturday, December 29, 2012

2012 तुम न लौटना दुबारा

2012 तुम अब लौटकर न आना दुबारा। क्‍या दिया है तुमने सिवाय इस लानत और शर्मिन्‍दगी के। 'वह जो शेष था' वह भी नहीं रहा अब। अब तुम ही बताओ किस मुंह से..किस उम्‍मीद से.. हम स्‍वागत करें आते हुए तुम्‍हारे उत्‍तराधिकारी का..। लगता नहीं है कि वह भी कुछ लेकर आ रहा है..इस सड़ते हुए समाज के लिए..। अच्‍छा तो यही है कि यह जर्जर हो चुकी व्‍यवस्‍था..  जल्‍द से जल्‍द नष्‍ट हो जाए ताकि उसके कबाड़ से आने वाले समय के लिए उपजाऊ खाद तो बने ।


Sunday, December 23, 2012

चन्‍द्रकान्‍त देवताले : समय का बयान


।। दो लड़कियों का पिता होते हुए ।।
पपीते के पेड़ की तरह मेरी पत्नी
मैं पिता हूं
दो चिड़ियाओं का जो चोंच में धान के कनके दबाए
पपीते की गोद में बैठी हैं
सिर्फ़ बेटियों का पिता होने से भर से ही
कितनी हया भर जाती है
शब्दों में

Saturday, November 3, 2012

प्‍लेटफार्म पर आर्ट गैलरी


आमतौर पर जब हम रेल्‍वे स्‍टेशन पर किसी गाड़ी की प्रतीक्षा करे रहे होते हैं तो समय काटना मुश्किल लगने लगता है। खासकर तब जब गाड़ी देर से आने वाली हो। ऐसे में आपके पास सिवाय मक्खियां उड़ाने के और कोई काम नहीं होता। अगर कोई आपको सीऑफ करने आया है या आप किसी को सीऑफ करने आए हैं तब भी कई बार बातों का कोटा खत्‍म हो जाता है और केवल अगल-बगल झांकते ही नजर आते हैं। वैसे आजकल रेल्‍वे स्‍टेशनों पर टीवी स्‍क्रीन भी समय काटने का एक साधन होते हैं। पर वे हमारी मूक फिल्‍मों के जमाने को याद दिलाते हैं। क्‍योंकि आमतौर पर उन पर केवल चित्र ही दिखाई देते हैं, आवाज अगर होती भी है तो वह दो-तीन रेडियो स्‍टेशनों के एक-साथ चलने पर आने वाली आवाज की तरह। बहरहाल....।

Saturday, October 13, 2012

श्रीप्रसाद : हिन्‍दी बालकविता की आत्‍मा


इसे संयोग कहूं या दुर्योग कि लगभग 18 साल पहले मैं जयपुर में श्रीप्रसाद जी के साथ था। और 12 अक्‍टूबर की शाम टोंक से जयपुर पहुंचा तो संदीप नाईक ने फोन पर यह सूचना दी कि श्रीप्रसाद जी नहीं रहे। उनके पास भी यह सूचना एकलव्‍य के गोपाल राठी के मेल से पहुंची। पिछले एक हफ्ते से इंटरनेट से दूरी सी बनी हुई थी,इसलिए बहुत नियमित रूप से मेल देख नहीं पा रहा था। गोपाल का मेल मुझे भी आया था, खोलकर देखा तो उनके मेल पर एक और लिंक थी, रमेश तैलंग जी के ब्‍लाग नानी की चिट्ठियां की। वहां इस बारे में जो जानकारी थी उसके अनुसार उन्‍हें प्रकाश मनु जी ने फोन करके इस दुखद खबर के बारे में बताया था। श्रीप्रसाद जी दिल्‍ली आए थे, अपने हृदय रोग की चिकित्‍सा के सिलसिले में। संभवत: उन्‍हें वहां दिल का दौरा पड़ा और वे सबसे विदा ले गए। (फोटो रमेश तैलंग जी के ब्‍लाग से साभार।) 

Monday, October 1, 2012

सत्‍याग्रह और गंदा काम


गांधी जयंती पर सबको आना था और समय पर आना था।
जो बच्‍चे लेट आए उन्‍हें सजा दी गई। स्‍कूल का परिसर साफ करो। कचरा बीनो और उसे कूड़ेदान में डालो।
बच्‍चों ने सत्‍याग्रह कर दिया। और जो भी करवाना हो करवाओ, पर हम यह गंदा काम नहीं करेंगे।
                                      0राजेश उत्‍साही 

Thursday, September 20, 2012

बर्फी : पहली फुरसत में देख डालिए

                                              गूगल सर्च से
भारत बंद था,दफ्तर बंद था और अपन घर में बंद।पर लैपटॉप चालू था। कहीं से एक फिल्‍म मिल गई थी।सो देख डाली। गैंग्‍स ऑफ वासेपुर,गैंग्‍स ऑफ ममता,गैंग्‍स ऑफ मुलायम और गैंग्‍स ऑफ महंगाई से कुछ समय के लिए दूर होकर।फिल्‍म थी बर्फी यानी गैंग्‍स ऑफ अनुराग बासु। 

पहली बात अगर आपने अब तक न देखी हो तो तुरंत देख डालिए। वैसे कहानी तो थोड़ी बहुत आप सुन या पढ़ ही चुके होंगे।घबराइए मत मैं कहानी आपको नहीं बताऊंगा। क्‍योंकि ऐसी फिल्‍मों की कहानी एक बार पता चल गई तो फिर सारा मजा जाता रहता है।हां कुछ क्‍लू जरूर दे देता हूं।गिने-चुने पात्रों के बीच घूमती प्रेम कहानी है।पर सीधी नहीं,जिंदगी की तरह टेड़ी और जिंदगी की तरह ही जिदृदी।शायद इसीलिए उसे फिल्‍माने के लिए दार्जिलिंग की उतार-चढ़ाव भरी लोकेशन चुनी गई।

पहली बार परदे पर प्रियंका चोपड़ा को उस नजर से नहीं देखा,जिस नजर से आमतौर पर उनकी फिल्‍मों में उन्‍हें देखता रहा हूं।सच कहूं तो वे किसी भी एंगल से प्रियंका चोपड़ा लगी हीं नहीं।शुरू के कुछ दृश्‍यों में तो यह शक ही होता रहा कि क्‍या हम सचमुच प्रियंका चोपड़ा को ही देख रहे हैं या कोई और है।यह निर्देशक अनुराग बासु का कमाल ही कहा जाएगा।पर फिर भी वे जितनी देर परदे पर रहीं, अपने ऊपर से नजर हटाने नहीं दे रहीं थीं,यह उनके अभिनय का कमाल था।पिछले कुछ सालों में कई ग्‍लैमरस हीरोइनों ने यह बात साबित की है कि अगर निर्देशक में दम हो तो वह उनसे अभिनय भी करवा सकता है। 

इलिना डि'क्रूज जितनी सुंदर हैं,उतनी ही सुंदरता उनके अभिनय में भी है। दोनों ही वजहों से नजर उन्‍होंने भी अपने पर से हटाने नहीं दी।उनका चेहरे और आंखों में गजब की अभिव्‍यक्ति क्षमता है।हां,बुढ़ापे के रोल में वे प्रियंका के मुकाबले फीकी पड़ जाती हैं।पर यह दोष उनका उतना नहीं है,जितना मेकअप करने वाले का या फिर निर्देशक का।फिर भी मैं उन्‍हें प्रियंका के बराबर ही खड़ा करूंगा।

रणवीर कपूर ने एक बार फिर साबित किया कि उन्‍हें अभिनय आता है।एक छोटे से कस्‍बे के एक आजाद युवा की भूमिका में ,आजाद कल्‍पना करने वाले बर्फी के रूप में वे खूब जमे हैं।सबसे  दिलचस्‍प बात उनके किरदार की है कि वह अपनी कमियों पर  उनका अफसोस नहीं मनाता,बल्कि उनका मजाक उड़ाता है। और यह भी कि कुछ भी करने या सोचने में उन कमजोरियों को बाधा नहीं बनने देता।रणवीर ने इस किरदार में उतरकर उसे जिया है। 

प्रियंका और रणवीर दोनों के हिस्‍से में संवाद थे ही नहीं और कहानी के मुताबिक न उनकी गुजाइंश थी। इसलिए ऐसे दृश्‍य रचने की जरूरत थी जो बिना संवाद के ही सब कुछ कह दें। और वे रचे गए। इन दृश्‍यों को जीवंत बनाने में बैकग्राउंड म्‍यूजिक का बहुत बड़ा हाथ है।संवाद तो इलिना के लिए भी नहीं थे,पर जो थे उन्‍हें उनके मुंह से सुनना अच्‍छा लगता है।पुलिस इंस्‍पेक्‍टर के रोल में कल्‍लू मामा यानी सौरभ शुक्‍ला भी अपनी चिरपरिचित अदाकारी के साथ मौजूद हैं।उनका मेकअप जिसने भी किया है,गजब किया है। उनकी युवावस्‍था और बुढ़ापे दोनों में स्‍पष्‍ट अंतर दिखता है। 

दार्जिंलिंग की लोकेशन और वहां की बच्‍चा गाड़ी या जिसे टॉय ट्रेन कहते हैं फिल्‍म की पहचान जैसी बन जाती है।निर्देशक ने हमें वह भी दिखाया जो पहले कभी हमने दार्जिलिंग की लोकेशन में नहीं देखा था।

स्‍वानंद किरकिरे, नीलेश मिश्रा और तमाम अन्‍य गीतकार आजकल जिस तरह के गीत लिख रहे हैं,उन्‍हें सुनना अच्‍छा लगता है।इस फिल्‍म के गीत भी कुछ ऐसे ही हैं।पहली बार प्रीतम का संगीत मुझे इतना शीतल लगा।फिल्‍मांकन बहुत अच्‍छा है।संपादन भी कसा हुआ।

इस बात के लिए तैयार रहिए कि इस साल के कई सारे पुरस्‍कार यह फिल्‍म बटोर सकती  है।

आज की फिल्‍मों पर अतीत की छाया भी पड़ती दिखाई देती है। मैं उसे बुरा नहीं मानता,अगर उसे ज्‍यों का त्‍यों दोहराया नहीं जा रहा हो।यह भी कहीं कहीं कमला हसन की दो फिल्‍मों पुष्‍पक और सदमा की याद ताजा कर देती है। एक और बात इसके प्रचार-प्रसार में कहा जा रहा है कि यह एक रोमांटिक कॉमेडी है। मेरे ख्‍याल से यह इस फिल्‍म और इसकी कहानी के साथ सरासर अन्‍याय है। बल्कि जिन किरदारों की यह कहानी है उनका अपमान है।वे कॉमेडी के पात्र नहीं हैं। वे जिंदगी की हकीकत हैं।

सच कहूं तो अनुराग बासु ने कमाल की फिल्‍म बनाई है। 
                                     0राजेश उत्‍साही 
                                                                                

Friday, September 7, 2012

शिक्षकों का ई-मंच : टीचर्स ऑफ इण्डिया


अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन द्वारा संचालित एवं राष्‍ट्रीय ज्ञान आयोग द्वारा समर्थित टीचर्स ऑफ इण्डिया बहुभाषी पोर्टल 5 सितम्‍बर यानी इस शिक्षक दिवस पर नए रंग-रूप में आ गया है। अगर आप शिक्षा में रुचि रखते हैं,पालक हैं, शिक्षक हैं या फिर शिक्षा के मुद्दों को लेकर विमर्श करते रहते हैं, तो निश्चित ही यह पोर्टल आपके लिए ही है। एक बार नहीं बार-बार इस पर आएं,देखें, सदस्‍य बनें,रचना सहयोग करें। 
मैं इसमें हिन्‍दी सम्‍पादक के तौर पर कार्यरत हूं।
आपका हार्दिक स्‍वागत है। 
                                                                      0 राजेश उत्‍साही 

Saturday, August 11, 2012

एक या अधिक !

                                                                                     राजेश उत्‍साही 

एक आवासीय स्‍कूल में बच्‍चों के लिए फल रख हुए थे। वहां एक तख्‍ती लगी थी कि,‘केवल एक ही फल लें। क्‍योंकि भगवान इस बात की निगरानी कर रहे हैं कि कौन एक से अधिक से लेता है।’

एक दूसरी जगह बच्‍चों के लिए चॉकलेट रखीं थीं। वहां भी यही चेतावनी लिखी थी। लेकिन वहां किसी बच्‍चे ने अपनी तोतली हस्‍तलिपि में लिखकर लगा दिया था,'एक से अधिक चॉकलेट ली जा सकती हैं,क्‍योंकि भगवान फिलहाल फल की निगरानी में व्‍यस्‍त हैं।’
*
एक दोस्‍त ने यह एसएमएस भेजा था। पढ़ने में वह एक चुटकुले की तरह और मासूमियत भरा लगता है।पर उसमें कितनी तर्कसंगत बात छुपी है,जिसे हम धीरे-धीरे भूलते जाते हैं। और बस मान लेते हैं कि जो कहा जा रहा है वह सही है।
                                       0 राजेश उत्‍साही

Sunday, August 5, 2012

सायना : कहना था ‘न'

                                                                         राजेश उत्‍साही 

सायना तुमने जिंदगी में पता नहीं कितनी बार अनचाही चीजों के लिए न कहा होगा। एक दृढ़निश्‍चय के साथ न कहा होगा। तभी तुम इस मुकाम पर पहुंच सकी हो।
*
तुम्‍हें इस बार भी न कहना चाहिए था।
तुमने शायद कहा भी।
पर तुम्‍हें स्‍पष्‍ट रूप से न कहना चाहिए था।
*
तुम्‍हें यह पदक स्‍वीकार नहीं करना चाहिए था।
तुम वह नहीं जीती हो जिसके जीतने पर यह पदक मिलता है।
यह पदक केवल भारत के लिए एक संख्‍या है।
जहां तक इतिहास की बात है तो तुम वह तो पहले ही रच चुकी थीं,जब सेमीफायनल में पहुंची थीं। ओलम्पिक खेलों में भारत की तरफ से बैडमिंटन प्रतियोगिता के सेमीफायनल में पहुंचने वाली तुम पहली खिलाड़ी बन ही गईं थीं।
*
एक खिलाड़ी,भारतीय खिलाड़ी,के तौर पर तुम सचमुच सर्वश्रेष्‍ठ हो। पदक न लेंती, तब भी रहतीं।
एक व्‍यक्ति के तौर पर तुम्‍हारा कद कहीं और ऊंचा होता,काश तुमने न कहा होता।
न कहना तुम्‍हें और गौरव देता सायना।                0 राजेश उत्‍साही   

Saturday, August 4, 2012

????????

                                                                                 राजेश उत्‍साही 

-अन्‍ना ने बहुत बुरा किया।
-हां यार सचमुच।
-अब कैसे मिटेगा भ्रष्‍टाचार इस देश से।
-उनसे ही कुछ उम्‍मीद थी।
दोनों राज्‍य परिवहन की बस में सवार थे। टिकट टिकट.... कंडक्‍टर ने आवाज लगाई।
-दो टिकट कोदंडराम नगर।
-चौदह रूपए।
पहले ने बीस का नोट आगे किया।
कंडक्‍टर ने दस का नोट वापस किया और आगे बढ़ गया।
-भाई साहब टिकट..।
-अरे छोड़ो न यार,क्‍या करोगे।...कंडक्‍टर मुस्‍कराया।
और दोनों फिर से चर्चा में डूब गए।
-बहुत भ्रष्‍टाचार है इस देश में।...पहला बड़बड़ाया।
-कैसे जाएगा ये।...दूसरे ने फिर चिंता जताई।
                               0 राजेश उत्‍साही