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Sunday, February 13, 2011

प्रेम


प्रेम
समय की टहनी
पर खिला गुलाब है
भर सको
तो भर लो
आंखों में उसके रंग
फेफड़ों में सुगंध
झड़ जाएंगी
पखुंडियां प्रेम की।

प्रेम
जल है
बहती नदी का
अंजुरी भर
धोओ अपनी आंखें
अपना चेहरा और आत्‍मा भी
प्रेम पवित्र करता है ।

प्रेम
दरअसल
व्‍यक्‍त करने की नहीं
महसूसने की चीज है ।

0 राजेश उत्‍साही