एक शांत,शांतिप्रिय,स्वस्थ्य,आनन्ददायी समाज के निर्माण में बेमतलब की अनगिनत गप्पों,भद्दी जानकारियों की कोई भूमिका नहीं है।
दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान यूरोप में कई जगहों पर एक पोस्टर बार-बार चिपकाया जाता था, ‘गप्पें मत मारो। इससे जान भी जा सकती है।’ युद्ध के दौरान नागरिक यदि साधारण बातचीत में भी संयम न रखें तो माना जाता था इससे दुश्मन को इस पक्ष का कोई सुराग मिल जाएगा और तब न जानें कितनी जानें चली जाएंगी। बेमतलब की हल्की-फुल्की बातचीत से बचो-यह था संदेश।