कुछ वर्षों पहले राजश्री प्रोडक्शन की एक फिल्म आई थी 'हम साथ-साथ हैं।' इसमें एक गीत है ‘ये तो सच है कि भगवान है, है मगर फिर भी अनजान हैं, धरती पर रूप मां-बाप का उस विधाता की पहचान है’ यह गीत जब भी कानों में उतरता है मेरी आंखों से खारा समुद्र बहने को हो आता है। आप कहेंगे मैं बहुत भावुक हूं। सच है,पर इतना भी नहीं कि हर वक्त नमकीन पानी पीता रहूं। सच तो यह है कि मैं जिन्दगी में बहुत कम बार रोया हूं। मेरा खारापन बहुत मुश्किल से निकलता है। पर पता नहीं इस गीत में क्या खूबी है कि यह मेरी आंखों में ज्वार ला देता है। शायद एक तो इसमें मां-बाप की तस्वीर इस तरह खींची गई है कि अतिश्योक्ति प्रतीत होते हुए भी वह हकीकत लगती है। दूसरे संगीतकार राम-लक्ष्मण की कंपोजिंग ऐसी है कि सीधे दिल में जाती है। हरिहरन और उनके साथियों ने भी इसे ऐसे भक्ति भाव से गाया है कि मन सम्मोहित हो जाता है। वे शब्द भी बहुत महत्वपूर्ण हैं जिन्हें रवीन्द्र रावल ने चुनकर जमाया है।