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Sunday, June 13, 2010

तब तक छब्‍बीस : शादी लड्डू-(2)


जी हां मैं ही हूं।
जी हां हमने शहीद होने से पहले छब्‍बीस लड़कियों का सामना किया है। यह अलग बात है कि रिजेक्‍ट हमने नहीं, उन्‍होंने या उनके घर वालों ने हमें किया था। शक्‍ल और अक्‍ल तो हमारी ठीक ठाक ही थी, पर हम किसी ऐसी नौकरी में नहीं थे, जिसकी आय से अपनी होने वाली बीवी और बच्‍चों का पेट पाल सकें, ऐसा रिजेक्‍ट करने वालों का कहना था। नौकरी थी एकलव्‍य संस्‍था में। संस्‍था को बने भी तीन साल ही हुए थे। आगे क्‍या होगा कुछ पता नहीं था। सरकार से अनुदान मिलता था। हमसे पूछा जाता कि जब संस्‍था को पैसा सरकार दे रही है तो आगे चलकर तो वह सरकारी ही हो जाएगी न। हम ठहरे सत्‍यवादी हरिशचंद्र। हमसे झूठ नहीं बोल जाता। हम कहते जी नहीं ऐसी कोई संभावना नहीं है। इतना ही नहीं जो नहीं पूछते उन्‍हें हम खुद ही उपत कर बता देते।

अब छब्‍बीस में से सबके नाम-पते तो याद नहीं। लेकिन कुछ हैं जिन्‍हें भुला नहीं सके हैं। सब कुछ तो यहां नहीं लिखा जा सकता न। पर कुछ कुछ है जो आपके साथ भी बांटा जा सकता है।

पहला प्रस्‍ताव
हमारे जमाने में लड़का या लड़की खोजने का काम घर के बुजुर्ग ही किया करते थे। कोशिश हमने भी की पर सफलता हाथ नहीं लगी। पहला प्रस्‍ताव ही अपने से चार साल बड़ी कन्‍या के सामने रख दिया। हां तब तक हम एकलव्‍य में नहीं आए थे। एक दूसरे दफ्तर में थे,जहां कन्‍या हमारी सहयोगी