वो जब भी मुस्कराया है देखकर मुझको
शख्सियत का अपनी नया मायना देखा
अपनी एक ग़ज़ल का यह शेर मुझे हमेशा से बहुत पसंद रहा है। आज मैंने इसमें एक परिवर्तन किया है। पहली लाइन का पहला शब्द पहले कोई था, मैंने उसे अब वो कर दिया है। तो 2000 के आसपास की ये दो ग़ज़लें और प्रस्तुत हैं। आज इन्हें फिर से पढ़ा, कहीं-कहीं कुछ बदला भी है। पिछले हफ्ते ग़ज़ल के एक ब्लाग को भी इन्हें भेजा था। पर वहां से न तो खत आया न ही खता बताई ।
।। एक।।
सब कहते हैं गजब की जान रखते हो
बहरों की बस्ती में इक जुबान रखते हो
धीमे स्वर में कहूं या तेज आवाज़ में
सबको पता है तुम क्या स्थान रखते हो
जो खताएं हों तुम्हारी तो हज़ारों माफ
हमारी एक पे, सर आसमान रखते हो
मुदृदत से दबे कुचले हुए थे हम यहां
उठे, तो पूछते हैं क्यों तूफान रखते हो
तुम्हारा वजूद है, हमारे खून से,पसीने से
जान पड़ता नहीं, हमारा ध्यान रखते हो
सहने के दिन गए, न धीरज रखा जाएगा
सम्हालो तिजोरी, जहां अपने प्रान रखते हो
अभिव्यक्ति की कलम में सच्चाई की मार है
पता है कि तुम तलवार-ए-म्यान रखते हो
उत्साही है जमाने में,याद जमाने को रहेगा
लाख बरबादी के क्यों न अरमान रखते हो
*राजेश उत्साही
।।दो।।
बारिश की सड़कों पर आईना देखा
पथराई-सी आंख में आईना देखा
भीड़ में खोजते रहे अक्स जिसका
पाया जो तन्हा,माथे पे पसीना देखा
जो आया,जाएगा इक तयशुदा दिन
इससे अलहदा चलन अभी ना देखा
मौसम बदलते हैं,बदलती हैं अदाएं
दौर आतंक का बारह महीना देखा
जब भी हुआ,करीबे-मंजिल का गुमां
किनारे पे डूबता अपना सफीना देखा
मस्जिद-मंदिर से नहीं रहे बावस्ता
प्यार के हरफों में काशी-मदीना देखा
वो जब भी मुस्कराया है देखकर मुझको
शख्सियत का अपनी नया मायना देखा
*राजेश उत्साही
शख्सियत का अपनी नया मायना देखा
अपनी एक ग़ज़ल का यह शेर मुझे हमेशा से बहुत पसंद रहा है। आज मैंने इसमें एक परिवर्तन किया है। पहली लाइन का पहला शब्द पहले कोई था, मैंने उसे अब वो कर दिया है। तो 2000 के आसपास की ये दो ग़ज़लें और प्रस्तुत हैं। आज इन्हें फिर से पढ़ा, कहीं-कहीं कुछ बदला भी है। पिछले हफ्ते ग़ज़ल के एक ब्लाग को भी इन्हें भेजा था। पर वहां से न तो खत आया न ही खता बताई ।
।। एक।।
सब कहते हैं गजब की जान रखते हो
बहरों की बस्ती में इक जुबान रखते हो
धीमे स्वर में कहूं या तेज आवाज़ में
सबको पता है तुम क्या स्थान रखते हो
जो खताएं हों तुम्हारी तो हज़ारों माफ
हमारी एक पे, सर आसमान रखते हो
मुदृदत से दबे कुचले हुए थे हम यहां
उठे, तो पूछते हैं क्यों तूफान रखते हो
तुम्हारा वजूद है, हमारे खून से,पसीने से
जान पड़ता नहीं, हमारा ध्यान रखते हो
सहने के दिन गए, न धीरज रखा जाएगा
सम्हालो तिजोरी, जहां अपने प्रान रखते हो
अभिव्यक्ति की कलम में सच्चाई की मार है
पता है कि तुम तलवार-ए-म्यान रखते हो
उत्साही है जमाने में,याद जमाने को रहेगा
लाख बरबादी के क्यों न अरमान रखते हो
*राजेश उत्साही
।।दो।।
बारिश की सड़कों पर आईना देखा
पथराई-सी आंख में आईना देखा
भीड़ में खोजते रहे अक्स जिसका
पाया जो तन्हा,माथे पे पसीना देखा
जो आया,जाएगा इक तयशुदा दिन
इससे अलहदा चलन अभी ना देखा
मौसम बदलते हैं,बदलती हैं अदाएं
दौर आतंक का बारह महीना देखा
जब भी हुआ,करीबे-मंजिल का गुमां
किनारे पे डूबता अपना सफीना देखा
मस्जिद-मंदिर से नहीं रहे बावस्ता
प्यार के हरफों में काशी-मदीना देखा
वो जब भी मुस्कराया है देखकर मुझको
शख्सियत का अपनी नया मायना देखा
*राजेश उत्साही