बचपन के दिन कुछ इस तरह याद आएं
कहीं से टूटे खिलौने जैसे बच्चे ढूंढ लाएं
रेल के खेल की कूकू, खेलना पहाड़-पानी
कभी गिल्ली-डंडा, कभी बेबात शर्त लगाएं
खेल वो आती-पाती, मिट्टी का घर-घूला
बरसती धूप में ,जब तब अंटियां चटकाएं
दादी की कहानी, सरासर गप्प नानी की
जब बाबूजी डांट दें,तो गा लोरी मां सुलाएं
सर्द हवा के मौसम को, बांधकर मफलर से
सूरज की तलाश में, दिन भर दांत बजाएं
गड़गड़ाहट बादलों की,कागज़ की कश्तियां
राह चलते पानी में बेमतलब पैर छपछपाएं
बेबात पेड़ों पर चढ़ना, वो कूदना डालियों पर
फूट जाएं कभी घुटने, तो कभी दांत तोड़ लाएं
नीम की मीठी निबोली,सावन के वो झूले
पेंग लें ऊंची गुईंयां, जम के हम झुलाएं
घुटना टेक ही सही, या खड़े रहें बेंच पर
पन्ने फाड़कर कापी से, हवाई जहाज बनाएं
वो छुप-छुप के देखना, निहारना उसको
रहना मोड़ पर,निकल के जब स्कूल जाएं
काश अगर हो कहीं बैंक अपने बचपन का
चलो उत्साही कुछ और लम्हे निकाल लाएं
*राजेश उत्साही