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Saturday, October 12, 2013

अपने अपने रावण

नवरात्रि..रामलीला..दशहरा और फिर टेसू। यादों का क्रम कुछ इसी तरह बनता है। बचपन में जिला मुरैना के सबलगढ़ की संतर नम्‍बर दो की सड़कों पर बने मंच पर होने वाली रामलीला याद है। इस रामलीला का सबसे बड़ा आकर्षण हनुमान जी द्वारा संजीवनी बूटी लेकर आना होता था। सत्‍तर के दशक में इस दृश्‍य को मंचित करने के लिए रस्‍सी और उस पर गिर्री की मदद से लटके हनुमान की कल्‍पना ही हमें रोमांचित कर देती थी। और ऐसे होते देखना तो सचमुच अनोखा अनुभव होता था। रामलीला में आगे बैठने के लिए शाम से अपनी टाट की बोरी लेकर जाकर जगह घेरकर बैठना होता था। बाद में ज्‍यों-ज्‍यों उमर बढ़ती गई हमारे लिए रामलीला..रासलीला में बदलती गई। बैठकर देखने की बजाय भीड़ में किनारे पर खड़े होकर..जगह बदल बदलकर रामलीला देखने में ज्‍यादा आनंद आने लगा। फिर एक दिन ऐसा भी आया कि रामलीला का आकर्षण जाता रहा।

दशहरे पर रावण और उसके कुटम्बियों के पुतले जलते देखने का आकर्षण भी होता था। पर उससे ज्‍यादा इंतजार होता था, पुतले जलने के बाद बची हुई बांस की अनजली खप्‍पचियों को लूटने का। असल में हम इन खप्‍पचियों से ही टेसू बनाते थे। तीन खप्पचियों को बीच से कुछ इस तरह बांधते कि वे खोमचे वाले के स्‍टैंड की शक्‍ल में आ जातीं । एक तरफ के तीन सिरों में से बीच के सिरे पर मिट्टी का मुंह बनाया जाता और बाकी दो सिरों पर हाथ। जाहिर है कि दूसरी तरफ के तीन सिरे उसके पांव होते। बीच में जहां खप्‍प्‍चियों को बांधा जाता, वहां दिया रखने के लिए जगह बनाई जाती। जब मिट्टी सूख जाती तो उस पर रंग से आंख नाक आदि बनाए जाते। और फिर अगले एक सप्‍ताह तक लड़कों की टोली शाम होते ही टेसू को लेकर घर-घर जाती। दरवाजे पर धरना देकर गीत गाती...
मेरा टेसू , यही अड़ा
खाने को मांगे दही बड़ा
दही बड़े ने पू्छी बात
कितने लोग तुम्‍हारे साथ
एक सौ अस्‍सी नौ हजार

बस यह गीत...कुछ इसी तरह से आगे बढ़ता रहता।
घर से हमें पैसे, दिये में तेल या फिर अनाज भी मिलता। इस सबको एकत्रित किया जाता और सातवें दिन इस पैसे का उपयोग गोठ के लिए किया जाता। यह गोठ वास्‍तव में टेसू के विवाह समारोह की पार्टी होती। इधर लड़के टेसू को लेकर घूम रहे होते और उधर लड़कियां झांझी को लेकर। झांझी का विवाह ही टेसू के साथ किया जाता। फिर ये सब चीजें धीरे-धीरे पीछे छूटती गईं।

जब तक होशंगाबाद में थे, यानी 1985 के आसपास तक, वहां की टपरा टॉकीज के सामने, लेंडिया बाजार के मैदान में जलने वाले रावण को देखने जाने का अपना एक आकर्षण था। पूरे शहर का एकमात्र वही रावण होता था।

फिर जब भोपाल आ गए तो तब तक हर मोहल्‍ले का अपना रावण होने लगा था। जाहिर है कि समाज बदल रहा था और उसमें भी यह होड़ कि किस मोहल्‍ले का रावण सबसे ऊंचा होगा। जिसका जितना ऊंचा रावण, उसका उतना मान। एक-दो साल भोपाल के विट्टन मार्केट के रावण को जलते देखने का मौका मिला। वह भी कबीर को दिखाने के लिए जाने के कारण। फिर तो वहां इतनी भीड़ होने लगी कि पांव धरना भी मुश्किल। और फिर उसके विकल्‍प के रूप में घर में बैठकर टीवी पर जगह-जगह के और अलग-अलग शहरों के रावण को जलते देखना ही रह गया ।

कबीर को इस सबमें बहुत रुचि नहीं रही। लेकिन जब उत्‍सव लगभग नौ-दस साल का हुआ तो उसने कहा, हम भी अपना रावण बनाएंगे और जलाएंगे। फिर अगले दो-तीन सालों तक दोनों भाई मिलकर रावण बनाते रहे। उसके लिए लकड़ी का इंतजाम करना, उसका ढांचा बनाना, रंगीन कागज लाना, उस पर चिपकाना उसके हाथ-मुंह आदि की डिजायन बनाना सब वे ही करते, खासकर उत्‍सव। अपना काम होता अंत में बस एक फोटो लेना। दशहरे के दिन घर के सामने रावण भी वे ही जला रहे होते और दर्शक भी वे ही होते और ताली बजाने वाले भी। वे दिन भी बीत गए।

कमबख्‍त रावण है कि अब भी जिंदा है और पता नहीं कब तक जिंदा रहेगा।
                                                                                 0 राजेश उत्‍साही

Saturday, July 20, 2013

अभी तो मैं जवान हूं...




यूनीवर्स्‍टी में दोपहर के खाने के समय जब कैंटीन में बहुत भीड़ हो जाती है तो कुछ लोग अपनी थाली लेकर बाहर बास्‍केटबाल ग्राउंड में निकल जाते हैं। मैं खाना खाकर निकला तो ग्राउंड में भोजन करती एक परिचित युवती ने कहा.. आइए यहां बैठिए हमारे पास..अभी तो आप जवान हैं..और फिर अपने एक अन्‍य मित्र से परिचय कराते हुए तारीफ में कसीदे काढ़ दिए..ये वो हैं, ये तो हैं, सम्‍पादक हैं, लेखक हैं...और भी न जाने क्‍या..क्‍या...फिर मुझ से मुखातिब होते हुए पूछा...मैंने ठीक ही कहा न। मैंने कहा...पता नहीं...मैं तो अभी पहले ही वाक्‍य में अटका हुआ हूं....(पचपन की उमर में सोच रहा हूं दिल बहलाने को ख्‍याल अच्‍छा है)।
***  
मई में उदयपुर में था। नोटिस किया कि शरीर पर अचानक ही कुछ ददोरे उभर आते थे, कुछ देर बाद अपने आप ही बैठ जाते थे। पर जितनी देर रहते, उनमें खुजली होती रहती। लगा कि शायद मच्‍छरों के काटने से हो रहा है। मच्‍छर भगाने का इंतजाम किया। पर ददोरे कम नहीं हुए। उदयपुर से भोपाल आया। भोपाल में वही हाल। लगा कि शायद घर में खटमल हो गए हैं। लकड़ी की जिस चौकी पर बैठता था, उसे बाहर ले जाकर पटका, ठोका, उसकी दरारों को खटकाया। पर खटमल का ख भी नहीं नजर नहीं आया। भोपाल से इंदौर, सेंधवा और फिर देवास गया। सब जगह यह समस्‍या ज्‍यों की त्‍यों रही। नीमा ने कहा, यह तो ‘शीत’ लगती है।

भोपाल से देहरादून जाना था। देहरादून पहुंचा तो वहां भी वही स्थिति। लगा कि एलर्जी होगी, तो मेडीकल स्‍टोर में एविल खरीदने गया। एविल का नाम सुनकर दुकानदार ने बुरा सा मुंह बनाया और कहा नहीं है। उसने धीरे से किसी और गोली का नाम लिया, इतने धीरे से कि मैं सुन भी नहीं सकता था। मैं भी चुपचाप लौट आया। देहरादून आफिस में बंगलौर के पुराने साथी मासूम हैं। उनके पिताजी डॉक्‍टर थे और चाचा का मेडीकल स्‍टोर है, सो उन्‍हें दवाओं की अच्‍छी खासी जानकारी है। उन्‍हें समस्‍या बताई, तो बोले एविल तो अब बैन हो गई है। उसके बदले में एक दूसरी दवा ली जाती है। उसका नाम एक पर्ची पर लिखकर दिया। ऑफिस के सामने ही मेडीकल स्‍टोर है। वहां से दवा खरीदी। पांच गोलियों का दाम दस रूपए। गोलियों के पत्‍ते पर दस गोलियों का दाम पैंतीस लिखा था। मैंने सोचा,शायद दुकानदार ने ठीक से नहीं देखा और कम पैसे लिए हैं। लौटकर मैंने उससे कहा। वह बोला, नहीं यह गोली हमें इतने में ही पड़ जाती है। इस दवा से फौरी आराम हो गया।

बंगलौर लौटा तो इसी सिलसिले में एक निजी अस्‍पताल में दिखाने गया। वहां महिला डाक्‍टर थीं। उन्‍होंने ब्‍लड प्रेशर देखा, तुरंत किया जाने वाला सुगर टेस्‍ट किया। सब कुछ सामान्‍य था। उन्‍होंने कहा, गुड। दवाइयां लिखते हुए पूछा, स्‍मोकिंग करते हैं, मैंने न में सिर हिलाया। पूछा, रात को ड्रिंक करते हैं। मैंने कहा, दिन में भी नहीं करता। उन्‍होंने मेरी तरफ देखा और मुस्‍कराते हुए कहा, वेरी गुड।

दोनों बार उन्‍होंने कुछ इस अंदाज में गुड कहा, जैसे एक अच्‍छी टीचर कक्षा में अपने किसी विद्यार्थी को सवाल सही हल करने पर शाबाशी दे रही हो। सचमुच खुशी हुई। असल में तो स्‍कूल में कभी ऐसा मौका ही नहीं आया कि अपन को गुड मिले..और वह भी किसी महिला टीचर से...। अव्‍वल तो महिला टीचर ने पढ़ाया ही नहीं।
***  
देहरादून ऑफिस में एक और सहकर्मी हैं। जब मौका मिलता, मुझे बुढऊ कहने से नहीं चूकते। मुझे पता है कि वे यह मजाक में ही कहते हैं। पर एक मैं हूं कि मुझे इस बात का अहसास ही नहीं होता है कि मैं अब पचासपार हो गया हूं। असल में सिर पर सफेद कालों बालों की खिचड़ी सत्रह की उमर में ही पक गई थी। इसलिए इस बात का कभी अंदाजा ही नहीं हुआ कि अपना बुढ़ापा कब शुरू हो रहा है या कि हो गया है। कभी-कभी सोचता हूं सहकर्मी सचमुच मजाक कर रहे होते हैं या इस बात से कहीं अंदर ही अंदर जल रहे होते हैं कि ये जनाब तो अभी भी कई बातों में जवानों को मात करते हैं।
 ***
तीन बरस पहले का एक और वाकया है। विप्रो कैंटीन में मैं अपने एक युवा सहकर्मी के साथ खाने के लिए जाता था। वहां एक समय पर एक साथ पांच-छह सौ लोग भोजन कर रहे होते हैं। जाहिर है कि उनमें सभी उम्र के महिला-पुरुष होते हैं। अब अपन....मैं हर हंसी चीज का तलबगार हूं... वाली नजर रखते हैं....सो किसी का चेहरा, किसी की चाल, किसी ढाल और किसी की पोशाक, किसी की सादगी, किसी की संवाद अदायगी, किसी की मुस्‍कान और किसी के नैनों के बाण अपना ध्‍यान खींच ही लेते थे। यह बात हमारे युवा साथी को कुछ नागवार गुजरती थी। एक दिन उसने कहा,'उत्‍साही जी, अब आपकी उमर इधर-उधर नहीं, भगवान में ध्‍यान लगाने की है।' मैंने कहा, वही तो कर रहा हूं। उसने पूछा, 'कैसे।' मैंने 'रब ने बना दी जोड़ी' में जयदीप साहनी का लिखा उसका प्रिय गाना उसे सुना दिया, 'तुझमें रब दिखता है।'
                                                                            0 राजेश उत्‍साही
     

Friday, September 2, 2011

अपने मियां मिठ्ठू

जाकिर अली 'रजनीश' से उस समय से परिचय है जब यह ब्‍लाग की दुनिया बनी नहीं थी। वे बालसाहित्‍य में नए-नए लेखक के रूप  में उभर रहे थे। मैं चकमक की सम्‍पादकीय टीम में था। साहित्‍य का हिस्‍सा एक तरह से मेरे ही जिम्‍मे था। चकमक के 100 अंक पूरे होने वाले थे। जाकिर की कई रचनाएं मैंने सखेद वापस कर दी थीं। एक दिन उनका एक तल्‍ख पत्र मिला। जिसमें उन्‍होंने लिखा था कि आप शायद नामचीन लोगों की रचनाएं ही प्रकाशित करते हैं। जिनके नाम के आगे डॉक्‍टर लगा होता है उनसे आप बहुत जल्‍द प्रभावित हो जाते हैं। वास्‍तव में ऐसा था नहीं। लेकिन इस बात को समझाना बहुत मुश्किल काम था और वह भी एक उभरते हुए लेखक को। 

Sunday, November 8, 2009

अलविदा बिस्‍वास साहब !

हिमांशु बिस्‍वास यानी एचके बिस्‍वास यानी बिस्‍वास साहब यानी बाबा नहीं रहे। 7 नवम्‍बर की सुबह भोपाल से कार्तिक ने मोबाइल पर यह सूचना दी। 6 नवम्‍बर की रात लगभग दस बजे से साढ़े दस बजे के बीच उन्‍होंने आखिरी सांस ली। पिछले कुछ समय से वे बीमार चल रहे थे। इस 20 नवम्‍बर को वे 86 साल पूरे करके 87 वें वर्ष में प्रवेश करते।

1980 के आसपास वे भोपाल के भारत हैवी इलेक्ट्रिकल लिमिटेड से वे प्रिटिंग मैनेजर के पद से सेवानिवृत हुए थे। स्‍क्रीन प्रिटिंग उनका शौक भी था और आय का साधन भी। वे घर में ही विजिटिंग कार्ड बनाया करते थे। बस उसी सिलसिले में एक दिन घूमते हुए एकलव्‍य, भोपाल के कार्यालय जा पहुंचे। तब एकलव्‍य अरेरा कालोनी के ई-1 में अर्जुन तरण पुष्‍कर के सामने 208 में होता था। एकलव्‍य में किसी ने विजिटिंग कार्ड  बनवाने में रूचि नहीं दिखाई। पर हां, बिस्‍वास साहब में जरूर दिखाई। उन दिनों यानी 1985 में चकमक पत्रिका निकालने की तैयारी चल रही थी। चकमक के प्रशासनिक कामों खासकर वितरण और मार्केटिंग के  लिए एक अनुभवी व्‍यक्ति की जरूरत थी। बस वे भी चकमक का हिस्‍सा हो गए। 

Saturday, April 4, 2009

मेरा फोटो, फोटो की कहानी

कभी-कभी कोई छोटी-सी घटना अपने में गर्भ में कितनी सारी बातें छुपाए रहती है, इसका उदाहरण है मेरा यह फोटो। यह फोटो जो आप यहां देख रहे हैं। आपमें से कुछ लोग सोच रहे होंगे उत्‍साही जी को और कुछ नहीं सूझा तो अपना बड़ा-सा फोटो लगा के ही बैठ गए।(पहले यह फोटो ब्‍लाग के नाम के साथ था।) एक-दो ने ब्‍लाग देखा तो पहली सलाह यही दी फोटो छोटा करो। जैसे हम किसी बच्‍चे को तेज आवाज में डेक बजाते देखकर कहते हैं आवाज कम करो। क्‍या सुन रहे हो, वह कर्णप्रिय है या नहीं बाद में देखेंगे। बेचारा बच्‍चा भले ही उस्‍ताद जाकिर हुसैन का तबला वादन क्‍यों न सुन रहा हो। कुछ ने फोटो की खूबसूरती को पहचाना और पहली प्रतिक्रिया यही दी कि फोटो बहुत सुंदर है। ऐसी प्रतिक्रिया व्‍यक्‍त करने वालों में मेरे गुरु सुरेश मिश्र भी हैं।

अब आप माने या न मानें, मेरा इतना खूबसूरत फोटो मैंने भी कभी नहीं देखा। खूबसूरत इस मायने में कि चेहरे पर प्रसन्‍नता का जो भाव है और होंटों पर मुस्‍कराहट। वह विरली है। बस इसके पहले यह एक और फोटो में मुझे नजर आई थी। वह 1998 के आसपास किसी ने खींचा था। उसमें मेरे साथ मनोज निगम थे। उस समय एकलव्‍य में कम्‍प्‍यूटर के नए मॉडल यानी कि विकसित मॉडल आए ही थे। मनोज ने उस फोटो को कम्‍प्‍यूटर पर डालकर उसके साथ प्रयोग किया। अपना फोटो एडिट कर दिया और मेरे फोटो को एक रेगिस्‍तान की पृष्‍ठभूमि में सुंदर तरीके से डालकर उसे मेरे जन्‍मदिन पर भेंट किया। फोटो में दूर एक सूरजमुखी का फूल भी है। यह फोटो मुझे बहुत पसंद आया। इस पर मैंने एक ग़ज़ल भी लिखी। जिसका एक शेर है - जब भी मुस्‍कराया है कोई देखकर मुझको, मैंने अपनी शख्‍शियत का नया मायना देखा । यह फोटो पिछले दस साल से एकलव्‍य में मेरी टेबिल के सामने थर्मोकोल पर लगा ही रहा है। अब सिस्‍टम के डेस्‍कटाप पर है। धन्‍यवाद मनोज। उसके बाद मैं खुद ऐसे फोटो के लिए तरस गया। खैर जिन लोगों ने फोटो छोटा करने की सलाह दी उनका भी धन्‍यवाद, जिन्‍होंने चुपचाप झेल लिया उनका भी शुक्रिया।

मेरा यह कथित ‍फोटो एक दिन अचानक ही एकलव्‍य भोपाल के बगीचे में टहलते हुए एकलव्‍य भोपाल के मेरे साथी राकेश खत्री ने डिजीटल कैमरे से खींचा था। 2008 के जून या जुलाई महीने की बात रही होगी। असल में राकेश नए आए हुए किसी कैमरे की ट्रायल ले रहे थे, ऐसा मुझे याद है। संभव है कैमरा उन अर्चना रस्‍तोगी जी का था जो मुझे हमेशा ऐसे याद करती हैं, ‘राजेश जी को मैंने कभी मुस्‍कराते नहीं देखा।’ मुझे मुस्‍कराते देखने की उनकी चाहत इतनी बढ़ गई कि एक दिन उन्‍होंने आकर कहा, ‘ मैंने कल रात आपको सपने में मुस्‍कराते हुए देखा।’ उनकी यह बात सुनकर मैंने भी संतोष की सांस ली थी कि चलो कम-से-कम उन्‍हें यह यकीन तो हुआ कि मैं मुस्‍कराता भी हूं। तो यह फोटो अर्चना जी को समर्पित किया जा सकता है। चलो किया।

पर जनाब कहानी अभी पूरी नहीं हुई। राकेश भाई ने यह फोटो अपने सिस्‍टम पर डाल दिया। मैं भी भूल-भाल गया। तब यह फोटो बहुत अच्‍छा नहीं लगा था। माथे पर बिखरे बाल,शर्ट के बटन खुले हुए,चेहरे पर सफेद दाढ़ी के खूंटे। मैंने फोटो देखकर हमेशा की तरह अफसोस जताया था कि अपना तो चेहरा ही ऐसा है, उसमें बेचारा कैमरा या कैमरे वाला क्‍या करेगा।

समय बीतता गया। असल में तो वह बीतता ही है। मैंने अजीम प्रेमजी फाउंडेशन में आने का फैसला किया। मुझे 2 मार्च,2009 को बंगलौर में ज्‍वाइन करना था। 28 फरवरी को मैं भोपाल से निकलने वाला था। 25 फरवरी को मुझे फाउंडेशन से एक ईमेल मिला कि अपनी एक पासपोर्ट साइज फोटो तुरंत भेजूं। संयोग से एक दिन पहले ही मैंने स्‍टूडियो में पासपोर्ट फोटो खिंचवाई थी। यह जानते हुए भी कि फोटो से पहले मैं स्‍वयं ही बंगलौर पहुंचूंगा , मैंने कूरियर से फोटो की एक नहीं तीन प्रतियां रवाना कर दीं। 27 फरवरी को मुझे फाउंडेशन से फोन आया कि आपने अब तक फोटो नहीं भेजा। मैंने निवेदन किया कि रास्‍ते में है, बस पहुंचने वाला ही है। (ये फोटो मेरे बंगलौर पहुंचने के एक हफ्ते बाद पहुंचे।) फोन पर फाउंडेशन की ओर से जैनी थीं। उन्‍होंने कहा आपके पास किसी फोटो की साफ्ट कापी नहीं है। वह भेज दीजिए। मुझे लगा मामला गंभीर है, मेरे पहुंचने से पहले मेरे फोटो का पहुंचना जरूरी है। मैंने कहा देखता हूं।

तब मुझे याद आया कि राकेश के सिस्‍टम पर एक फोटो पड़ा है। बस उसे ढूंढा। कमलेश यादव और जीतेंद्र ठाकुर ने मिलकर उसको कुछ-कुछ किया और फिर मैंने जैनी को ईमेल में जड़कर भेज दिया। 2 मार्च को जब बंगलौर में सुबह-सुबह फाउंडेशन के दफ्तर पहुंचा तो ये फोटो वाले राजेश उत्‍साही वहां पहले से विराजमान थे और मेरा मुंह चिड़ा रहे थे। फाउंडेशन के स्‍वागत कक्ष में एक बड़े-से बोर्ड पर एक बड़ी-सी कार्डशीट पर 6 बाई 6 के आकार में एक कोने में ये चिपके हुए थे। कार्डशीट पर मेरा परिचय लिखा हुआ था। आने वाला हर बंदा और बंदी स्‍वागत में अपने भाव उस पर लिखकर व्‍यक्‍त कर रहा था। सच मानो तो मुझे भी वहां चिपके हुए राजेश उत्‍साही मुझसे ज्‍यादा अच्‍छे लगे। धन्‍यवाद राकेश भाई। लोगों ने क्‍या लिखा वह अलग कहानी है।

बंगलौर पहुंचकर मैंने पहली छुट्टी मिलते ही अपने ब्‍लाग को सक्रिय करने का काम किया। यह बनाया तो दो साल पहले था,पर ज्‍यादा कुछ किया नहीं था। तो सबसे पहले फोटो डालने की सूझी। तो यही इकलौता फोटो मेरे पास साफ्ट कापी के रूप में था। संयोग से यहां बंगलौर में मेरे पास जो सिस्‍टम है, उसमें फोटोशॉप नहीं है। मुझे भी फोटो को छोटा-बड़ा करने की ज्‍यादा तकनीक नहीं मालूम। जब पहली बार ब्‍लाग पर फोटो आया तो मुझे ही लगा कि यह तो कुछ ज्‍यादा-ही बड़ा हो गया है। सब प्रयास कर लिए,फिर सोचा अभी ऐसे ही जाने दो बाद में देखेंगे।

अब सोचता हूं देखना क्‍या है, आप लोग तो देख ही रहे हैं। तो देखते रहिए, हम तो ऐसे ही हैं भैय्या।
राजेश उत्‍साही