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Thursday, December 5, 2013

शुक्रिया कबीर



अमरूदों का मैं दीवाना हूं और वे मेरे गले के दुश्‍मन। पिछले हफ्ते चालीस रुपए के आधा किलो खरीदे थे। बस दो ही खा पाया और गले में खराश और कांटे चुभना शुरू हो गए। बंगलौर का मौसम भी बदल रहा है। हल्‍की ठंड के साथ हल्‍की सी बारिश कभी-कभी। सुबह-शाम विश्‍वविद्यालय जाने के रास्‍ते में धूल,धुआं और यूकिलिप्‍टस के परागकण यानी कि एलर्जी का पक्‍का इंतजाम। अब इस सबसे बचकर जाएं तो कहां जाएं। गले ने अपना स्‍वर बदला तो सामने वाले को यह समझते देर नहीं लगती कि गले के मालिक की तबीयत नासाज है।
परसों, हर रोज की तरह कबीर को फोन लगाया तो मेरा गला घरघरा रहा था। उसने तुरंत भांप लिया पूछा, ‘तबीयत ठीक है।‘ मैंने कहा, ‘हां ठीक है।‘
जब कल रात फोन लगाया तो गला थोड़ा अधिक घरघरा रहा था और बीच-बीच में मुझे गला साफ करना पड़ रहा था। फिर इस तरह हमारा संवाद हुआ-
-गला खराब है।
-हां।
-तो गरारे करो।
-कर रहा हूं।
फिर कुछ इधर-उधर की बात हुई। वह फिर बोला,
-बुखार भी है क्‍या।
मैं आमतौर पर ऐसे सवालों से झुंझुला जाता हूं।
मैंने लगभग उसे झिड़कते हुए कहा,
-अगर होगा भी तो तुम क्‍या करोगे।
-तो डॉक्‍टर को दिखाओ।
-हां, जरूरत होगी तो दिखा दूंगा। अपना ख्याल तो मुझे ही रखना होगा न, वरना यहां कौन है देखभाल करने वाला।
वह चुप हो गया और फोन भी।

मुझे लगा यह कुछ ज्‍यादा ही हो गया। मुझे इस तरह से प्रतिक्रिया नहीं देनी चाहिए थी। मैंने सोचा आखिर ऐसा क्‍यों हुआ। ध्‍यान आया कि कल ही मेरी मां और कबीर की दादी भोपाल आई हुईं हैं। किसी के बीमार होने की बात उनके कानों में पड़ती है तो वे परेशान हो जाती हैं। शायद अनजाने में मैं इसी वजह से इस पर ज्‍यादा बात करने से बच रहा था।
मुझ से रहा नहीं गया,पांच मिनट बाद मैंने कबीर को दुबारा फोन लगाया। उसकी आवाज से लग रहा था कि वह मेरे व्‍यवहार से खुश नहीं है। मैंने उससे बात कहा, कि दादी के सामने इस तरह की बात न किया करो वे जबरन फिकर करने लगतीं हैं। वह बोला,
-पापा जैसे आपको हम लोगों की चिंता होती वैसे ही हमें भी आपकी चिंता होती है।
-यहां मौसम बदल रहा है इसलिए थोड़ा गला खराब है। बुखार नहीं है। जरूरत होगी तो डॉक्‍टर को दिखा दूंगा।
-गर्मपानी में नमक डालकर गरारे कर लेना।
-हां कर लूंगा।
-पास में किराने की दुकान हो तो वहां से मुलेठी ले लेना।
-हां ले लूंगा। तुम चिंता मत करो मैं ठीक हूं।
उसके बाद मैं चैन की नींद सोया, कबीर भी सोया होगा। 
                                                  0 राजेश उत्‍साही

Saturday, October 12, 2013

अपने अपने रावण

नवरात्रि..रामलीला..दशहरा और फिर टेसू। यादों का क्रम कुछ इसी तरह बनता है। बचपन में जिला मुरैना के सबलगढ़ की संतर नम्‍बर दो की सड़कों पर बने मंच पर होने वाली रामलीला याद है। इस रामलीला का सबसे बड़ा आकर्षण हनुमान जी द्वारा संजीवनी बूटी लेकर आना होता था। सत्‍तर के दशक में इस दृश्‍य को मंचित करने के लिए रस्‍सी और उस पर गिर्री की मदद से लटके हनुमान की कल्‍पना ही हमें रोमांचित कर देती थी। और ऐसे होते देखना तो सचमुच अनोखा अनुभव होता था। रामलीला में आगे बैठने के लिए शाम से अपनी टाट की बोरी लेकर जाकर जगह घेरकर बैठना होता था। बाद में ज्‍यों-ज्‍यों उमर बढ़ती गई हमारे लिए रामलीला..रासलीला में बदलती गई। बैठकर देखने की बजाय भीड़ में किनारे पर खड़े होकर..जगह बदल बदलकर रामलीला देखने में ज्‍यादा आनंद आने लगा। फिर एक दिन ऐसा भी आया कि रामलीला का आकर्षण जाता रहा।

दशहरे पर रावण और उसके कुटम्बियों के पुतले जलते देखने का आकर्षण भी होता था। पर उससे ज्‍यादा इंतजार होता था, पुतले जलने के बाद बची हुई बांस की अनजली खप्‍पचियों को लूटने का। असल में हम इन खप्‍पचियों से ही टेसू बनाते थे। तीन खप्पचियों को बीच से कुछ इस तरह बांधते कि वे खोमचे वाले के स्‍टैंड की शक्‍ल में आ जातीं । एक तरफ के तीन सिरों में से बीच के सिरे पर मिट्टी का मुंह बनाया जाता और बाकी दो सिरों पर हाथ। जाहिर है कि दूसरी तरफ के तीन सिरे उसके पांव होते। बीच में जहां खप्‍प्‍चियों को बांधा जाता, वहां दिया रखने के लिए जगह बनाई जाती। जब मिट्टी सूख जाती तो उस पर रंग से आंख नाक आदि बनाए जाते। और फिर अगले एक सप्‍ताह तक लड़कों की टोली शाम होते ही टेसू को लेकर घर-घर जाती। दरवाजे पर धरना देकर गीत गाती...
मेरा टेसू , यही अड़ा
खाने को मांगे दही बड़ा
दही बड़े ने पू्छी बात
कितने लोग तुम्‍हारे साथ
एक सौ अस्‍सी नौ हजार

बस यह गीत...कुछ इसी तरह से आगे बढ़ता रहता।
घर से हमें पैसे, दिये में तेल या फिर अनाज भी मिलता। इस सबको एकत्रित किया जाता और सातवें दिन इस पैसे का उपयोग गोठ के लिए किया जाता। यह गोठ वास्‍तव में टेसू के विवाह समारोह की पार्टी होती। इधर लड़के टेसू को लेकर घूम रहे होते और उधर लड़कियां झांझी को लेकर। झांझी का विवाह ही टेसू के साथ किया जाता। फिर ये सब चीजें धीरे-धीरे पीछे छूटती गईं।

जब तक होशंगाबाद में थे, यानी 1985 के आसपास तक, वहां की टपरा टॉकीज के सामने, लेंडिया बाजार के मैदान में जलने वाले रावण को देखने जाने का अपना एक आकर्षण था। पूरे शहर का एकमात्र वही रावण होता था।

फिर जब भोपाल आ गए तो तब तक हर मोहल्‍ले का अपना रावण होने लगा था। जाहिर है कि समाज बदल रहा था और उसमें भी यह होड़ कि किस मोहल्‍ले का रावण सबसे ऊंचा होगा। जिसका जितना ऊंचा रावण, उसका उतना मान। एक-दो साल भोपाल के विट्टन मार्केट के रावण को जलते देखने का मौका मिला। वह भी कबीर को दिखाने के लिए जाने के कारण। फिर तो वहां इतनी भीड़ होने लगी कि पांव धरना भी मुश्किल। और फिर उसके विकल्‍प के रूप में घर में बैठकर टीवी पर जगह-जगह के और अलग-अलग शहरों के रावण को जलते देखना ही रह गया ।

कबीर को इस सबमें बहुत रुचि नहीं रही। लेकिन जब उत्‍सव लगभग नौ-दस साल का हुआ तो उसने कहा, हम भी अपना रावण बनाएंगे और जलाएंगे। फिर अगले दो-तीन सालों तक दोनों भाई मिलकर रावण बनाते रहे। उसके लिए लकड़ी का इंतजाम करना, उसका ढांचा बनाना, रंगीन कागज लाना, उस पर चिपकाना उसके हाथ-मुंह आदि की डिजायन बनाना सब वे ही करते, खासकर उत्‍सव। अपना काम होता अंत में बस एक फोटो लेना। दशहरे के दिन घर के सामने रावण भी वे ही जला रहे होते और दर्शक भी वे ही होते और ताली बजाने वाले भी। वे दिन भी बीत गए।

कमबख्‍त रावण है कि अब भी जिंदा है और पता नहीं कब तक जिंदा रहेगा।
                                                                                 0 राजेश उत्‍साही

Monday, July 18, 2011

काके लागूं पांय....


गुरु गोविन्‍द दोऊ खड़े, काके लागूं पांय
बलिहारी गुरु आपकी गोविन्‍द दियो बताय
                                                                                         फोटो:राजेश उत्‍साही
कबीर का यह दोहा बचपन से सुनता आ रहा हूं और इसकी व्‍याख्‍या भी। शिक्षक और भगवान के बीच कौन श्रेष्‍ठ है या कि दोनों में से किसके आगे पहले शीश झुकाया जाना चाहिए या कि किस के चरण स्‍पर्श किए जाने चाहिए आदि आदि।

चरण स्‍पर्श यानी पैर छूना वास्‍तव में किसी के प्रति आदर और श्रद्धा व्‍यक्‍त करने का तरीका है। पर विभिन्‍न कारणों से यह सत्‍ता या अपनी प्रभुता साबित करने का भी एक जरिया बनता रहा है। हमारे समाज में इसके ढेरों उदाहरण मिल जाएंगे। मुझे लगता है इसकी शुरुआत घर से ही होती है। इसके बारे में पर्याप्‍त चर्चा किए बिना बच्‍चों से यह अपेक्षा की जाती रही है कि वे अपने से बड़ों के पैर छूएंगे, चाहे इसके लिए उनका मन गवारा करे या न करे। दूसरी तरफ कुछ ऐसे रिश्‍ते-नाते भी हैं जिनमें पैर छूना अपने आप ही तय मान लिया जाता है। और अगर आप उसका पालन न करें,तो कोपभाजन के लिए तैयार रहें। महिलाओं के साथ तो जैसे यह अनिवार्य शर्त सी हो जाती है। नई-नवेली बहू का ससुराल पक्ष अगर भरा-पूरा हो तो उसकी तो झुक झुककर कमर ही टूट जाती है।
*
बहरहाल पैर छूने की यह कवायद मेरे लिए बहुत सारी खट्टी-मीठी यादों का सबब बन गई है। पैर छूने की कोई कट्टरता घर में नहीं थी। हां जब किशोर हुए तो विभिन्‍न अवसरों पर यह अपेक्षा होने लगी कि हम परम्‍परा का निर्वाह करें। जैसे जन्‍मदिन और दीवाली आदि पर माता-पिता,दादी और बहनों के पैर छुएं। रक्षाबंधन पर बहनों के। यह आज भी जारी है। कुछ अन्‍य मौकों पर अन्‍य परिचितों के पैर भी छूने की अपेक्षा होती थी। पर मुझे कभी भी ऐसा नहीं लगा कि यह बहुत मन से किया हो। या कि इनमें से किसी भी अवसर पर हम सामने वाले से इतने अभिभूत थे कि बिना किसी आडम्‍बर के झुककर सायास ही पैर छू लिए हों। हर बार किसी परम्‍परा या लिहाज का झंडा आगे-पीछे चलता ही रहा।
*
कुछ ऐसे वाकये या मौके जरूर रहे हैं, जो बरबस याद आ जाते हैं। उत्‍तर भारत में आमतौर पर सास अपने दामाद के पैर छूती है। लेकिन मेरे जमीर को यह कभी गवारा नहीं हुआ। जब ऐसा मौका आया, तो मैंने इससे हरसंभव बचने का प्रयास किया। और कई मौकों पर तो उल्‍टे उनके ही पैर छू लिए। सभी महिलाओं से चाहे वे रिश्‍ते में जो भी लगती हों, मैं हमेशा पैर छुवाने से बचता रहा हूं। दक्षिण भारत  स्‍त्री-पुरुष के बजाय आयु देखी जाती है। यानी आयु में जो भी छोटा है वह अपने से बड़े के पैर छुएगा ही। यहां बंगलौर में जब मुझे एक बेटी मिली तो बड़ी विचित्र स्थिति पैदा हो गई। संस्‍कारों के चलते मुझे उसके पैर छूने थे और उसे मेरे। अंत में हम दोनों में समझौता इस बात पर हुआ कि कोई किसी के पैर नहीं छुएगा।
*
मुझे दो ऐसे वाकये याद आते हैं, जब सचमुच मेरा मन किया कि सामने वाले के पैर छू लिए जाएं। पहली घटना तीन साल पहले की है। मेरा पचासवां जन्‍मदिन था। भोपाल में घर के पास के बाजार में मैं कुछ सामान खरीदने गया था। वहां अचानक जाने-माने शिक्षाविद् अनिल सद्गोपाल मिल गए। उन्‍हें मैं अनिल भाई कहता हूं। 1982 के आसपास उनके साथ काम करने का मौका मिला था। उनकी कही एक बात मेरे लिए मार्गदर्शक बन गई थी।

होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम की पत्रिका के पहले अंक की सामग्री सीमेंट की खाली बोरी में भरकर उन्‍होंने मुझे सौंपते हुए कहा था,' कि इसे भोपाल से छपवाकर लाना है।' 
मैं अवाक था। कि मैंने ऐसा कोई काम पहले कभी नहीं किया था। हां पढ़ने-लिखने में मेरी रुचि अवश्‍य रही थी। मैंने कहा था, 'मुझ से यह नहीं होगा। मुझे यह काम नहीं आता है।' उन्‍होंने तुरंत ही वह बोरा मेरे हाथ से ले लिया और कहा था, 'अगर जिन्‍दगी में आगे बढ़ना है तो किसी भी काम के लिए यह मत कहना कि यह मुझे नहीं आता है। कहना कि मैं कोशिश करूंगा। अन्‍यथा कोई काम करने का मौका नहीं देगा।' फिर तो यह बात मैंने गांठ बांध ली। इस एक सूत्र के सहारे न जाने कितने कौशल मैंने सीखे। काम किए,जिम्‍मेदारियां उठाईं।
तो पचासवें जन्‍मदिन पर आर्शीवाद प्राप्‍त करने के लिए अनिल भाई से बेहतर कौन हो सकता था। मैंने झुककर उनके पैर छू लिए। मेरे इस व्‍यवहार से वे भी हतप्रभ थे। पर जब मैंने अवसर और अपना मंतव्‍य उन्‍हें बताया तो उनकी आंखों में वह चमक उभर आई जो मैं अक्‍सर देखता था।
*
दूसरी घटना पिछले बरस की है। मैं जयपुर की यात्रा पर था। रमेश थानवी जी के बारे में पढ़ता और सुनता रहा था। वे राजस्‍थान प्रौढ़ शिक्षण समिति में पिछले कई बरसों से सक्रिय हैं। समिति की  पत्रिका अनौपचारिका का संपादन कर रहे हैं। वे बच्‍चों के लिए भी लिखते रहे हैं। उनकी एक मशहूर कहानी 'घडि़यों की हड़ताल' मैंने चकमक में प्रकाशित की थी। लगभग साल भर तक अनौपचारिका के लिए मैं एक कालम भी लिखता रहा हूं। जयपुर गया तो मैंने उनसे मिलने की इच्‍छा व्‍यक्‍त की। उन्‍होंने मेरे ठहरने की जगह का पता पूछा और खुद ही कार चलाते हुए मिलने चले आए। अपने सामने उनको पाकर अनायास ही मैं उनके पैरों में झुक गया। सच कहूं तो उनका व्‍यक्तित्‍व ही ऐसा है।
*
दो और ऐसे व्‍यक्ति हैं,जिनके मैंने कई अलग अलग मौकों पर बहुत आदर के साथ और मन से चरण स्‍पर्श किए हैं। इनका मेरे जीवन में स्‍थान लगभग गुरु जैसा है। एक हैं श्‍याम बोहरे। श्‍याम भाई ने मुझे ऐसे समय राह दिखाई, जब मेरे जीवन में लगभग अंधेरा छा गया था। मैं आत्‍मविश्‍वास खो चुका था। सच कहूं तो उनकी दिखाई राह पर चलकर ही यहां तक पहुंचा हूं। दूसरे हैं डॉ.सुरेश मिश्र। इन्‍होंने मुझे कॉलेज में कभी नहीं पढ़ाया, लेकिन मैं उन्‍हें 'सर' ही कहता हूं। अनजाने में ही मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा। वे उन व्‍यक्तियों में से हैं जो लगातार मेरा परिचय मुझ से कराते रहे हैं।
*
दो घटनाएं ऐसी भी हैं, जब दो मित्रों को मैंने अपने पैर छूते हुए पाया। 1990 के आसपास इंदौर का एक युवा जो जनसंचार की पढ़ाई कर रहा था, छह महीने की इंटर्नशिप के लिए चकमक में आया था। उसे मेरे साथ ही काम करना था। मेरा काम करने का तरीका कुछ ऐसा था (और शायद अब भी है), मेरी प्रतिक्रिया से लगभग हर तीसरे-चौथे दिन वह रोने को हो आता। उसकी आंखें भर आतीं। मैं अपनी प्रतिक्रिया को हरसंभव बहुत सहज तरीके से व्‍यक्‍त करने की कोशिश करता। पर गलत को गलत कहने से बचना मेरे लिए संभव नहीं था। बहरहाल धीरे-धीरे दिन बीतते रहे। आखिरकार उसके जाने का समय आ गया। चलते समय औपचारिक अभिवादन के बाद जब सचमुच वह विदा होने लगा तो उसने झुककर मेरे पैर छू लिए। इस बार आंखें भर आने की मेरी बारी थी। उसने कहा, 'जितना मैंने आपसे इन छह महीनों में सीखा है, वह शायद छह साल में भी नहीं सीख पाऊंगा।' आज वह इंदौर में जनसंचार पढ़ाता है। हो सकता है वह मुझे भूल गया हो, पर संदीप पारे मैं तुम्‍हें कभी नहीं भूल पाऊंगा।
*
एकलव्‍य के भोपाल केन्‍द्र का प्रभारी होने के साथ-साथ मैं एकलव्‍य की अकादमिक परिषद का सचिव भी था। इस नाते मेरी दोहरी जिम्‍मेदारी थी। एकलव्‍य में 1997 के आसपास एक नए साथी ने प्रवेश किया। साल भर के बाद जब अकादमिक परिषद में उनके काम और मानदेय आदि की समीक्षा के बाद पुनर्निधारण हुआ तो वे उससे संतुष्‍ट नजर नहीं आए। एक शाम को लगभग दो घंटे इस संबंध में मेरी और उनकी गहन चर्चा हुई। मैंने संस्‍था के कार्यकर्त्‍ता के रूप में, केन्‍द्र प्रभारी के रूप में, परिषद के सचिव के रूप में और उससे कहीं आगे बढ़कर एक दोस्‍त के नाते अपनी बात उनके सामने रखी। पता नहीं मेरे किस रूप ने यह किया कि चर्चा के बाद वे मुझे एक हद तक संतुष्‍ट से लगे। अंतत: जब वे चलने लगे तो उन्‍होंने झुककर मेरे पैर छू लिए। अनायास ही किया गया उनका वह अभिवादन आज भी मेरी थाती है। मैं अब एकलव्‍य में नहीं हूं, लेकिन राकेश खत्री हैं।
*
सत्‍ताइस साल का लम्‍बा अरसा एकलव्‍य में गुजारने के बाद अब मैं यहां बंगलौर में हूं। लेकिन जब भी भोपाल जाना होता है, एकलव्‍य  जाता ही हूं। वहां के दो साथी शिवनारायण गौर और अम्‍बरीष सोनी जब मिलते हैं तो मेरे पैर छुए बिना नहीं मानते। पता नहीं उन्‍होंने मुझमें ऐसा क्‍या पाया है या मुझसे क्‍या पाया है कि वे अचानक ही मुझे जमीन से कुछ ऊपर उठा देते हैं। 
                                                               0 राजेश उत्‍साही  

Wednesday, July 13, 2011

पच्‍चीस का कबीर


नीमा,कबीर और उत्‍सव

समय कितनी जल्‍दी बीत जाता है। जैसे अभी कल ही तो मैंने कबीर पर लिखी एक पोस्‍ट हमारा कबीर लगाई थी। उसका चौबीसवां जन्‍मदिन था। आप में से कई साथियों ने अपना आर्शीवाद और शुभकामनाएं उसे दी थीं। देखते ही देखते एक साल बीत गया। आज वह अपना पच्‍चीसवां जन्‍मदिन मना रहा है।

एक बार फिर ऐसा मौका है कि मैं यहां बंगलौर में हूं और वह अपनी मां(नीमा) और छोटे भाई उत्‍सव के साथ भोपाल में। भला हो इस इंटरनेट तकनॉलॉजी का। आज इसके माध्‍यम से मैंने उसे शुभकामनाओं के साथ लड्डू भेजे और उसने प्राप्‍त भी कर लिए। बस शायद कुछ बाकी है तो वह आपकी शुभकामनाएं। जन्‍मदिन मुबारक हो कबीर। 
                                          0 राजेश उत्‍साही 

Monday, July 12, 2010

हमारा कबीर


मैं
और
नीमा
जब लड़ते हैं
आपस में बात करते हैं
जोर जोर से

ढाई साल का कब्‍बू
दोनों के बीच
आकर खड़ा होता है
और कहता है जोर से
तुम दोनों गंदे हो....।

हम
सुनकर
झेंपते हैं और
अपने को अच्‍छा साबित
करने की कोशिश करने लगते हैं।

 कब्‍बू
जैसा कि आप समझ ही गए होंगे, यह कविता हमारे बेटे कब्‍बू के बारे में है। आज इस कविता के नायक यानी कब्‍बू के लिए एक महत्‍वपूर्ण तारीख है। 13 जुलाई को वह पच्‍चीसवें साल में प्रवेश कर रहा है। यह हमारा बड़ा बेटा है जिसे हम प्‍यार से गोलू भी कहते हैं। वास्‍तव में नाम उसका कबीर है। देखते ही देखते इतना समय बीत गया कि ढाई साल का कब्‍बू अब ढाई दशक का युवक होने जा रहा है।

हमने अपने पहले बच्‍चे का नाम तो नेहा या उत्‍सव सोचा था। लेकिन यह संभव नहीं हुआ। मेरा परिवार होशंगाबाद में था। शायद वह गर्भ का सातवां महीना था जब होशंगाबाद की एक महिला चिकित्‍सक की दवा से नीमा को पूरे शरीर पर एलर्जी हो गई थी। इस घटना से हम सब बुरी तरह घबरा गए थे। इस कारण प्रसव के लिए नीमा इंदौर के काछी मोहल्‍ले में लाल कुएं के पास अपनी बड़ी बहन के घर में थीं।

कब्‍बू और नीमा का पहला फोटो
मुझे याद है कि 12 जुलाई की शाम को नीमा को पास के एक प्राइवेट नर्सिग होम में भर्ती करवाया गया। मैं भी वहां पहुंच गया था। नीमा की बड़ी बहन और बहनोई तो वहां थे ही। नीमा की मां भी सेंधवा से आ गईं थीं। रात भर नीमा दर्द से परेशान रही। डाक्‍टर चाहते थे कि ऑपरेशन करने की नौबत न आए। प्रसव टेबिल पर लेटे-लेटे और टेबिल पकड़कर लगातार जोर लगाने से नीमा की बांहों में सूजन आ गई थी। सुबह चार बजे के लगभग अंतत: बच्‍चे का जन्‍म हुआ। गर्भनाल उसके गले में लिपटी हुई थी। वह रोया नहीं। डॉक्‍टर ने उसे तुरंत ऑक्‍सीजन पर रख दिया। ए‍क बिलांत से कुछ बड़ा बच्‍चा अपनी नानी की गोद में पड़ा था। उसकी हालत देखकर मैं आशंका से भर उठा। नीमा बेसुध थी। मैं मायूस हो गया। नीमा के बहनोई साहब ने मेरी हालत देखी तो मुझे समझाते हुए घर ले गए। कहा सब ठीक हो जाएगा। 

लगभग तीन घंटे बाद मैं दुबारा नर्सिंग होम पहुंचा। नीमा को होश आ चुका था। बच्‍चा अभी भी ऑक्‍सीजन पर ही था। डॉक्‍टर से बात हुई। उन्‍होंने आश्‍वस्‍त किया कि घबराने की कोई बात नहीं। ऐसा होता रहता है। नीमा ने कहा, 'उत्‍सव आ गया है।' मैंने कहा, 'बच्‍चे की ऐसी हालत है, इसे उत्‍सव कैसे कहें। उत्‍सव हमें महसूस ही नहीं हो रहा।' नीमा ने प्रश्‍नवाचक निगाहों से मुझे देखा जैसे पूछ रहीं हों तो फिर। अचानक मैंने नीमा से कहा, 'इसे हम कबीर कहें तो कैसा रहे। यह कबीर की ही तरह अभी अपनी जिंदगी बचाने के लिए लड़ रहा है।' नीमा धीरे से मुस्‍करा दीं। बस हमने तय कर लिया। शायद कबीर नाम ने भी हमें एक हौंसला दिया और अनजाने ही उस बच्‍चे को एक तरह की जीवटता भी।


कबीर,आरती बुआ,मां और छोटे भाई उत्‍सव के साथ
बचपन उसका और बच्‍चों की तरह ही बीता। वह पढ़ने-लिखने में एक औसत छात्र ही रहा। न बहुत तेज न बहुत कमजोर। पर उसकी पढ़ाई को लेकर मेरे अंदर आज भी एक अपराध बोध है। शुरू-शुरू में उसे एक अंग्रेजी माध्‍यम स्‍कूल में भर्ती करवाया था। कक्षा दो में उसे एक ऐसी अध्यापिका मिली,जो लगातार बोल-बोलकर प्रताडि़त करती रहती थी। हमारे घर में अंग्रेजी का माहौल नहीं था और न ही हम पति-पत्‍नी बहुत अच्‍छी अंग्रेजी जानते हैं। नतीजा यह कि कबीर अंग्रेजी भाषा में स्‍कूल की कसौटियों पर खरा नहीं उतर रहा था। बदले में उसे कुछ इस तरह की बातें सुननी पड़ती थीं कि क्‍यों अपने मां-बाप का पैसा बरबाद कर रहे हो। यह सब बातें वह घर आकर सुनाता तो हमारा भी मन कड़वा जाता।

हमें लगा कि ऐसा न हो कि बच्‍चा कुंठित हो जाए और अपनी भाषा भी भूल जाए। तीसरी कक्षा में उसे एक हिन्‍दी माध्‍यम स्‍कूल में भर्ती किया। यह स्‍कूल अपनी अन्‍य कसौटियों पर खरा नहीं उतरा। पांचवी तक वहां पढ़ाई के बाद छठवीं में फिर एक अन्‍य स्‍कूल में भर्ती किया। वहां उसने जैसे-तैसे दसवीं पास की। वहां से निकलकर फिर एक और स्‍कूल में भर्ती हुआ। शुक्र है कि इस स्‍कूल में उसने 72 प्रतिशत अंकों के साथ बोर्ड बारहवीं की परीक्षा पास की। उसके बाद भोपाल के सबसे अच्‍छे कॉलेज से बीकॉम किया। और अभी एमबीए कर रहा है। पर मैं सोचता हूं कि अगर इतने स्‍कूल नहीं बदले होते तो शायद उसकी स्थिति और बेहतर होती।

फुटबॉल खेलने का उसे शौक है। भोपाल के एक क्‍लब की तरफ से बरेली में आयोजित एक टूर्नामेंट में भाग लेने गया था। भोपाल के स्‍थानीय टूर्नामेंटों में भाग लेता ही रहता है। घर की दाल-रोटी उसे बहुत पसंद है। बचपन में तो केवल बिस्‍कुट ही खाया करता था। जो कपड़े हमने बनवा दिए वह पहन लिए। साल भर हुआ तब हम उसे एक मोटर साइकिल खरीद कर दे पाए। वरना वह साइकिल या अपने दोस्‍तों के साथ ही उनकी गाडि़यों पर बैठकर स्‍कूल-कालेज जाता रहा। फिजूलखर्ची या अनुचित मांग करते मैंने उसे कभी नहीं देखा। जब वह बरेली गया था तो मैंने जेबखर्च के लिए चार सौ रूपए दिए। वहां से लौटा तो उसने मेरे हा‍थ में बचे हुए तीन सौ रूपए रख दिए। मैं देखकर अचंभित था।

मैंने अपने केरियर की शुरुआत में केवल सफेद कालर वाले कामों को ही अहमियत नहीं दी थी। जो काम हाथ में आया उसे करता चला गया। कबीर को मैंने यही दृष्टि देने की कोशिश की। उसने इस बात को समझा और अपनी पढ़ाई के साथ-साथ जो भी छोटे-मोटे काम मिले उन्‍हें करता गया। अभी भी करता है। मैं समझता हूं हम उसे उस जगह पर लाने में कामयाब हुए हैं, जहां से वह अपनी जिंदगी आत्‍मनिर्भर होकर जी सकता है।

मुझे कबीर पर लिखी एक और कविता याद आ रही है-

कब्‍बू
अब हो गया है
ढाई साल का
ढाई साल का
कब्‍बू समझता है
दफ्तर का काम
काम के पैसे
और पैसों का अर्थशास्‍त्र

समझता है वह पगार
और यह कि उसी से
आते हैं बिस्‍कुट,दूध,दाल,रोटी और गाजर
हवाई जहाज, जीप
आइसक्रीम और टमाटर
पापा जाते हैं दफ्तर
काम करने
पैसा लाने

ढाई साल का
कब्‍बू सब समझता है।

सचमुच कबीर यह सब समझता रहा है और अब भी समझ रहा। तभी तो जब मैं पिछले डेढ़ साल से मैं यहां बंगलौर में हूं, वह भोपाल में घर की सारी जिम्‍मेदारियां उठा रहा है। 
तो कबीर बेटे जन्‍मदिन की चौबीसवीं वर्षगांठ और पच्‍चीसवें साल में प्रवेश बहुत-बहुत मुबारक।   
                                                        * राजेश उत्‍साही