पिछली 23 जून को हमारे (नीमा और राजेश) विवाह की पच्चीसवीं वर्षगांठ थी और आज है छब्बीसवीं। तेईस वर्षगांठ हमने होशंगाबाद या भोपाल में ही मनाई थीं। चौबीसवीं वर्षगांठ पर कुछ ऐसा संयोग हुआ था कि हम साथ नहीं थे। और जो हुआ था उस पर मैंने एक पोस्ट ही लिख डाली थी। चाहें तो आप आज भी पढ़ सकते हैं - सालगिरह याद रखने के सत्रह सौ साठ बहाने । लेकिन पच्चीसवीं पर संयोग कुछ ऐसा हुआ कि हम साथ-साथ थे । नीमा मेरे कहने पर अकेले ही भोपाल से 1600 किलोमीटर का लंबा रेल सफर करके बंगलौर आ गई थीं। 23 को हम मैसूर में मित्र सरस्वती के घर थे। उनकी बेटी (जो हमारी भी है) राधा ने एक अनोखा आयोजन हमारे लिए किया। उसने एक-एक गुलाब हमको दिया और आग्रह किया कि हम उसे एक-दूसरे को दें। और कहा कि कसम लें कि अगले पच्चीसों साल तक इसी तरह लड़ते-झगड़ते रहेंगे, पर रहेंगे एक साथ ही। हमने राधा की गवाही में ऐसी ही कुछ कसम ली भी ।
इस साल मैं भोपाल में हूं। सब कुछ वैसा ही है। बस कमी है तो बाबूजी की। वे अब नहीं हैं। बीते बरसों में कई बार हम इस दिन आमने-सामने होते थे। पांव छूते और आर्शीवाद मिलता। और जब नहीं होते तो हम फोन पर पांव छूते और वे फोन की मार्फत ही अपना आर्शीवाद दे देते। आज सुबह होशंगाबाद से मां ने फोन पर वही कहा जो वे हर बरस कहती रहीं हैं-खुश रहो। आवाज नहीं सुनाई दी तो वह केवल बाबूजी की। बहरहाल उनका आर्शीवाद तो साथ है ही। आज ही छोटे भाई अनिल और रानी की शादी की वर्षगांठ भी है।
0 राजेश उत्साही