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Sunday, March 17, 2013

वह एक इतवार

                                                                              राजेश उत्‍साही
इतवार। मई का गर्म इतवार। इतवार यानी आराम का दिन। पर पिछले कुछ दिनों से रूप का इतवार काम या झंझटों का दिन ही बना जा रहा था। जैसे गए शनिवार पास के शहर में एक बैठक थी। बस की भीड़-भाड़ से बचने के लिए रूप स्‍कूटर से चला गया था। धूप तेज थी। अगले दिन इतवार को वापस लौटते समय स्‍कूटर का पिस्‍टन बैठ गया। आधा दिन स्‍कूटर खींचते और आधा दिन स्‍कूटर ठीक कराते बीता। रूप सोच रहा था कि यह इतवार तो कम से कम आराम से बीते।

बच्‍चों के स्‍कूल में छुट्टियां लग गई थीं। बच्‍चे मां के साथ अपनी ननिहाल जा रहे थे। किसी बात पर पत्‍नी से तू-तू मैं-मैं हो गई थी। सुबह-सुबह मूड खराब।
स्‍टेशन जाने के लिए आटो की जरूरत थी। रूप पास के स्‍टैंड से आटो लेने गया। वहां एक ही आटो था। आटो वाले से संवाद कुछ इस तरह से हुआ,
-    स्‍टेशन चलना है कॉलेज के पीछे से।
-    हां जी चलो।
-    क्‍या लोगे।
-    पैंतीस होते हैं, तीस दे देना।
-    पच्‍चीस ले लेना। आ जाओ।
-    अरे साब, आप लोगों की कुछ आदत ही हो गई, कम करने की।... आटो वाला झल्‍लाया।
-    चलना है कि नहीं। पच्‍चीस ही दूंगा।.... रूप भी ताव खा गया।
-    नहीं चलना है।.... आटो वाला लगभग चिल्‍लाया।

आटो वाले ने जिस अंदाज में उत्‍तर दिया, रूप को लगा कि वह मजबूरी का फायदा उठाना चाहता है। रूप की इच्‍छा हुई दो-चार खरी-खरी सुना दे। पर घर में पत्‍नी और बच्‍चे इंतजार कर रहे थे। ट्रेन का समय हो रहा था। रूप बड़बडाता हुआ लौट आया। पत्‍नी और बच्‍चों को स्‍कूटर से ही दो चक्‍कर लगाकर स्‍टेशन छोड़ा।

ऐसा कितनी बार होता है कि मन करता है कि सामने वाले को उसी टोन में जवाब दिया जाए, जिसमें वह बात कर रहा है। पर बात बढ़ने की कल्‍पना करके रूप मन ही मन जल-भुनकर रह जाता है।

पत्‍नी टिकट ले चुकी थी। बच्‍चे और पत्‍नी सामान लेकर प्‍लेटफार्म पर जा चुके थे। रूप स्‍कूटर पार्क करने चला गया। लौटा त‍ब तक पत्‍नी तथा बच्‍चे ओव्‍हरब्रिज लगभग पार कर चुके थे।

रूप के आगे एक नवयुवती ओव्‍हरब्रिज की ढलान पर चढ़ रही थी। नवयुवती ने बड़े-बड़े फूलों के प्रिंट वाली हल्‍के आसमानी रंग की साड़ी पहनी थी। एक बड़ा फूल उसके नितंबों पर कदमताल के साथ दाएं-बाएं आ-जा रहा था। कलाईयां चूडि़यों से भरी हुई थीं। हाथों में फूलों का एक गुलदस्‍ता था। ओव्‍हरब्रिज पर ऊपर पहुंचकर जब वह मुड़ी तो रूप ने अंदाजा लगाया, वह नवविवाहिता थी। पर यह क्‍या कहीं कुछ खटक रहा था। चप्‍पल की खट-खट कुछ अजीब-सी ध्‍वनि पैदा कर रही थी। हां उसने ऊंची एड़ी की चप्‍पल पहन रखी थी। ऊंची एड़ी में एडी़ के नाम पर पतली कीलनुमा रचना थी। इसकी वजह से उसे चलने में भी असुविधा हो रही थी। बार-बार उसकी साड़ी भी उसमें फंस-फंस जा रही थी।

रूप का मन हुआ, नवयुवती को रोककर कहे, आप बहुत सुंदर लग रही हैं। पर अच्‍छा होता कि आपने यह ऊंची एड़ी की चप्‍पल नहीं पहनी होती।  

पर नवयुवती क्‍या सोचेगी। कहीं कुछ उल्‍टा-सुल्‍टा बोलने लगी तो बेकार में मिट्टी पलीद हो जाएगी। फिर अगले ही पल रूप ने तय किया आज तो वह बोलकर ही रहेगा। चाहे जो हो जाए।
रूप तेज कदमों से नवयुवती से थोड़ा आगे निकला। एक क्षण को ठिठका। बोला, आप सुंदर लग रही हैं। पर ये ऊंची एड़ी की चप्‍पलें। कुल मेल नहीं खा रहीं हैं।  

नवयुवती ने अचकचाकर उसे देखा। नवयुवती वहीं ठिठककर रह गई थी। रूप उसकी प्रतिक्रिया का इंतजार किए बगैर तेज कदमों से ओव्‍हरब्रिज की ढलान पर उतर गया। ट्रेन आने में अभी समय था। रूप बुकस्‍टाल पर पत्रिकाएं पलटने लगा।
धन्‍यवाद।  अचानक रूप के कानों में एक सुरीली आवाज गूंजी।
रूप ने चौंककर देखा । नवयुवती उसके सामने खड़ी थी।
धन्‍यवाद। आपके इस फीडबैक के लिए। मुझे भी लगता है ये चप्‍पलें इस परिधान के साथ मेल नहीं खा रही हैं।
रूप नवयुवती को सामने देखकर झेंप-सा गया था। जब तक वह कुछ कहता, वह आगे बढ़ गई थी। भोपाल एक्‍सप्रेस प्‍लेटफार्म पर आ चुकी थी।

उसके परिवार को जिस ट्रेन से जाना था, वह भी आ चुकी थी। परिवार को विदाकर वह वापस लौट रहा था। नवयुवती एक नवयुवक की बांह में अपनी बांह डाले लौट रही थी। गुलदस्‍ता युवक के हाथों में था।
नवयुवती की प्रतिक्रिया ने रूप में जैसे एक नई ऊर्जा का संचार कर दिया था। उसे महसूस हुआ जैसे वह कह रही हो सही बात कहने का साहस होना चाहिए। बाकी सारी परिस्थितियां उसके अनुकूल हो जाती हैं।

रूप ने देखा नाले पर बने स्‍टैंड पर वह आटो अब भी खड़ा था। रूप ने स्‍कूटर उसके करीब रोका और आटो वाले से कहा,  सुनो। दुनिया तुम्‍हारे कंधे पर ही नहीं टिकी है।  

आटो वाले को कुछ भी समझ नहीं आया। जब तक वह समझने की कोशिश करता, तब रूप वहां से जा चुका था।                                              
                                      0 राजेश उत्‍साही

Saturday, November 3, 2012

प्‍लेटफार्म पर आर्ट गैलरी


आमतौर पर जब हम रेल्‍वे स्‍टेशन पर किसी गाड़ी की प्रतीक्षा करे रहे होते हैं तो समय काटना मुश्किल लगने लगता है। खासकर तब जब गाड़ी देर से आने वाली हो। ऐसे में आपके पास सिवाय मक्खियां उड़ाने के और कोई काम नहीं होता। अगर कोई आपको सीऑफ करने आया है या आप किसी को सीऑफ करने आए हैं तब भी कई बार बातों का कोटा खत्‍म हो जाता है और केवल अगल-बगल झांकते ही नजर आते हैं। वैसे आजकल रेल्‍वे स्‍टेशनों पर टीवी स्‍क्रीन भी समय काटने का एक साधन होते हैं। पर वे हमारी मूक फिल्‍मों के जमाने को याद दिलाते हैं। क्‍योंकि आमतौर पर उन पर केवल चित्र ही दिखाई देते हैं, आवाज अगर होती भी है तो वह दो-तीन रेडियो स्‍टेशनों के एक-साथ चलने पर आने वाली आवाज की तरह। बहरहाल....।

Saturday, October 13, 2012

श्रीप्रसाद : हिन्‍दी बालकविता की आत्‍मा


इसे संयोग कहूं या दुर्योग कि लगभग 18 साल पहले मैं जयपुर में श्रीप्रसाद जी के साथ था। और 12 अक्‍टूबर की शाम टोंक से जयपुर पहुंचा तो संदीप नाईक ने फोन पर यह सूचना दी कि श्रीप्रसाद जी नहीं रहे। उनके पास भी यह सूचना एकलव्‍य के गोपाल राठी के मेल से पहुंची। पिछले एक हफ्ते से इंटरनेट से दूरी सी बनी हुई थी,इसलिए बहुत नियमित रूप से मेल देख नहीं पा रहा था। गोपाल का मेल मुझे भी आया था, खोलकर देखा तो उनके मेल पर एक और लिंक थी, रमेश तैलंग जी के ब्‍लाग नानी की चिट्ठियां की। वहां इस बारे में जो जानकारी थी उसके अनुसार उन्‍हें प्रकाश मनु जी ने फोन करके इस दुखद खबर के बारे में बताया था। श्रीप्रसाद जी दिल्‍ली आए थे, अपने हृदय रोग की चिकित्‍सा के सिलसिले में। संभवत: उन्‍हें वहां दिल का दौरा पड़ा और वे सबसे विदा ले गए। (फोटो रमेश तैलंग जी के ब्‍लाग से साभार।) 

Saturday, August 11, 2012

एक या अधिक !

                                                                                     राजेश उत्‍साही 

एक आवासीय स्‍कूल में बच्‍चों के लिए फल रख हुए थे। वहां एक तख्‍ती लगी थी कि,‘केवल एक ही फल लें। क्‍योंकि भगवान इस बात की निगरानी कर रहे हैं कि कौन एक से अधिक से लेता है।’

एक दूसरी जगह बच्‍चों के लिए चॉकलेट रखीं थीं। वहां भी यही चेतावनी लिखी थी। लेकिन वहां किसी बच्‍चे ने अपनी तोतली हस्‍तलिपि में लिखकर लगा दिया था,'एक से अधिक चॉकलेट ली जा सकती हैं,क्‍योंकि भगवान फिलहाल फल की निगरानी में व्‍यस्‍त हैं।’
*
एक दोस्‍त ने यह एसएमएस भेजा था। पढ़ने में वह एक चुटकुले की तरह और मासूमियत भरा लगता है।पर उसमें कितनी तर्कसंगत बात छुपी है,जिसे हम धीरे-धीरे भूलते जाते हैं। और बस मान लेते हैं कि जो कहा जा रहा है वह सही है।
                                       0 राजेश उत्‍साही

Sunday, August 5, 2012

सायना : कहना था ‘न'

                                                                         राजेश उत्‍साही 

सायना तुमने जिंदगी में पता नहीं कितनी बार अनचाही चीजों के लिए न कहा होगा। एक दृढ़निश्‍चय के साथ न कहा होगा। तभी तुम इस मुकाम पर पहुंच सकी हो।
*
तुम्‍हें इस बार भी न कहना चाहिए था।
तुमने शायद कहा भी।
पर तुम्‍हें स्‍पष्‍ट रूप से न कहना चाहिए था।
*
तुम्‍हें यह पदक स्‍वीकार नहीं करना चाहिए था।
तुम वह नहीं जीती हो जिसके जीतने पर यह पदक मिलता है।
यह पदक केवल भारत के लिए एक संख्‍या है।
जहां तक इतिहास की बात है तो तुम वह तो पहले ही रच चुकी थीं,जब सेमीफायनल में पहुंची थीं। ओलम्पिक खेलों में भारत की तरफ से बैडमिंटन प्रतियोगिता के सेमीफायनल में पहुंचने वाली तुम पहली खिलाड़ी बन ही गईं थीं।
*
एक खिलाड़ी,भारतीय खिलाड़ी,के तौर पर तुम सचमुच सर्वश्रेष्‍ठ हो। पदक न लेंती, तब भी रहतीं।
एक व्‍यक्ति के तौर पर तुम्‍हारा कद कहीं और ऊंचा होता,काश तुमने न कहा होता।
न कहना तुम्‍हें और गौरव देता सायना।                0 राजेश उत्‍साही   

Saturday, May 12, 2012

एक कार्टून कितना कुछ कहता है..


                                                         कार्टूनिस्‍ट : शंकर। चिल्‍ड्रन बुक ट्रस्‍ट के सौजन्‍य से
एनसीईआरटी द्वारा प्रकाशित कक्षा 11 वीं की ‘ भारत का संविधान- सिद्धांत और व्‍यवहार’ के पहले अध्‍याय-संविधान:क्‍यों और कैसे?- में यह कार्टून प्रकाशित किया गया है। कार्टून के नीचे लिखा है- संविधान बनाने की रफ्तार को घोंघे की रफ्तार बताने वाला कार्टून। संविधान के निमार्ण में तीन वर्ष लगे। क्‍या कार्टूनिस्‍ट इसी बात पर टिप्‍पणी कर रहा है? संविधान सभा को अपना कार्य करने में इतना समय क्‍यों लगा?

Tuesday, May 8, 2012

सवाल उठाता एक खुला खत


                                                                            फोटो : राजेश उत्‍साही
द हिंदुस्‍तान टाइम्‍स की एक घोषणा ने हमारा ध्‍यान खींचा,जिसमें यह मंशा जताई गई थी कि अखबार की हरेक प्रति‍ से होने वाली आय में से पांच पैसा भारत के गरीब बच्‍चों की शिक्षा पर खर्च किया जाएगा। हालांकि यह साफ नहीं है कि यह राशि किस तरह खर्च की जानी है। यह बात इसलिए महत्‍वपूर्ण है क्‍योंकि बच्‍चों की शिक्षा गाहे-बगाहे किया जाने वाला काम नहीं है। स्‍कूलीकरण एक ऐसा समग्र अनुभव है जो पाठ्यचर्या की बुनावट के जरिए बहुत सारे व चुनिंदा घटकों से मिलकर बना होता है,जिसमें ऐसे शैक्षिक लक्ष्‍यों को हासिल करने की कोशिश की जाती है ,जिसे कोई भी समाज अलग-अलग वक्‍तों पर अपने लिए खुद तय करता है।

Tuesday, April 10, 2012

मेरे पहले साहित्यिक गुरु : ब्रजेश परसाई


पिछले दिनों घर में आई बाढ़ से निपटते हुए, पुराने कागजों में यह तस्वीर हाथ आ गई। तस्‍वीर देखते ही मुझे ब्रजेश परसाई बहुत याद आए। वे एक तरह से मेरे पहले साहित्यिक गुरु थे मैं यह कह सकता हूं। साहित्य की बारीकियों को देखने का तरीका मैंने उनसे सीखा। मेरा पहला कविता संग्रह 'वह, जो शेष है' प्रकाशित हो गया है। लेकिन देखिए मैं उसमें ब्रजेश भाई का उल्‍लेख करने से चूक गया। वे कविताएं नहीं लिखते थे, पर होशंगाबाद में वे पहले व्‍यक्ति थे जिनसे में नई कविता पर बात कर सकता था। तीन लोग और ऐसे हैं जिनके बारे में जिक्र नहीं करुं तो अच्‍छा नहीं लगेगा। एक संतोष रावत जिनकी आटा चक्‍की पर बैठकर हमने न जाने कितनी साहित्‍यिक चर्चाएं की होंगी। चक्‍की वे खुद चलाते थे। आजकल बैंक में मैनेजर हैं। दूसरा नाम है महेश मूलचंदानी का। यूं तो वे जूते की दुकान चलाते हैं, पर उनकी क्षणिकाएं भी जूतों से कम नहीं होती थीं। तीसरे सुखदेव मखीजा। सुखदेव बाद में भोपाल आ गए थे, और राजनीति में उतरकर छुटभैये नेता भी बने। 1979 से लेकर 84 के अंत तक का समय कुछ ऐसा था, जिसका अधिकांश हिस्‍सा हमने साहित्‍य पढ़ने-लिखने और चर्चा करने में गुजारा। हम चार लोग मिलकर एक लायब्रेरी भी चलाते थे, जिसमें आपस में चंदा करके पत्रिकाएं बुलवाते थे और पढ़ते थे। इन सबके साथ कैसा समय गुजरा यह फिर कभी लिखूंगा। 

अभी मैं बात कर रहा था ब्रजेश परसाई की। मध्‍यप्रदेश साहित्‍य परिषद ने पाठकमंच की योजना शुरू की थी। इसके तहत प्रदेश के लगभग हर जिला मुख्यालय पर पाठक मंच का गठन किया गया था। जब भी कोई नई किताब प्रकाशित होती, परिषद उसकी दो प्रतियां हर पाठक मंच में भेजती। वहां उस पर पाठक मंच का कोई एक सदस्‍य समीक्षा लिखता और फिर उस पर चर्चा होती।  संभवत: पाठक मंच योजना अब भी जारी है। उन दिनों होशंगाबाद में पाठक मंच के संयोजक ब्रजेश परसाई थे। वर्षों तक उन्‍होंने पाठक मंच का कुशल संचालन किया। पेशे से वे बैंक कर्मचारी थे। नए-नए खुले क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक में वे नौकरी करते थे। उनके बड़े भाई कैलाश परसाई कांग्रेस नेता के रूप में पहचाने जाते थे।

मेरी शाम अक्‍सर उनके घर पर साहित्‍य और दुनिया जहान की चर्चा और बहस करते हुए बीतती थी। शनिचरा मोहल्‍ले में होली चौक से थोड़ा आगे गली में उनका घर था। उनके घर से कुछ पचास कदम दूर पर नर्मदा बहती है। नर्मदा किनारे सुंदर सेठानी घाट है। कई बार हम घाट पर जाकर बैठ जाते और घंटों बतियाते रहते। घाट तो अब भी हैं, नर्मदा भी बह रही है। पर ब्रजेश भाई नहीं हैं। 2005 में हार्टअटैक से उनका निधन हो गया। 




बाएं से पहले शंकर पुणतांबेकर हैं , दूसरे का नाम याद नहीं तीसरे संभवत: सतीश दुबे हैं। चौथे वेद हिमांशु,पांचवे,छठवें का नाम भी याद नहीं। सातवें सनत कुमार हैं। आठवें बलराम,नौवें का नाम भी याद नहीं, दसवें हर‍ि जोशी । ग्‍यारहवें कन्‍हैयालाल नंदन,बारहवीं  महिला  हैं, पर उनका नाम भी याद नहीं। तेरहवें शकील,चौदहवें संतोष रावत और पंद्रहवें कैलाश परसाई। बाएं से बैठे हुए अखिल पगारे, राजेश उत्‍साही और ब्रजेश परसाई।  होशंगाबाद,मप्र में 22 एवं 23 नवम्‍बर,1980 को आयोजित इस कार्यक्रम के आयोजन का श्रेय ब्रजेश परसाई को जाता है। 

ब्रजेश भाई ठिगने कद के लेकिन भारी शरीर के मालिक थे। चलते तो लगता जैसे कोई गोलमटोल गुड्डा लुढ़कता हुआ चला आ रहा हो। अपनी अलंकारित भाषा में शहर के किसी भी व्‍यक्ति से लेकर देश के नामवर लोगों की खिल्‍ली उड़ाना उनका प्रिय शगल था। पर उनकी खिल्‍ली सुनकर कतई बुरा नहीं लगता था। उनके चेहरे पर हमेशा मुस्‍कान रहती थी। बात करते हुए उनकी आंखें कुछ इस तरह फैल जातीं कि जैसे आपने ध्‍यान नहीं दिया तो बाहर ही आ जाएंगी। उनकी हंसी ऐसी थी जैसे किसी कांच के मर्तबान से कंचे एक-एक करके बाहर आते हुए आवाज कर रहे हों। वे हमेशा अप-टू-डेट रहते।

समकालीन साहित्‍य के बारे में वे जितना पढ़ते थे शायद उन दिनों शहर में कोई और नहीं पढ़ता था। इसलिए मुझे उनके पास बैठना, बात करना अच्‍छा लगता था। मशहूर लघुपत्रिका 'पहल' मैंने पहली बार उनके घर में ही देखी थी। तमाम अन्‍य साहित्‍य पत्रिकाएं उनके यहां आती थीं। मैं उनसे पत्रिकाएं और किताबें लेकर पढ़ता था। पाठक मंच में मैंने भी दो किताबों की समीक्षा लिखी थी। ये मेरी पहली-पहली समीक्षाएं थीं। एक थी भगवत रावत की कविताओं की ‘किताब दी हुई दुनिया।’ दूसरी किताब रमाकांत श्रीवास्‍तव की कहानियों का संग्रह था।

यह समय लघुकथा का था। लघुकथा आंदोलन चल रहा था। ब्रजेश भाई भी लघुकथाएं लिखते थे और मैं भी। उनके कहने पर ही मैंने एक अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता में भाग लिया था। प्रतियोगिता में मेरी लघुकथा 'अनुयायी' को भी चुनी हुई लघुकथाओं में शामिल किया गया था। ब्रजेश भाई ने अपने प्रयासों से लघुकथाओं पर केन्द्रित दो अखिल भारतीय कार्यक्रम होशंगाबाद में करवाए। जिनमें उस समय के कई मशहूर लघुकथाकार शामिल हुए थे। इनमें कन्‍हैयालाल नंदन,बलराम,शंकर पुणतांबेकर,सतीश दुबे, मालती महावर,हरि जोशी,विक्रम सोनी,कृष्‍ण कमलेश,भगीरथ जैसे कई नाम शामिल थे। मैं भी इन आयोजनों का हिस्‍सा था। 2010 में लघुकथाकार बलराम अग्रवाल बंगलौर आए तो उनसे चर्चा में इन आयोजनों का जिक्र निकला। उन्‍होंने बताया कि इन आयोजनों और इनमें हुई चर्चा का लघुकथा आंदोलन में खासा महत्‍व है। 

नाटकों में भी उनकी खासी रुचि थी। भोपाल में उन दिनों भारत भवन नया-नया बना था। उसके साहित्यिक कार्यक्रमों को देखने-सुनने वे अक्‍सर जाया करते थे। जब वे लौटते तो उनसे मैं उन कार्यक्रमों के बारे में सुनता।

वे मुझ से लगभग तीन साल बड़े थे पर मेरी शादी उनसे पहले हुई। शादी पर जब वे घर आए और मेरी पत्‍नी निर्मला वर्मा से मिले तो कहा, ‘अब आप इन्‍हें निर्मल वर्मा बना दें।’ यह बात मुझे अब भी याद है। उन दिनों निर्मला हिन्‍दी साहित्‍य की प्राध्‍यापिका थीं। ब्रजेश भाई नहीं हैं पर उनका मुस्‍कराता चेहरा आज भी मेरी आंखों में बसा है।
                                 0 राजेश उत्‍साही  

Sunday, April 1, 2012

सूखती किताबों में भीगता मन


परिवार से दूर अकेले रहने के क्‍या दुख (और सुख) हैं, यह पिछले तीन साल से मैं हर समय अनुभव कर रहा हूं। हर सुबह एक नया सबक देने के लिए मुस्‍तैद होकर आती है।

बंगलौर आया तो घर के काम करने में कोई समस्‍या नहीं आई। क्‍योंकि बचपन से अपना काम स्‍वयं करने की आदत रही है। सफाई, कपड़े धोना, प्रेस करना जैसे कामों में कोई आलस महसूस नहीं हुआ। परिवार में रहते हुए भी यह रोजमर्रा का काम था। नहीं आता था, तो खाना बनाना। केवल चाय बनाना ही सीख पाया था। कभी-कभार अकेले होने पर पराठे बनाए जो देश के विभिन्‍न प्रांतों के नक्‍शों के प्रतिरूप ही नजर आते थे। रोटी बनाने का तो सवाल ही नहीं ।

यहां हलनायकलहल्‍ली(बंगलौर) में दो किलोमीटर के दायरे में खाने की कोई दुकान नहीं है। दिन की पेट पूजा तो दफ्तर की कैंटीन में हो जाती, लेकिन शाम के वक्‍त खुद बनाने के अलावा दूजा विकल्‍प नहीं। शुरू के आठ महीने तो दो-तीन साथी मिलकर रह रहे थे, सो समस्‍या नहीं आई। सब्‍जी काटने, धोने और बरतन आदि की सफाई का ठेका अपना था। बनाने का ठेका उनके पास था। वे पकाते और हम खाते।

फिर धीरे-धीरे वे भी इधर-उधर हो गए। नतीजा यह कि रसोई के मैदान में उतरना पड़ा। कुछ दिन प्रयोग चलते रहे। एक दिन खिचड़ी बनाई तो नमक डालना भूल गया। कुकर के ढक्‍कन को नमक डालने के लिए खोला तो खिचड़ी रूठकर रसोई की छत से जा चिपकी। खैर,अब तो मैं खिचड़ी,पुलाव,रोटी,पराठे,बाटी,दाल,सब्‍जी सब बना लेता हूं। यकीन न हो तो कभी पधारें, वादा है कि भूखे पेट नहीं जाने दूंगा। मित्रो, गारंटी का तो जमाना ही नहीं रहा, इसलिए स्‍वादिष्‍ट होगा या नहीं यह मत पूछिएगा।
 **
लीजिए जो बताने के लिए यह पोस्‍ट शुरू की थी, वह तो बीच में ही रह गया। मैं इधर मार्च में लगभग 10 दिन उत्‍तर भारत के भ्रमण पर था। बंगलौर-दिल्‍ली-रोहतक-समालखा-दिल्‍ली-जयपुर-भोपाल-जबलपुर-दिल्‍ली-बंगलौर। यह भ्रमण भी बहुत कुछ अपने में समेटे है। इन यात्राओं का वृतांत यायावरी पर लिखूंगा।

यात्रा से 25 मार्च की रात दस बजे लौटा तो दूसरे माले पर स्थित मेरे वन बीएचके घर में बाढ़ आई हुई थी। रसोई, हाल और कमरा सब जगह पानी ही पानी था। पानी की समस्‍या तो पूरे देश में है। उससे हलनायकनहल्‍ली अछूता नहीं है। 36 फ्लैट वाले इस अपार्टमेंट में पानी की खोज में मकान मालिक ने परिसर में पिछले दो साल में एक के बाद एक, दो टयूबवैल खुदवाए हैं। एक तो पहले से ही था। पानी सुबह-शाम, आधा-एक घंटे के लिए ही आता है। ऐसे में रसोई या सप्‍पने का कौन-सा नल खुला रह जाए कह नहीं सकते। पिछले तीन साल से हर रोज अल्‍लसुबह दफ्तर के लिए निकलने से पहले मैं इस संदर्भ में खासी सावधानी बरतता रहा हूं।

इस बार भी जब यात्रा पर निकल रहा था, तो नीचे से एक बार फिर ऊपर आया और सारे नलों को जांचा कि वे बंद हैं या नहीं। पर रसोई का नल दगा दे गया। उसने बंद होने का आभास तो दिया, पर वह अपनी आदत के मुताबिक पूरी तरह बंद नहीं हुआ। पानी साफ आए, इसके लिए नल की टोंटी में एक छोटा छन्‍ना लगा रखा है। सामान्‍य तौर पर पानी सीधे ही सिंक में गिरकर नीचे चला जाता है। छन्‍ने में जम रही मिट्टी के कारण छन्‍ने ने फव्‍वारे का रूप धारण कर लिया। इससे पानी फैलकर सिंक के बाहर गिरता रहा और बाढ़ का कारण बना।

हाल के एक हिस्‍से में बड़ी चटाई पर बैठक की व्‍यवस्‍था की हुई थी। वहीं दीवार के सहारे किताबों को जमाया था। चटाई पर लगा बिस्‍तर पानी में भीगकर मन-मन भारी हो गया। रात एक बजे तक पानी उलीचने में जुटा रहा।

बिस्‍तर सूख गया। सबसे अधिक पानी किताबों ने पिया था। पिछले एक हफ्ते से सुखाने का अथक प्रयास कर रहा हूं। पूरे हाल में वे बिछी हैं, रात भर पंखे की हवा खाती हैं और दिन भर बन्‍द कमरे की गर्मी। शनिवार को दिन भर उन्‍हें छत पर लिए बैठा रहा। जैसे कोई चेहरा आसुंओं से भीगकर अपना असली रूप खो देता है, किताबों ने भी अपना असली रूप खो दिया है। सबसे ज्‍यादा नुकसान जिल्‍द यानी हार्डकवर वाली किताबों को हुआ है। उनकी जिल्‍द जो सुरक्षा के लिए बनी थी, वही उनकी विकलांगता का कारण बनी है।

इनमें सुधा भार्गव द्वारा भेंट किया कविता संग्रह ‘रोशनी की तलाश’, अनुपमा तिवाड़ी का ‘आईना भीगता है’ और वेद व्‍यथित का ‘अंतर्मन’ शामिल है। वेद जी ने बहुत आग्रह के साथ अपना नया कविता संग्रह ‘न्‍याय याचना’ भी प्रतिक्रिया हेतु मुझे भेजा था। उस पर समीक्षा लिखना लगातार टलता रहा है और अब तो वह संभव ही नहीं है। मैं वेद जी से क्षमा याचना ही कर सकता हूं। क्‍योंकि उनका कविता संग्रह कागज की लुगदी में बदल गया है। सुधा जी के घर से मैं पढ़ने के लिए राजी सेठ का उपन्‍यास तत-सम ले आया था। उसकी हालत वापस करने लायक नहीं रही है। इसके लिए भी सुधा जी से माफी ही मांगनी पड़ेगी।

‘तय तो यही हुआ था’ मेरे प्रिय कवि शरद बिल्‍लौरे का कविता संग्रह है। वह भीगने के बाद सूखकर पापड़ बन गया है। लेकिन धर्मवीर भारती का मेरा प्रिय उपन्‍यास ‘गुनाहों का देवता’ सूखने का नाम ही नहीं ले रहा है। साहित्‍य अकादमी से प्रकाशित रवीन्‍द्रनाथ टैगोर के निबंध संग्रह के दो खंड भी पानी में डूबे रहे हैं। पर हार्डकवर होने के बावजूद आश्‍चर्यजनक रूप से सुरक्षित हैं। पर रवीन्‍द्रनाथ की कविताएं अब भी पानी से तरबतर हैं। नेशनल बुक ट्रस्‍ट से प्रकाशित समांतर कोश के दो खंड भी सुरक्षित हैं, हालांकि पानी के निशान उन पर भी हैं। वे किताबें जो पेपरबैक थीं जल्‍द ही सूख गईं हैं बल्कि उन्‍होंने पानी भी कम ही पिया। फहमीदा रियाज, फैज अहमद फैज, शहरयार, कतील शिफाई के संग्रह बुरी तरह भीगे हुए हैं। पहल, अन्‍यथा, कथा जैसी कुछ पत्रिकाओं के भारी भरकम अंक भी थे, वे भी सूख रहे हैं। 


पिछले दिनों ही मैंने रश्मिप्रभा जी की कविताओं के दो संग्रह 'अनुत्‍तरित' और 'शब्‍दों का रिश्‍ता' तथा उनके द्वारा संपादित कविता संग्रह 'अनुगूंज' फिल्‍पकार्ट के माध्‍यम से खरीदे थे। ये तीनों ही किताबें ऊपर चित्र में दिख रहे छोटे से रैक में रखीं थीं। वे बच गईं। इन्‍हें तो मैं अभी पढ़ ही नहीं पाया था। 

सबसे अधिक क्षति मेरी अपनी कविताओं को हुई है। 1978 से लेकर 1987 के आसपास तक जो कविताएं मैंने लिखी थीं, वे तीन कॉपियों में लिपिबद्ध थीं, स्‍याही से। वे मेरे ब्‍लाग गुलमोहर पर भी नहीं हैं। दो कॉपियों में स्‍याही इस कदर फैल गई है, कि मुझे अपनी स्‍मृति पर जोर देकर याद करना पड़ेगा कि वहां क्‍या लिखा था। शायद वे भी वहां पड़े-पड़े उकता गई थीं और चाहती थीं कि उन पर ध्‍यान दिया जाए। पहली ही फुरसत में उन्‍हें कम्‍प्‍यूटर पर लाने की कोशिश करूंगा।

छत पर सूखती हुई किताबों को उलटते-पलटते 'पहल' के 90 वें अंक में प्रकाशित इस गीत ने मन को अंदर तक भिगो दिया। पढ़ें, शायद आपकी अनुभूति भी यही हो-

सोने से पहले : अवध बिहारी श्रीवास्‍तव

दरवाजे खिड़कियां देख लूं
आने से पहले बिस्‍तर पर

दूध उबलने को रक्‍खा है
उबल जाए रख दूं ,तो आऊं
अम्‍मा जी का पैर दुख रहा,
जाकर थोड़ी देर दबाऊं

जूठे बरतन पड़े हुए हैं
आती हूं चौके को धोकर

छोड़ो हाथ, अभी देवर जी
आए कहां शहर से पढ़कर
बाहर बाबू जी बैठे हैं
’बहू जागते रहना’ कहकर

चार गरम रोटियां सेंक लूं
बस आती हूं उन्‍हें खिलाकर

पैर पटकना बंद करो अब
एक मिनट आओ आंगन में
टंगे हुए कपड़े उतार लो
बाहर भींगेंगे सावन में

चलती तो हूं साथ तुम्‍हारे
लेकिन चूर हुई हूं थककर
***
                                       0 राजेश उत्‍साही 

Monday, February 27, 2012

छिपा हुआ था, अब छपा हुआ हूं

मेरा पहला कविता संग्रह 'वह, जो शेष है'  विश्‍वपुस्‍तक मेला,2012 में 27 फरवरी की शाम (बाएं से दाएं) कथाकार संजीव, लेखक-चिंतक राजेन्‍द्र अग्रवाल,व्‍यंग्‍यकार डॉ.शेरजंग गर्ग, वरिष्‍ठ कवि मदन कश्‍यप और लेखक उपेन्‍द्र कुमार जी के हाथों  विमोचित हुआ। 

Sunday, February 5, 2012

मैं अकेला था


यह महत्‍वपूर्ण कविता ब्‍लाग जगत के उन साथियों को समर्पित है, 
जो जरूरी होने पर भी कुछ नहीं कहते। 
जब नाजी कम्‍युनिस्‍टों के पीछे आए
मैं खामोश रहा
क्‍योंकि, मैं  कम्‍युनिस्‍ट नहीं था

जब उन्‍होंने सोशल डेमोक्रेट्स को जेल में बंद किया
तो मैं खामोश रहा
क्‍योंकि में सोशल डेमोक्रेट नहीं था

जब वे यहूदियों के पीछे आए
मैं खामोश रहा
क्‍योंकि, मैं यहूदी नहीं था

लेकिन,जब वे मेरे पीछे आए
तब बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था
क्‍योंकि,मैं अकेला था।
0 पीटर मार्टिन (जर्मन कवि)
(कवियाना ब्‍लाग के सौजन्‍य से)

Wednesday, February 1, 2012

सुभाष राय :मुझे जनसंदेश टाइम्स में अब नहीं होना चाहिए, मगर क्यों?


लीक पर वे चलें जिनके
चरण दुर्बल और हारे हैं,
हमें तो जो हमारी यात्रा से बनें
ऐसे अनिर्मित पन्‍थ प्‍यारे हैं।

सर्वेश्वर दयाल सक्‍सेना ने ये पंक्तियां जिनके लिए लिखी होंगी, उनमें से एक सुभाष राय भी हैं। इस साल की जनवरी के आखिर तक वे लखनऊ के उभरते हुए अखबार जनसंदेश टाइम्‍स के संपादक थे। लेकिन फरवरी शुरू होते ही उन्‍होंने अपने कुछ साथियों (जिनमें युवा कवि हरेप्रकाश उपाध्‍याय भी हैं) के साथ खुद को जनसंदेश टाइम्‍स से अलग कर लिया है। लेकिन उनके इस कदम का जनसंदेश बहुत गहरे अर्थ लिए हुए है। 

Friday, January 27, 2012

रास्‍ता इधर है...


                                                  फोटो: राजेश उत्‍साही 
...बश्‍ार्ते तय करो,
किस ओर हो तुम, अब 
सुनहले ऊर्ध्‍व-आसन के
दबाते पक्ष में,  अथवा 
कहीं उससे लुटी-टूटी
अंधेरी कक्षा में तुम्‍हारा मन 
कहां हो तुम ?
0 मुक्तिबोध
(मुक्तिबोध की लम्‍बी कविता 'चकमक' का एक अंश) 

Tuesday, October 25, 2011

जश्‍न-ए-बचपन


चकमक के 300वें अंक के विमोचन के अवसर पर जश्‍न-ए-बचपन के नाम से भोपाल में तीन‍ दिन का आयोजन 21 से 23 अक्‍टूबर तक था। 21 अक्‍टूबर को जाने माने शिक्षाविद् कृष्‍णकुमार की उपस्थिति में शिक्षा में बालसाहित्‍य की भूमिका पर चर्चा हुई। 

Saturday, April 4, 2009

मेरा फोटो, फोटो की कहानी

कभी-कभी कोई छोटी-सी घटना अपने में गर्भ में कितनी सारी बातें छुपाए रहती है, इसका उदाहरण है मेरा यह फोटो। यह फोटो जो आप यहां देख रहे हैं। आपमें से कुछ लोग सोच रहे होंगे उत्‍साही जी को और कुछ नहीं सूझा तो अपना बड़ा-सा फोटो लगा के ही बैठ गए।(पहले यह फोटो ब्‍लाग के नाम के साथ था।) एक-दो ने ब्‍लाग देखा तो पहली सलाह यही दी फोटो छोटा करो। जैसे हम किसी बच्‍चे को तेज आवाज में डेक बजाते देखकर कहते हैं आवाज कम करो। क्‍या सुन रहे हो, वह कर्णप्रिय है या नहीं बाद में देखेंगे। बेचारा बच्‍चा भले ही उस्‍ताद जाकिर हुसैन का तबला वादन क्‍यों न सुन रहा हो। कुछ ने फोटो की खूबसूरती को पहचाना और पहली प्रतिक्रिया यही दी कि फोटो बहुत सुंदर है। ऐसी प्रतिक्रिया व्‍यक्‍त करने वालों में मेरे गुरु सुरेश मिश्र भी हैं।

अब आप माने या न मानें, मेरा इतना खूबसूरत फोटो मैंने भी कभी नहीं देखा। खूबसूरत इस मायने में कि चेहरे पर प्रसन्‍नता का जो भाव है और होंटों पर मुस्‍कराहट। वह विरली है। बस इसके पहले यह एक और फोटो में मुझे नजर आई थी। वह 1998 के आसपास किसी ने खींचा था। उसमें मेरे साथ मनोज निगम थे। उस समय एकलव्‍य में कम्‍प्‍यूटर के नए मॉडल यानी कि विकसित मॉडल आए ही थे। मनोज ने उस फोटो को कम्‍प्‍यूटर पर डालकर उसके साथ प्रयोग किया। अपना फोटो एडिट कर दिया और मेरे फोटो को एक रेगिस्‍तान की पृष्‍ठभूमि में सुंदर तरीके से डालकर उसे मेरे जन्‍मदिन पर भेंट किया। फोटो में दूर एक सूरजमुखी का फूल भी है। यह फोटो मुझे बहुत पसंद आया। इस पर मैंने एक ग़ज़ल भी लिखी। जिसका एक शेर है - जब भी मुस्‍कराया है कोई देखकर मुझको, मैंने अपनी शख्‍शियत का नया मायना देखा । यह फोटो पिछले दस साल से एकलव्‍य में मेरी टेबिल के सामने थर्मोकोल पर लगा ही रहा है। अब सिस्‍टम के डेस्‍कटाप पर है। धन्‍यवाद मनोज। उसके बाद मैं खुद ऐसे फोटो के लिए तरस गया। खैर जिन लोगों ने फोटो छोटा करने की सलाह दी उनका भी धन्‍यवाद, जिन्‍होंने चुपचाप झेल लिया उनका भी शुक्रिया।

मेरा यह कथित ‍फोटो एक दिन अचानक ही एकलव्‍य भोपाल के बगीचे में टहलते हुए एकलव्‍य भोपाल के मेरे साथी राकेश खत्री ने डिजीटल कैमरे से खींचा था। 2008 के जून या जुलाई महीने की बात रही होगी। असल में राकेश नए आए हुए किसी कैमरे की ट्रायल ले रहे थे, ऐसा मुझे याद है। संभव है कैमरा उन अर्चना रस्‍तोगी जी का था जो मुझे हमेशा ऐसे याद करती हैं, ‘राजेश जी को मैंने कभी मुस्‍कराते नहीं देखा।’ मुझे मुस्‍कराते देखने की उनकी चाहत इतनी बढ़ गई कि एक दिन उन्‍होंने आकर कहा, ‘ मैंने कल रात आपको सपने में मुस्‍कराते हुए देखा।’ उनकी यह बात सुनकर मैंने भी संतोष की सांस ली थी कि चलो कम-से-कम उन्‍हें यह यकीन तो हुआ कि मैं मुस्‍कराता भी हूं। तो यह फोटो अर्चना जी को समर्पित किया जा सकता है। चलो किया।

पर जनाब कहानी अभी पूरी नहीं हुई। राकेश भाई ने यह फोटो अपने सिस्‍टम पर डाल दिया। मैं भी भूल-भाल गया। तब यह फोटो बहुत अच्‍छा नहीं लगा था। माथे पर बिखरे बाल,शर्ट के बटन खुले हुए,चेहरे पर सफेद दाढ़ी के खूंटे। मैंने फोटो देखकर हमेशा की तरह अफसोस जताया था कि अपना तो चेहरा ही ऐसा है, उसमें बेचारा कैमरा या कैमरे वाला क्‍या करेगा।

समय बीतता गया। असल में तो वह बीतता ही है। मैंने अजीम प्रेमजी फाउंडेशन में आने का फैसला किया। मुझे 2 मार्च,2009 को बंगलौर में ज्‍वाइन करना था। 28 फरवरी को मैं भोपाल से निकलने वाला था। 25 फरवरी को मुझे फाउंडेशन से एक ईमेल मिला कि अपनी एक पासपोर्ट साइज फोटो तुरंत भेजूं। संयोग से एक दिन पहले ही मैंने स्‍टूडियो में पासपोर्ट फोटो खिंचवाई थी। यह जानते हुए भी कि फोटो से पहले मैं स्‍वयं ही बंगलौर पहुंचूंगा , मैंने कूरियर से फोटो की एक नहीं तीन प्रतियां रवाना कर दीं। 27 फरवरी को मुझे फाउंडेशन से फोन आया कि आपने अब तक फोटो नहीं भेजा। मैंने निवेदन किया कि रास्‍ते में है, बस पहुंचने वाला ही है। (ये फोटो मेरे बंगलौर पहुंचने के एक हफ्ते बाद पहुंचे।) फोन पर फाउंडेशन की ओर से जैनी थीं। उन्‍होंने कहा आपके पास किसी फोटो की साफ्ट कापी नहीं है। वह भेज दीजिए। मुझे लगा मामला गंभीर है, मेरे पहुंचने से पहले मेरे फोटो का पहुंचना जरूरी है। मैंने कहा देखता हूं।

तब मुझे याद आया कि राकेश के सिस्‍टम पर एक फोटो पड़ा है। बस उसे ढूंढा। कमलेश यादव और जीतेंद्र ठाकुर ने मिलकर उसको कुछ-कुछ किया और फिर मैंने जैनी को ईमेल में जड़कर भेज दिया। 2 मार्च को जब बंगलौर में सुबह-सुबह फाउंडेशन के दफ्तर पहुंचा तो ये फोटो वाले राजेश उत्‍साही वहां पहले से विराजमान थे और मेरा मुंह चिड़ा रहे थे। फाउंडेशन के स्‍वागत कक्ष में एक बड़े-से बोर्ड पर एक बड़ी-सी कार्डशीट पर 6 बाई 6 के आकार में एक कोने में ये चिपके हुए थे। कार्डशीट पर मेरा परिचय लिखा हुआ था। आने वाला हर बंदा और बंदी स्‍वागत में अपने भाव उस पर लिखकर व्‍यक्‍त कर रहा था। सच मानो तो मुझे भी वहां चिपके हुए राजेश उत्‍साही मुझसे ज्‍यादा अच्‍छे लगे। धन्‍यवाद राकेश भाई। लोगों ने क्‍या लिखा वह अलग कहानी है।

बंगलौर पहुंचकर मैंने पहली छुट्टी मिलते ही अपने ब्‍लाग को सक्रिय करने का काम किया। यह बनाया तो दो साल पहले था,पर ज्‍यादा कुछ किया नहीं था। तो सबसे पहले फोटो डालने की सूझी। तो यही इकलौता फोटो मेरे पास साफ्ट कापी के रूप में था। संयोग से यहां बंगलौर में मेरे पास जो सिस्‍टम है, उसमें फोटोशॉप नहीं है। मुझे भी फोटो को छोटा-बड़ा करने की ज्‍यादा तकनीक नहीं मालूम। जब पहली बार ब्‍लाग पर फोटो आया तो मुझे ही लगा कि यह तो कुछ ज्‍यादा-ही बड़ा हो गया है। सब प्रयास कर लिए,फिर सोचा अभी ऐसे ही जाने दो बाद में देखेंगे।

अब सोचता हूं देखना क्‍या है, आप लोग तो देख ही रहे हैं। तो देखते रहिए, हम तो ऐसे ही हैं भैय्या।
राजेश उत्‍साही