मित्रो
आज मेरी पत्नी नीमा का जन्मदिन है। दो साल पहले अपने विवाह की पच्चीसवीं
वर्षगांठ पर मैंने नीमा को केंद्र में रखकर एक लम्बी कविता लिखी थी। यह कविता चार
भागों में मेरे कविता ब्लाग गुलमोहर पर प्रकाशित हुई थी। यह कविता मेरे पहले
संग्रह ‘ वह जो शेष है..’ में भी संकलित है।
हम आज
जिस अजाब से गुजर रहे हैं,
उसमें चल रही बहस के बीच मैं अपनी पत्नी में बसी स्त्री को किस तरह देखता हूं, यह इस कविता में कहने की कोशिश की है। आपमें
से बहुत से साथियों ने उस समय भी इसे पढ़ा था, अपनी प्रतिक्रिया दी थी। एक बार फिर मैं उस कविता को यहां
आप सबके सामने रख रहा हूं।
यह कविता
नीमा के प्रति मेरी एक सार्वजनिक आदरांजलि है। बहुत संभव है इसका कोई साहित्यिक
महत्व न हो।
मेरी
जीवनसंगिनी
यानी कि पत्नी का
नाम
निर्मला है
यह असली नाम है
बदला हुआ या काल्पनिक
नहीं
पर हां प्यार से
या समझ लीजिए सुविधा
से
मैं नीमा कहकर
बुलाता हूं।