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Sunday, March 31, 2013

बाबू जी उर्फ पिता को याद करते हुए



1972 में ग्‍वालियर में दौलतगंज के एक स्‍टूडियो में ली गई तस्‍वीर
 बाएं से दाएं : राजेश, गीता, रीता,बाबू जी, सुनील, अम्‍मां, बबीता, दादी और अनिल
 ( रीता,सुनील,बबीता और दादी भी अब इस दुनिया में नहीं हैं)

स्‍कूल सर्टीफिकेट के हिसाब से एक अप्रैल को पिता जी का जन्‍मदिन है। वरना दादी का कहना था कि वे दिवाली की दोज को पैदा हुए थे। और इसीलिए उनका नाम दुर्जन पड़ गया था, जिससे वे लम्‍बे समय तक खासे परेशान भी रहे। असल नाम उनका प्‍यारेलाल था।
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प्‍यारेलाल के माता-पिता बुंदेलखंड के छतरपुर जिले की हरपालपुर तहसील के बिजावर रियासत के बारबई कस्‍बे से काम की तलाश में कभी इटारसी आ गए थे। प्‍यारेलाल का जन्‍म बरबई में ही हुआ था। इटारसी की आठवीं गरीबी लाइन में उनका बचपन बीता। उनके पिता रेल्‍वे में खलासी थे। वे अक्‍सर ट्रेन में दौरे पर जाया करते थे। प्‍यारेलाल जब तेरह चौदह साल के रहे होंगे तो एक ट्रेन एक्‍सीटेंड में उनके पिता की मृत्‍यु हो गई। प्‍यारेलाल से बड़ी एक बहन थी, और एक छोटी। प्‍यारेलाल की मां पर उनके लालन-पालन की सारी जिम्‍मेदारी आ गई। प्‍यारेलाल शायद उन दिनों पढ़ रहे थे। उनकी मां ने हत्‍था बाजार यानी अनाज मण्‍डी में नौकरी कर ली। जहां अनाज को छानना-बीनना,बटोरना जैसे आदि काम होते थे। जिस मैदान में अनाज की ढे‍रियां लगाई जाती थीं, उसे गोबर से लीपना होता था। मण्‍डी में आए लोगों को पानी पिलाना होता था। उनकी मां सोलह गज की साड़ी पहनती थीं। जिसे टांगों के बीच से निकालकर कछोटे की तरह बांधा जाता है। इस तरह से साड़ी पहनना संभवत: उन्‍हें ज्‍यादा सहज और काम करने के लिए आरामदायक लगता होगा। जाहिर है उन्‍हें हाड़तोड मेहनत करनी पड़ती थी।

ऐसे में आसपड़ोस और जानने वालों का सुझाव होता था कि प्‍यारेलाल की पढ़ाई छ़ुड़वाकर उन्‍हें काम पर लगाया जाए, ताकि वे घर की जिम्‍मेदारियां उठा सकें। पर प्‍यारेलाल की मां यानी जानकीबाई चाहती थीं कि वे अपनी पढ़ाई पूरी करें। वे खुद तो पढ़ नहीं सकीं थीं। स्‍कूल वे गईं थीं, पर किसी बात पर मास्‍टर ने उनकी हथेली पर छड़ी से मारा। उनकी एक उंगली में इतनी चोट लगी कि उनसे बरदाशत नहीं हुई। उसके बाद स्‍कूल उन्‍होंने स्‍कूल का कभी मुंह नहीं देखा। प्‍यारेलाल ने अपनी मां का कहना माना। पढ़ाई पूरी की यानी दसवीं की परीक्षा पास कर ली। 1950 में दसवीं की परीक्षा पास करने के बाद प्‍यारेलाल ने मूंगफली बेची। सब्‍जी मण्‍डी में आढ़तिए का काम किया। इटारसी की भारत टॉकीज में टिकट काटी।

उन दिनों रेल्‍वे की कुछ नौकरियों के लिए दसवीं पास होना ही पर्याप्‍त होता था। स्‍टेशन मास्‍टर, तारबाबू और टिकट कलेक्‍टर की नौकरी के लिए एक संयुक्‍त परीक्षा होती थी। प्‍यारेलाल ने यह परीक्षा दी और वे चयनित हो गए। बहुत सोचने के बाद उन्‍होंने तारबाबू बनना स्‍वीकार किया। 1952 में तारबाबू के रूप में उनकी पहली पोस्टिंग नागपुर में हुई। इसी बरस उनकी शादी नागपुर में ही गणेशी बाई से हुई। गणेशी बाई के माता-पिता भी बुंदेलखंड से नागपुर जाकर बस गए थे। गणेशीबाई के पिता नागपुर की कपड़ा मिल में काम करते थे। प्‍यारेलाल को यह नाम कुछ जमा नहीं, सो उन्‍होंने उसे बदलकर प्रेमलता कर दिया। प्‍यारेलाल की मां तथा बहनें इटारसी में थीं। इसलिए कुछ दिनों के बाद उन्‍होंने नागपुर डिवीजन से अपना तबादला झांसी डिवीजन में करवा लिया।
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यह सारी कहानी और बातें उनकी मां यानी दादी ही हमें बताया करतीं थीं।
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प्‍यारेलाल रेल्‍वे में आने के बाद पीएल पटेल हो गए। पीएल पटेल से भी पटेल साहब या पटेलबाबू। फिर यहीं से धीरे धीरे वे बाबू जी में तब्‍दील हो गए। उनका अंग्रेजी और हिन्‍दी दोनों भाषाओं पर अच्‍छा नियंत्रण था।
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तो पीएलपटेल और प्रेमलता पटेल की मैं कुल मिलाकर तीसरी और जीवित रूप में पहली संतान था। पिता यानी बाबू जी की पहली याद मुझे अपनी पांच साल की उमर की है। उन दिनों हम बीना में थे। तीन घटनाएं मुझे याद आती हैं।

हम रेल्‍वे क्‍वार्टर में रहते थे। गुब्‍बारे,फिरकनी, पुंगी बेचने वाले फेरीवाले अक्‍सर रेल्‍वे कालोनी में चक्‍कर लगाया करते थे। ऐसे ही एक दिन फेरीवाले को देखकर मैंने उससे पुंगी मांग ली। फेरीवाले ने कहा बेटा, पुंगी तो पैसे से आती है। पैसे ले आओ। मैं भागकर गया। घर में पावडर के खाली डिब्‍बे में पैसे रखे होते थे। उसमें पांच का नोट था। मैं वही लेकर चला गया। पुंगी ली और बाकी पैसे लाकर उसी डिब्‍बे में रख दिए। अम्‍मां (मां को हम अम्‍मां कहते हैं, आज भी) कहीं पड़ोस में गईं थीं। बाबूजी डयूटी पर। दोनों एक साथ लौटे और मेरा सामना दोनों से एक साथ हुआ। मेरे हाथ में पुंगी देखकर, उनका सवाल हुआ कि पुंगी कहां से आई। मैंने उन्‍हें सच सच बता दिया।

उन्‍होंने तब बस शायद इतना कहा था, ऐसे चुपचाप पैसे नहीं लेते हैं, पूछ कर लेते हैं। अच्‍छे बच्‍चों की तरह हमने भी सिर हिला दिया था। यह मेरे लिए उनका पहला सबक था।
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सबक भी ऐसा था कि बाद में मैंने उन्‍हें इस बारे में कभी शिकायत का मौका नहीं दिया। हम कुल सात भाई-बहिन हुए, जिनमें से आज चार जीवित हैं, दो भाई और दो बहनें। तो मैंने ही नहीं इस मामले में हम सबने यही सीखा कि जब भी जरूरत हो, बताओ, पैसे मिल जाएंगे। बाद में अम्‍मां-बाबू जी ने यह प्रयोग किया था कि जब बाबू जी वेतन लेकर आते और अम्‍मां को देते। अम्‍मां उसे एक बक्‍से में रखतीं। हम सबको बताया जाता कि कितना वेतन आया है। उस वेतन से महीने भर क्‍या-क्‍या खर्च होना है। अब हमारी जरूरतें कितनी महत्‍वपूर्ण हैं हम तय करें, और आवश्‍यकता अनुसार पैसे लें लें। यह प्रयोग खासा सफल रहा। हम सब भाई-बहनों में पैसों को लेकर एक तरह के आत्‍मअनुशासन की नींव पड़ी। मैंने अपने बेटों के साथ इस प्रयोग को दोहराया और मैं भी सफल रहा।   
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वहीं एक शाम घर के आगे वे मेरे साथ गिल्‍ली-डंडा खेल रहे थे। उन्‍होंने गिल्‍ली को उछालकर उस पर शाट मारा। गिल्‍ली सामने मैदान में जाकर गिरी। वहां बरसात का पानी जमा था। मैं दौड़कर गया। पानी में कहीं किसी टूटी बोतल का कांच पड़ा हुआ था, वह मेरे दाएं तलुए में गड़ गया। मैं गिर पड़ा और रोने लगा। वे दौड़कर आए, गोद में उठाया और पास की रेल्‍वे डिस्‍पेंसरी ले गए। कई दिनों तक पैर में पट्टी बंधी रही। उस चोट का निशान अब तक है।
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वे गिल्‍ली-डंडा ही नहीं, वॉलीबाल और हॉकी के बहुत अच्‍छे खिलाड़ी थे। कुश्‍ती लड़ते थे। खिलाड़ी तो वे ताश के भी थे। बीना के रेल्‍वे इंस्‍टीटयूट में दिवाली पर जुआ होता था। वे उसमें शामिल होते थे। ताश खेलने की उनकी यह आदत वर्षों तक रही। मजेदार बात यह भी है कि ताश खेलने को बुरा माना जाता था और इस वजह से हमारे घर में कभी ताश नहीं खेला गया। बीच में एक समय ऐसा भी आया जब वे खाली समय में सट्टे का नम्‍बर खोजने के लिए तरह-तरह के गुणा-भाग करते रहते थे। पता नहीं कभी कोई नम्‍बर लगा कि नहीं। लॉटरी के टिकट खरीदने का शौक भी उन्‍हें था। पर कभी कोई लॉटरी नहीं लगी। हां, इन सबके बीच यह जरूर अच्‍छी बात रही कि घर की जरूरतों के लिए पैसों की कमी उन्‍होंने कभी नहीं होने दी।
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बीना के रेल्‍वे इंस्‍टीटयूट में एक नर्सरी स्‍कूल चलता था। मुझे भी उसमें भरती करवाया गया। शायद पहले या दूसरे दिन ही वहां से किसी समारोह के लिए चंदे की मांग आ गई। यह मांग बाबूजी को नहीं भाई। नतीजा यह कि हम स्‍कूल से बाहर।
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बाबूजी अब नहीं हैं। वे आज होते तो उनकी आयु उन्‍यासी साल की होती। उनके व्‍यक्तित्‍व के कई श्‍वेत-श्‍याम पक्ष हैं। फिलहाल इतना ही। अगली किसी पोस्‍ट में कुछ और बातों पर चर्चा करूंगा। 
                                                     0 राजेश उत्‍साही

Saturday, January 5, 2013

कल, आज और कल



यह जैसे कल ही की तो बात है। कुछ भी तो नहीं बदला है।
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यह 1978 की फरवरी की रात है। बहुत ठंड है। बाहर भी और घर में भी। रेल्‍वे कॉलोनी में एस्बस्‍टास की छत वाले इस घर में तो और भी ज्‍यादा ठंड लगती है।  छोटी बहन रीता को अस्‍थमा की शिकायत है। ठंड बढ़ती है तो उसकी तकलीफ भी बढ़ने लगती है। शाम से बढ़ने लगी है। कोयले की सिगड़ी के चारों तरफ जमा हम सब भाई-बहन रीता को संभालने की कोशिश कर रहे हैं। दादी कह रही है, अरे विक्‍स मल दो छाती में। न हो तो जरा ब्रांडी की मालिश कर दो। अभी आराम लग जाएगा। मां कह रही हैं, मुन्‍ना कुछ कर भैया। इसकी हालत ठीक नहीं है।

पिताजी घर में नहीं हैं। घर में क्‍या वे शहर में ही नहीं हैं। वे अपनी एक ट्रेंनिग के सिलसिले में भुसावल गए हैं।  

रात के आठ बज रहे हैं। मुझे कुछ सूझ नहीं रहा है। ठंड के कारण सब लोग सई शाम से घरों में बंद हो जाते हैं। मैं साइकिल लेकर अपने एक दोस्‍त से सलाह करने निकल पड़ा हूं। उसने सलाह दी है कि रीता को अस्‍पताल ले जाना चाहिए, तुरंत सरकारी अस्‍पताल। अब प्राइवेट अस्‍पताल तो कोई है ही नहीं।  

मैं दोस्‍त के साथ घर वापस आता हूं। तांगा करता हूं। मां और मैं दोनों रीता को तांगे में बिठाकर जिला चिकित्‍सालय ले जा रहे हैं। अस्‍पताल में जगह नहीं है। पहली मंजिल के बरामदे में उसे फर्श पर भरती कर लिया गया है। डॉक्‍टर ने परचा बना दिया है। नर्स ने दवा बाजार से लाने के लिए परची बना दी है।

मां और दोस्‍त को वहां छोड़कर, दवा लेने दौड़ पड़ा हूं। दवा की दुकान में भीड़ है। दुकानदार कह रहा है, जरा सब्र रखो। जल्‍दी है तो दूसरी दुकान पर चले जाओ।

लौटकर देखता हूं रीता चुपचाप लेटी है। ऑक्‍सीजन की नली उसकी नाक में ठुंसी हुई है। दोस्‍त अपने दोनों हाथ सीने पर बांधकर एक किनारे खड़ा हुआ है। दोस्‍त बताता है नली की अकबकाहट ने रीता की सांस को और उखाड़ दिया था। और वह ऐसी उखड़ी कि उसके प्राण ले उड़ी। मां, उसके सिरहाने बैठीं अपनी रूलाई रोकने की कोशिश कर रही हैं।

डाक्‍टर कह रहा है..घर ले जाओ..कुछ नहीं बचा है अब। रोना,गाना घर जाकर करो। यहां और मरीजों को तकलीफ होगी।

मैं अपनी आंख में अंगारे भरे, तेरह साल की रीता की ठंडी देह को अपने दोनों हाथों में उठाए सीढि़यां उतर रहा हूं। मां रेलिंग का सहारा लेकर उतर रही हैं।

दोस्‍त सीने पर हाथ बांधे आगे-आगे दूरी बनाकर चल रहा है।  

मृतदेह को ले जाने के लिए तांगेवाले भी तैयार नहीं हैं। मां को रीता के शव के पास बिठाकर कुछ इंतजाम करने निकलता हूं। आखिर एक परिचित का हाथ ठेला मिलता है, उसी पर उसका शव लेकर लौटता हूं।
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कल की तो बात है।
इन बीते सालों में कितनी बार यह घटना याद आती रही। हर बार मैं सोचता हूं, आखिर दोस्‍त ने रीता की मृत देह को हाथ क्‍यों नहीं लगाया? उसे अस्‍पताल की पहली मंजिल से नीचे लाने में मेरी मदद क्‍यों नहीं की? क्‍यों नहीं उसने डाक्‍टर को उसकी असंवेदनशीलता के लिए बुरा-भला कहा? क्‍यों उसने किसी तांगे वाले को डांटकर अपने कर्त्‍तव्‍य की याद नहीं दिलाई? क्‍यों नहीं वह कुछ और इंतजाम होने तक वहां रूका ?

आज फिर से सोच रहा हूं। जैसे यह कल की नहीं आज ही की तो बात है।                            0 राजेश उत्‍साही
                                                             
  

Tuesday, January 1, 2013

नीमा के बहाने



                                   मैसूर वृदांवन गार्डन : जून 2010
मित्रो आज मेरी पत्‍नी नीमा का जन्‍मदिन है। दो साल पहले अपने विवाह की पच्‍चीसवीं वर्षगांठ पर मैंने नीमा को केंद्र में रखकर एक लम्‍बी कविता लिखी थी। यह कविता चार भागों में मेरे कविता ब्‍लाग गुलमोहर पर प्रकाशित हुई थी। यह कविता मेरे पहले संग्रह वह जो शेष है.. में भी संकलित है।

हम आज जिस अजाब से गुजर रहे हैं, उसमें चल रही बहस के बीच मैं अपनी पत्‍नी में बसी स्‍त्री को किस तरह देखता हूं, यह इस कविता में कहने की कोशिश की है। आपमें से बहुत से साथियों ने उस समय भी इसे पढ़ा था, अपनी प्रतिक्रिया दी थी। एक बार फिर मैं उस कविता को यहां आप सबके सामने रख रहा हूं। 


यह कविता नीमा के प्रति मेरी एक सार्वजनिक आदरांजलि है। बहुत संभव है इसका कोई साहित्यिक महत्‍व न हो।



मेरी
जीवनसंगिनी
यानी कि पत्‍नी का नाम
निर्मला है
यह असली नाम है
बदला हुआ या काल्‍पनिक नहीं
पर हां प्‍यार से
या समझ लीजिए सुविधा से
मैं नीमा कहकर बुलाता हूं।