‘टिकट दिखाइए।’ एक आवाज गूंजी।
दूसरे ही क्षण रामपुरी सामने था। यह पहले का टिकट था। वह आगे कुछ करता, इससे पहले ही दूसरे ने तुरंत चाकू छीनकर जेब के हवाले किया और रसीद किए दो हाथ।
टिकट चेकर की आंखों में कृतज्ञता झलक आई। दूसरे ने एक नजर पहले को देखा और फिर टिकट चेकर को दूसरे दरवाजे की ओर ले जाकर धीरे से कहा, ‘बाबूजी,टिकट तो मेरे पास भी नहीं है।’
0 राजेश उत्साही
बम्बई यानी आज की मुम्बई से रामावतार चेतन के संपादन में प्रकाशित होने वाली पत्रिका रंग-चकल्लस के नवम्बर-दिसम्बर,1981 अंक में प्रकाशित ।