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Tuesday, June 21, 2016

नसीम अख्‍तर की कविताएं

नसीम अख्‍तर की तीन  कविताएं: तुम्‍हारा मौन,उम्‍मीद और एक बार फिर
( नसीम इन दिनों भोपाल के एक निजी अस्‍पताल में अपने जीवन की लड़ाई लड़ रही है। वह साइकिल से गिरकर बुरी तरह घायल हो गई है। इस वक्‍त वह कोमा में है। उसकी ये तीन कविताएं 2010 में प्रकाशित हुई थीं। तब मैंने इन्‍हें गुल्‍लक में प्रकाशित किया था। उसकी सलामती की दुआ के साथ एक बार फिर से इन्‍हें प्रकाशित कर रहा हूँ।) 

Monday, June 10, 2013

मिलना दो 'फैन' का


उत्‍तराखंड में भगीरथी नदी के किनारे बसे उत्‍तरकाशी के नगरपालिका भवन में तीन दिवसीय राष्‍ट्रीय बाल साहित्‍य संगोष्‍ठी का आयोजन था 7 से 9 जून,2013 तक। आयोजन बाल पत्रिका बाल प्रहरी तथा अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन ने मिलकर किया था।

कवियत्री रेखा चमोली के साथ उत्‍तरकाशी में: फोटो-प्रमोद पन्‍यूली
मैं देहरादून से अपने अन्‍य साथियों के साथ लगभग 4 बजे शाम को पहुंचा था। फाउंडेशन के कार्यालय में अपना सामान रखकर आयोजन स्‍थल पर पहुंचा। अंदर हाल में बच्‍चों का काव्‍य पाठ आरंभ होने वाला था। बाहर स्‍वागत कक्ष में रखे रजिस्‍टर में अपना नाम लिखना था। रजिस्‍टर का पेज भर चुका था। वहां बैठी एक महिला ने जल्‍दी-जल्‍दी अगले पेज पर कालम बनाए और एक अन्‍य किताब की मदद से उसमें लाइनें खीचीं । इस बीच एक और महिला कार्यक्रम में शामिल होने के लिए आ पहुंची। मैं अपना नाम लिख रहा था, वे अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहीं थीं। नाम लिखकर ज्‍यों ही मैं पलटा। उनके दोनों हाथ नमस्‍कार की मुद्रा में जुड़ गए।
- मैं आपकी कविताओं की बहुत बड़ी फैन हूं।....यह कहते हुए उनके होंठो पर मुस्‍कराहट तैर रही थी। चेहरे पर एक अजीब तरह की खुशी नजर आ रही थी। ऐसी खुशी शायद जिसे अपने पाठक के चेहरे पर देखने के लिए एक रचनाकार सदा प्रतीक्षारत रहता है।
- कौन-सी कविताएं?
- हाथ दवा है, हाथ दुआ है।
- अच्‍छा ।
- मैं अपने स्‍कूल में बच्‍चों को पढ़ाती हूं। वे बहुत आनंद लेते हैं।
- आपका शुभनाम?
- रेखा चमोली।
- अच्‍छा तो आप हैं रेखा चमोली।
मैं नाम से रेखा को जानता था। पर उनसे यहां और इस तरह मुलाकात होगी इसका अंदाजा नहीं था। 
अंदर कार्यक्रम शुरू हो गया था। आयोजक मुझे भी बुलाने आ गए थे। इसलिए मैंने कहा कि बाद में मिलते हैं।
रेखा चमोली उत्‍तराखंड की युवा कवियत्री के रूप में अपनी पहचान बना चुकी हैं। साहित्यिक पत्रिका "समकालीन सूत्र " द्वारा बस्‍तर के लोककवि स्‍वर्गीय ठाकुर पूरनसिंह की स्‍मृति में दिया जाने वाला सूत्र सम्‍मान 2012 के लिए उन्‍हें दिया गया है। हाल ही मैं उनका पहला कविता संग्रह "पेड़ बनी स्त्री" खासा चर्चित हुआ है। इस संग्रह की शीर्षक कविता कुछ इस तरह है -    
।।पेड़ बनी स्त्री।।
एक पेड़ उगा लिया है मैंने
अपने भीतर
तुम्हारे प्रेम का
उसकी शाख़ाओं को फैला लिया है
रक्तवाहिनियों की तरह
जो मज़बूती से थामे रहती हैं मुझे

इस हरे-भरे पेड़ को लिए
डोलती फिरती हूँ
संसार भर में
इसकी तरलता नमी हरापन
बचाए रखता है मुझमें
आदमी भर होने का अहसास

एक पेड़ की तरह मैं
बन जाती हूँ
छाँव, तृप्ति, दृढ़ता, बसेरा
 **
अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन ने भी उनकी एक कविता 'भाषा' का पोस्‍टर प्रकाशित किया है।
कार्यक्रम समाप्‍त होने पर हमारी मुलाकात फिर से हुई। रेखा ने बताया रूम टू रीड द्वारा प्रकाशित मेरी पांचों कविताएं उन्‍हें बहुत अच्‍छी लगती हैं। उन्‍हें हर कविता का शीर्षक याद था। इनमें ‘आलू मिर्ची चाय जी, कौन कहां से आए जी’ भी शामिल है। वे उन्‍हें बच्‍चों के बीच लगातार उपयोग करती हैं। शुरू में उन्‍हें लगा कि 'हाथ' कविता अपने शब्‍दों की वजह से बच्‍चों को कठिन लगेगी,पर जब उन्‍होंने इसे हावभाव के साथ बच्‍चों के बीच पढ़ा, तो अब वे भी इसे इसी तरह गुनगुनाते हैं। रेखा ने बताया कि पिछले दिनों रमणीक मोहन जी(पोर्टल में मेरे सहयोगी) उत्‍तरकाशी आए थे, तब उन्‍होंने उनसे भी इन कविताओं का जिक्र किया था और उनकी मार्फत धन्‍यवाद भी भेजा था। पर वह मुझ तक नहीं पहुंचा। रमणीक जी थोड़े भुलक्‍कड़ हैं, सो भूल गए होंगे। सोचता हूं अगर वे नहीं भूलते तो आज रेखा से ही सीधे अपनी कविताओं के बारे में सुनकर जो संतोष हुआ वह शायद नहीं होता।
मैं अपनी कविताओं की फैन से मिलकर अभिभूत था। मैंने कहा, ‘आप मेरी कविताओं की फैन हैं और मैं आपकी कविताओं का।' 
और जब आपकी कविताओं का कोई फैन आपके सामने हो तो आप  उसे अपना कविता संग्रह (अगर कोई है तो) उसे भेंट न करें, यह कैसे हो सकता है। तो 'वह जो शेष है..' की प्रति मैंने रेखा को भेंट की। ऐसे मौकों के लिए मैं संग्रह की एक प्रति यात्रा के दौरान अपने साथ रखता हूं।
मेरे लिए उत्‍तरकाशी की इस पहली यात्रा की कुछ गिनी-चुनी उपलब्धियां हैं, उनमें से एक रेखा से मिलना भी है।
जिन्‍दगी में ऐसे खूबसूरत संयोग गाहे-बगाहे ही होते हैं, पर होते हैं।
                                     0 राजेश उत्‍साही  

Monday, April 22, 2013

भवानी प्रसाद मिश्र : उदास मत होओ इतने



नहीं, ऐसा नहीं है
वक्‍त मिलेगा,जिसमें
जमा हुआ यह वातावरण
हिलेगा
उदास मत होओ इतने
आखिर ऐसे दिन
कितने दिनों तक टिकते हैं

कई बार तख्‍तोताज
कबाड़ी बाजारों में बिकते हैं
या कहो धरे के धरे रह जाते हैं
कबाड़ी बाजारों में
लोग उन्‍हें सिर्फ देख-दाखकर
निकल जाते हैं

दुनिया में हर तरह के
उदास दिन आते हैं
इतने उदास मत हो जाओ
उदास लोगों के पास जाओ-आओ
उन्‍हें धीरज बंधाओ
और उनके काम पड़ो

दल-दल में पड़े रोड़े की तरह
नीचे-नीचे मत गड़ो
ऊपर के बोझ से
नया उजाला खींचो
हर नए रोज से

कहता हूं वक्‍त मिलेगा
जिसमें जमा हुआ यह वातावरण हिलेगा
और फिर दूर नहीं है वह दिन
तुम बेशक बचोगे
भय की जगह विश्वास बोओगे
उत्‍साह रचोगे

तब भय बोया है जिन्‍होंने
उतना बाहर नहीं
जितना खुद अपने भीतर
वे तुम्‍हें समझने की दशा में आ जाएंगे

तय हमें-तुम्‍हें सिर्फ इतना करना है
कि निर्भयता फैलाएंगे
निर्भयता गाएंगे
उत्‍साह भरेंगे देश-भर मनों में
उत्‍सव मनाएंगे वनों में
जंगल में मंगल करेंगे
जान डालेंगे अधमरी
तमाम हस्तियों में
बदल दी गई बस्त्तियों में
इकट्ठा होकर

मगर तय है कि यह
उदास होने से नहीं होगा
निराश होने से तो होगा ही नहीं
हिम्‍मत और प्रसन्‍नता से
छोटे-छोटे कामों में
जुट जाने से होगा

लोगों के दुख-दर्द पर
हंसते हंसते
लुट जाने से होगा।
0 भवानी प्रसाद मिश्र       





Sunday, May 24, 2009

शरद बिल्‍लौरे की याद

मेरी कहानी
उस संगमरमरी पत्‍थर की कहानी है
लोग खूबसूरत कहने के बावजूद
जिसे पत्‍थर कहते हैं।

उस काली चटटान की कहानी है
सख्‍त होने के बावजूद
कोमल पौधे जिसके सीने पर अपनी जड़ें जमाए रहते हैं।


कविता की ये पंक्तियां शरद बिल्‍लौरे की कविता मेरी कहानी की हैं। शरद अब हमारे बीच में नहीं हैं। 19 अक्‍टूबर 1955 को रहटगांव जिला होशंगाबाद,मप्र में जन्‍में शरद का 3 मई 1980 को दुखद निधन हो गया था। मैं 1982 में प्रगतिशील लेखक संघ की होशंगाबाद इकाई का सचिव था। शरद बिल्‍लौरे का कविता संग्रह ‘तय तो यही हुआ था’ प्रगतिशील लेखक संघ ने ही प्रकाशित किया था। सचमुच शरद भाई की कविताएं इतनी सहज और सरल थीं कि लगता जैसे वे पढ़ने वाले ने स्‍वयं लिखीं हों। मैं भी उनसे बहुत प्रभावित था। इस हद तक कि उनके इस संग्रह की कविताओं को आधार बनाकर मैंने श्रद्धांजलि स्‍वरूप एक कविता लिखी थी ‘तुम मुझ में जिंदा हो।‘ जब हरदा में प्रगतिशील लेखक संघ का संभागीय सम्‍मेलन हुआ तो उसमें होशंगाबाद के उभरते हुए कवियों की कविताओं का एक सायक्‍लोस्‍टाइल संग्रह होशंगाबाद इकाई की ओर से जारी किया था। इसका संग्रह का नाम शरद भाई के संग्रह की अंतिम कविता ‘तुम मुझे उगने तो दो’ के नाम पर रखा था। पिछले दिनों शरद कोकास के ब्‍लाग पर शरद बिल्‍लौर का जिक्र देखकर उनकी कविताओं की बहुत याद आई। खासकर यात्रा पर लिखी गई कविताओं की। मैं आज खुद जब अपने शहर भोपाल से बाहर बंगलौर में हूं,तब मुझे इन कविताओं को बार-बार पढ़ने का मन हुआ।

Saturday, May 9, 2009

बंगलौर : एक

कनार्टक राज्‍य परिवहन की
बस नम्‍बर के-4 एम 1455
रूट न 341 सी का
कंडक्‍टर
डयूटी पर निकलने से पहले
माथे पर तिलक लगाकर
भगवान के सामने रोज करता
है प्रार्थना

हे प्रभु
नायकनहल्‍ली से मोरीगेट की
आज कम से कम दस
सवारियां देना
ताकि दिन भर का
चाय का खर्चा निकल आए

और हां
करना कुछ ऐसा कि
नायकनहल्‍ली मंदिर के
कोने पे
वो दाढ़ी वाला
चूक जाए बस

दाढ़ी वाला
मांगता है टिकट
बहकाता है और लोगों को भी
न खुद बचाता है पैसा
न बचाने देता है मुझे

पता नहीं कैसा
सिरफिरा है
तीन रुपए का सफर
पांच रुपए की टिकट लेकर
करता है

हे प्रभु
इस सिरफिरे को
थोड़ी अक्‍ल दो
और मुझे कम से कम
दस सवारी

बस नम्‍बर
के-4 एम 1455
रूट नम्‍बर 341 सी का
कंडक्‍टर
डयूटी पर निकलने से पहले
माथे पर तिलक लगाकर
भगवान के सामने रोज करता
है प्रार्थना
0 राजेश उत्‍साही

Wednesday, April 15, 2009

॥ अधेड़ पेड़॥

अधेड़ पेड़
फिर हरा हो रहा है
आ रही हैं
नई पत्तियां
संचित हो रही है
ऊर्जा
जन्म ले रही हैं कोशिकाएं
बन रहा है प्लाज्मा
सक्रिय हो रहा है केन्द्रक
अधेड़ पेड़ में ।


0 राजेश उत्‍साही

Saturday, April 11, 2009

किस्‍से आलू मिर्ची चाय जी के

आलू मिर्ची जिंदगी में सबसे अधिक गाया : संदीप नाईकजैसा कि मैंने लिखा था आलू मिर्ची गीत के किस्‍से और भी हैं। तो किस्‍से आने शुरू हो गए हैं। संदीप नाईक ने यह राज खोला है कि अपनी 42 साल की जिंदगी में उन्‍होंने बहुत सारे गीत याद किए और तमाम जगह गाए। लेकिन उनमें सबसे ज्‍यादा बार आलू मिर्ची चाय जी गाया। संदीप मेरे बहुत अच्‍छे मित्र हैं। वे बहुत अच्‍छे गायक हैं। एकलव्‍य की ग्रुप मीटिगों में उनकी म‍हफिल रात-रात भर चलती थी। पिछले आठ-दस सालों से वे भोपाल में हंगर प्रोजेक्‍ट के मप्र के राज्‍य समन्‍वयक हैं। जहां तक मैं जानता हूं उन्‍होंने अपना कैरियर एकलव्‍य के देवास केन्‍द्र से ही शुरू किया था। बल्कि वे देवास केन्‍द्र में पुस्‍तकालय आदि में आने वाले युवाओं में शामिल थे। फिर उन्‍होंने एकलव्‍य में कोई दस-बारह साल काम‍ किया। यह वही समय था जब आलू मिर्ची चाय जी देवास,उज्‍जैन के आसपास के गांवों में बच्‍चे-बच्‍चे की जुबान पर था। संदीप ने लिखा है कि जब वे गांव में जाते थे, तो बच्‍चे कहते थे आलू मिर्ची वाले आ गए। यह इसलिए क्‍योंकि संदीप बच्‍चों के बीच इस गीत को जरूर गाते थे। बहुत से बच्‍चे जो अब युवा हो गए हैं संदीप को अब भी मिर्ची वाला कहते हैं। शुक्रिया संदीप भाई।

आलू मिर्ची के चाहने वाले और भी हैं.........मुझे पता है संदीप की तरह और भी कई मित्र हैं जो इस गीत को बच्‍चों के बीच लगातार लोकप्रिय बनाने में लगे रहे हैं। इनमें देवास एकलव्‍य के रविकांत मिश्र और उज्‍जैन एकलव्‍य के प्रेम मनमौजी का नाम तो मैं ले ही सकता हूं। होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम के एक स्रोत शिक्षक कमलनयन चांदनीवाला इस गीत को इस अदा से गाते थे कि सुनते ही नहीं देखते भी बनता था। चकमक क्‍लब से निकले गजानंद और शाकिर पठान अब भी इस गीत का उपयोग करते ही रहते हैं। परासिया,छिदंवाड़ा में होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम के स्रोत प्राध्‍यापक डॉ विजय दुआ का यह प्रिय गीत है। तो मैं आप सबको आमंत्रित करता हूं कि जिसके पास जो भी किस्‍सा हो इस गीत का, कृपया मुझे भेजें। संदीप ने शुरुआत कर दी है।

Friday, April 10, 2009

छोकरा कविताएं और उनका छुकरपना

मेरी ये कविताएं 1982-83 के आसपास की हैं। तब मेरी योजना थी कि छोकरा शीर्षक से कुछ नहीं तो दस-बारह कविताएं लिखूंगा। पर बात तीन से आगे नहीं बढ़ी।

सबसे पहले इन कविताओं को 1984 में चंडीगढ़ विश्‍वविद्यालय के कैम्‍पस से निकलने वाली एक सायक्‍लोस्‍टाइल पत्रिका हमकलम में जगह मिली। यह पत्रिका आज की समकालीन कविता के जाने-माने हस्‍ताक्षर लाल्‍टू और रूस्‍तमसिंह अपने साथियों के साथ मिलकर निकालते थे। रूस्‍तम भी सुपरिचित कवि,अनुवादक और संपादक हैं। एक जमाने में वे इकोनोमिक एंड पॉलीटिकल वीकली (ईपीडब्‍ल्‍यू) में थे। फिर कुछ समय महात्‍मा गांधी अंतर्राष्‍ट्रीय हिन्‍दी विश्‍वविद्यालय की पत्रिका बहुवचन के संपादक रहे। आजकल एकलव्‍य के प्रकाशन कार्यक्रम में कार्यरत हैं।

हमकलम में इन कविताओं को इनके चरित्र के अनुरूप बने चित्रों के साथ छापा गया था। जो पाठक सायक्‍लोस्‍टाइल तकनॉलॉजी को जानते हैं, वे समझ सकते हैं कि स्‍टेंसिल पर चित्र बनाना कितने धैर्य का काम है। ये चित्र बनाए थे कैरन हैडॉक ने। कैरन आज जानी-मानी चित्रकार हैं। महिला आंदोलन से जुड़े तमाम साहित्‍य में उनके चित्र देखे जा सकते हैं। उनके चित्रों में पेन की रेखाओं और पेन से बने बिन्‍दुओं का गजब का मिश्रण होता है। पत्रिका के आवरण पर मेरी कविता का ही चित्र था। कविताएं भी टाइप नहीं की गई थीं, हस्‍तलिपि में थीं।

इन कविताओं का एक बहुत-ही अनोखा इस्‍तेमाल दुनु राय और उनके साथियों ने मप्र के शहडोल जिले के अनूपपुर कस्‍बे में किया था। वे उन दिनों वहां एक संस्‍था विदूषक कारखाना से जुड़े थे। असल में संस्‍था बनाने वालों में से दुनु राय स्‍वयं एक थे। दुनु राय इंजीनियर हैं, पर आज उनकी पहचान एक समाजशास्‍त्री, पर्यावरणविद् और शिक्षाशास्‍त्री,लेखक के रूप में कहीं अधिक है। उन्‍होंने मेरी इन कविताओं को टाट से बने बड़े साइनबोर्ड पर लिखवाकर अनूपपुर के एक चौराहे पर लटकाया था। यह भी 1984-85 की बात है। अपने मुंह मियां मिठ्ठू बनने की बात होगी, पर मेरी इन कविताओं में कुछ तो बात है।

इसका एक और वाकया है। मप्र साहित्‍य परिषद की एक पत्रिका है साक्षात्‍कार । 1982 में मेरी एक कविता नूर मोहम्‍मद और उसका घोड़ा उसमें प्रकाशित हुई थी। उन दिनों सोमदत्‍त संपादक थे। सोमदत्‍त जी ने कुछ संपादकीय का सुझाव देते हुए कविता मुझे वापस भेजी और कहा कि अगर आप कविता का कुछ हिस्‍सा निकाल दें तो देखेंगे कि कविता में कितनी कसावट आ जाती है। सचमुच सोमदत्‍त जी ने मुझे एक नई दृष्टि दे दी थी। मैंने स्‍वयं कविता का संपादन किया और सोमदत्‍त जी को भेज दी। कविता साक्षात्‍कार में प्रकाशित हुई। साक्षात्‍कार के इसी अंक में हरिशंकर परसाई का एक व्‍यंग्‍य लेख भी था। बाएं पृष्‍ठ पर मेरी कविता थी और दाएं पृष्‍ठ से परसाई जी का लेख शुरू होता था। मेरे जैसे नौजवान लेखक के लिए यह भी एक उपलब्धि थी। बहरहाल मैंने उत्‍साहित होकर कुछ समय बाद अपनी दस-बारह कविताएं साक्षात्‍कार में प्रकाशन के लिए भेज दीं। बहुत दिनों तक उनका कोई जवाब नहीं आया। लगभग चार साल बाद 1987 में मुझे एक सूचना मिली। रायपुर में मप्र की युवाकविता समारोह किया जा रहा है। आयोजन मप्र हिन्‍दी साहित्‍य परिषद कर रही है। चुने हुए युवा कवियों में मेरा नाम भी था। समारोह की अध्‍यक्षता त्रिलोचन जी कर रहे थे। जहां तक मुझे याद है हम सात या आठ कवियों को उसमें शिरकत करना थी। अपने अलावा तीन नाम मुझे याद हैं। एक नाम है आज की समकालीन कविता के जाने-माने हस्‍ताक्षर कुमार अंबुज का । दूसरा नाम जाने-माने व्‍यंग्‍यकार कैलाश मंडलेकर का और तीसरा नाम शायद मेरी ही तरह कहीं खो गए राजीव सभरवाल का। जो कविताएं मुझे इस समारोह में पढ़नी थीं, उनमें ये तीन भी शामिल थीं। अफसोस की बात यह है कि इस समारोह में मैं नहीं जा पाया। यह अफसोस मुझे अब तक है। समारोह बहुत सफल रहा था। मुझे लगता है इस समारोह में अगर मैं जा पाता तो शायद मेरे लेखन की दिशा ही कुछ और होती।

न जा पाने का कारण भी खास था। पहले समारोह मई में आयोजित था। मैंने जाने की पूरी तैयारी कर ली थी। फिर किसी कारण से समारोह जुलाई में स्‍थानातंरित कर दिया गया। मैं चकमक के संपादन से जुड़ा था। जुलाई में कुछ स्थितियां ऐसी बनीं कि मुझे पत्‍नी निर्मला और एक साल के बेटे कबीर को लेकर भोपाल स्‍थानांतरित होना पड़ा। खैर फिर मैं सब कुछ भूलकर चकमक में रम गया। 1990 के आसपास हम लोगों ने चकमक का एक अंक बालश्रम पर निकाला। इस अंक में इनमें से दो कविताएं प्रकाशित की गईं थीं। चित्र बनाए थे कैरन हैडॉक ने। तो चलिए अब आप भी पढ़ लीजिए।

छोकरा : एक

हाथों
में
पीठ पर
या फिर गले में
जनेऊ की भांति
लटकाए रहता है छोकरा
झाडू़ बांधकर रस्‍सी में

मिलता है
रेलगाड़ी के डिब्‍बे में
अक्‍सर
बदन पर होती है एक
फटी,मैली-कुचैली
बनियान/कमीज और निकर
या निकर जैसी कोई चीज

घुस आता है
पैरों में
बिना कुछ कहे,
करता है सफाई झुककर
पैर
आगे-पीछे
ऊपर नीचे उठते हैं/सरकते हैं/हटते हैं
खिंचते हैं


छोकरा
साफ करता है
बीड़ी-सिगरेट के टोंटे
मूंगफली के छिलके
छिलके संतरे के
छिलके फलों के

इस उम्र में
जब साफ करने चाहिए
उसे अपनी स्‍लेट,अपनी कलम
अपना घर, अपना स्‍कूल
भविष्‍य की राह में आने वाले शूल

फैल जाती है
उसकी हथेली
दो सेकेण्‍ड ठहरता है वह
हर एक के सामने
हर एक के सामने होती है घड़ी अपने में
इंसान की उपस्थिति का
अहसास कराने की

जो सोचते हैं
वे केवल सोचते रहते हैं
अपने में इंसानियत की बात
छोकरा मांगता नहीं है भीख
बढ़ जाता है आगे
फैलाए अपनी हथेली

इस उम्र में
जब फैलनी चाहिए
मास्‍साब के सामने
पाने के लिए सजा
पाने के लिए इनाम

छोकरा
हाथों में
पीठ पर
या फिर गले में
जनेऊ की भांति
लटकाए रहता है
झाडू़ बांधकर रस्‍सी में ।
0 राजेश उत्‍साही
छोकरा : दो

छोकरा
कंधे पर,कुहनी में या फिर
पीठ पर
लटकाए रहता है एक झोला
काले धब्‍बों वाला बेडौल झोला

झोले में
बिल्‍ली छाप पालिश होता है
चेरी ब्‍लासम की डिब्‍बी में
काला और लाल

ब्रश होते हैं
मोटी और पतली नोकों वाले
नरम और सख्‍त बालों वाले
होते हैं कुछ
पुराने कपडे़ झोले में

उतरी हुई
स्‍कूल यूनीफार्म पहने
किसी की
घूमता रहता है
बस अड्डे,रेल्‍वे स्‍टेशन
बाग या भीड़ में

उसकी नजरें ढूंढती हैं
सिर्फ चमड़े के चप्‍पल-जूते
वाले पैर
ढेर सारे पैर

पैरों पर टिका होता है
उसका अर्थशास्‍त्र
मां को देने के लिए
बाप को दिलाने के लिए शराब
और अपनी शाम की पिक्‍चर का बजट

हर वक्‍त
देखता है छोकरा नीचे
देखता है पैरों की हरकत
बोलता है बस एक वाक्‍य
‘साब पालिश, बहिन जी पालिश’

कुछ खींच लेते हैं
पैर पीछे
कुछ बढ़ा देते हैं
पैर आगे

वह उतारता है
सलीके से चप्‍पल पैर से
पैर से जूते
साफ करता है
धूल-मिट्टी ऐसे
जैसे साफ करती है मां
उसका चेहरा

वह चमकाता है
जूते को,चप्‍पल को
और बकौल चेरी ब्‍लासम के
साब की किस्‍मत को

कहता है लीजिए साब
देखिए अपना चेहरा
साब झुककर देखते हैं अपना
चेहरा जूते में

थूक देता है
छोकरा
साब के चेहरे पर
जूते में
और फिर चमकाने लगता है
जूता

जूता
चकमाता है छोकरे को
छोकरा
चमकाता है जूते को


छोकरा
कंधे पर,कुहनी में या फिर
पीठ पर
लटकाए रहता है एक झोला
काले धब्‍बों वाला बेडौल झोला
0 राजेश उत्‍साही
छोकरा : तीन

छोकरा
लिए रहता है
टुकड़े एसब्‍सटास की चादर के
दो छोटे-छोटे टुकड़े

फंसाकर उंगलियों के बीच
बजाता है छोकरा
गाता है गीत
इकट्ठा करता है मजमा

मजमा
सुनता है
छोकरे के बचपन से
जवानी के गीत
और उसकी आने वाली जवानी को
बना देता है बुढ़ापा

छोकरा
गाता है रखकर कलेजा
गले में
दो सांप लहराते हैं
उसके गले में

छोकरे की आंख में
होता है
दो रोटियों का आकाश और
एक कप चाय का गहरा समुद्र

छोकरा
लिए रहता है
टुकड़े एसब्‍सटास की चादर के
दो छोटे-छोटे टुकड़े
0 राजेश उत्‍साही

Saturday, April 4, 2009

धूप के तेवर

तीखे धूप के तेवर हुए
गमछे गले के जेवर हुए

जेठ की तपन अभी बाकी
दिवस चैत्र के देवर हुए

चिटकती धूप में कहां पानी
सड़क पर खेल सेसर हुए

प्‍यास का मन अत़ृप्‍त रहा
सुराही-घड़े सब सेवर हुए

देह नदी बही कुछ इस तरह
अपरिचित सुवास केसर हुए

मोहित हम जिन नक्‍श पर
रंग उन सबके पेवर हुए

अपने नीम की छांव भली
हाय ऐसे मौसम में बेघर हुए
राजेश उत्‍साही
सेसर=छल, सेवर=अधपके मिट्टी के बर्तन
पेवर=पीला

Friday, March 27, 2009

हमारे हाथ: एक परिचय

हमारे हा‍थ कविता रूमटूरीड के लिए लिखी गई है। इसे उन्‍होंने एक पोस्‍टर के रूप में बच्‍चों के लिए प्रकाशित किया है। रूमटूरीड बच्‍चों में पढ़ने के प्रति रुचि पैदा करने के लिए विभिन्‍न कार्यक्रम चला रहा है। इस कविता के लिए जीतेन्‍द्र ठाकुर ने बहुत सुन्‍दर चित्र बनाए हैं।

बंगलौर में प्रवासी मजदूरों के बच्‍चों के लिए अजीम प्रेमजी फांउडेशन द्वारा चलाए जा रहे एक स्‍कूल के लगभग सौ बच्‍चे फांउडेशन का दफ्तर देखने मार्च 2009 के आखिरी दिनों में आए थे। उनमें से ज्‍यादातर हिन्‍दी नहीं समझते थे। मैंने कुछ हाव-भाव के साथ उन्‍हें अपनी यह कविता गाकर सुनाई। बच्‍चों ने बहुत उत्‍साह से इसे दोहराया। उनके साथ आए एक शिक्षक ने कन्‍नड़ में इसका अर्थ भी समझाया। 9 अप्रैल को स्‍कूल में बाल मेला था। मैं भी वहां गया। मुझे देखते ही हर बच्‍चा कविता की जो भी पंक्ति उसे याद रह गई थी, हाव-भाव के साथगाने लगा। एक कवि का और क्‍या चाहिए ?

हमारे हाथ ‍

हाथ दुआ है
हाथ दवा है
हाथों में ही
बसी हवा है

हाथ प्‍यार है
हाथ वार है
हाथों में ही
आविष्‍कार है

हाथ खेल है
हाथ रेल है
हाथों में ही
चम्‍पी-तेल है

हाथ्‍ा कलम है
हाथ श्रम है
हाथों में ही
छुपी शरम है

हाथ कान है
हाथ जुबान है
हाथों में ही
यह जहान है

राजेश उत्‍साही
2009

Monday, April 14, 2008

एक गीत के तेईस साल

आलू मिर्ची चाय जी  गीत को लिखे तेईस साल से ज्यादा समय हो गया है। यह चकमक के प्रवेशांक जुलाई 1985 में प्रकाशित हुआ था। इस अंक में आलू मिर्ची चाय जी, कौन कहाँ से आए जी शीर्षक से सीएन सुब्रहमण्‍यम का एक लेख था। चकमक के संपादक मंडल ने तय किया था की हर अंक में मुख्य लेख पर आधारित एक कविता या गीत भी दिया जाएगा। यह गीत उक्त लेख पर आधारित है। चकमक के पहले तीन अंकों तक यह क्रम चला लेकिन फिर यह क्रम टूट गया। 
आलू मिर्ची गीत बच्‍चों के बीच बहुत लोकप्रिय हुआ। इसे लोकप्रिय बनाने में मप्र के देवास जिले के चकमक क्‍लबों की बड़ी भूमिका है। उनके हर कार्यक्रम में यह गीत अनिवार्य रूप से गाया जाता था। बच्‍चे कार्यक्रम की शुरुआत ही इस गीत से करते थे। आज भी यह गीत बच्‍चों के बीच उतना ही लोकप्रिय है। मैं उन सब साथियों का बहुत आभारी हूँ,जिन्‍होंने इसे लोकप्रिय बनाने में योगदान दिया। इस गीत का उपयोग शिक्षक अपने प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भी करते हैं। एकलव्‍य के मेरे पुराने साथी,जो अब समावेश में हैं, रामनारायण स्‍याग जिन्‍हें मैं स्‍याग भाई कहता हूं। जब भी मेरा किसी से परिचय करवाते हैं इस गीत का जिक्र जरूर करते। और यह शिकायत भी करते हैं कि मैंने ऐसे गीत और क्‍यों नहीं लिखे। मैं उसने कहा था  के लेखक गुलेरी जी के पांव की धूल भी नहीं हूं। पर गुलेरी जी की ही तरह मैं भी एक गीत लिखकर यादगार बन गया हूं। ‍

1987 में भोपाल हुए जनविज्ञान जत्‍था सम्‍मेलन के अवसर जारी जनविज्ञान गीतों के ऑडियो कैसेट में यह गीत था। बाद में हरियाणा विज्ञान मंच द्वारा बनाए गए ऐसे ही एक अन्‍य कैसेट में भी यह गीत शामिल था। 2007 में इस रूमटूरीड ने पोस्‍टर के रूप में छापने की इच्‍छा व्‍यक्‍त की। जैसा कि जाहिर है गीत मोटे रूप में विभिन्‍न सब्‍जियों के इतिहास को बताता है।‍ रूमटूरीड ने गीत में दिए गए कुछ तथ्‍यों पर सवाल उठाए। वास्‍तव में 1985 से 2007 के बीच तमाम नई खोजें हुई हैं और नए तथ्‍य सामने आए हैं। रू‍मटूरीड ने कहा कि अगर नए तथ्‍यों को ध्‍यान में रखकर गीत को पुन: रचा जाए तो बेहतर रहेगा। यह मेरे लिए एक चुनौती थी। मैंने इस चुनौती को स्‍वीकार किया। इंटरनेट पर अपने छोटे बेटे उत्‍सव पटेल की मदद से तथ्‍यों की जॉंच की और पाया कि सचमुच नए तथ्‍य सामने आए हैं। इन तथ्‍यों को लेकर सीएन सुब्रहमण्‍यम से भी बात की । पूरी तरह संतुष्‍ट होने के बाद मैंने गीत में कुछ परि‍वर्तन किए। परिवर्तित गीत भी रूमटूरीड को उतना ही अच्‍छा लगा। उन्‍होंने इसे 23/36 के साइज में प्रकाशित किया है। इसके चित्र बनाए हैं बंजारा ने। लेकिन मजेदार बात यह है कि बच्‍चों को अभी भी पुराना गीत ही ज्‍यादा पसन्‍द है। मुझे भी।


राष्‍ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद ने 2008 में अपनी पाठय पुस्‍तकों में बदलाव किए हैं। आलू मिर्ची को कक्षा पांच की पर्यावरण पुस्‍तक आसपास में शामिल किया गया है। इस किताब में चकमक के दूसरे अंक में प्रकाशित मेरे एक अन्‍य गीत खिड़की वाले पेट को भी शामिल किया गया है।यह गीत अब उत्‍तराखंड शिक्षा विभाग की कक्षा पांच की पर्यावरण अध्‍ययन किताब में भी है और बिहार शिक्षा विभाग की कक्षा पांच की किताब में भी। इस गीत के यानी आलू मिर्ची के किस्‍से और भी हैं। ‍

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आलू मिर्ची  जिंदगी में सबसे अधिक गाया : संदीप नाईक
जैसा कि मैंने लिखा था आलू मिर्ची गीत के किस्‍से और भी हैं। तो किस्‍से आने शुरू हो गए हैं। संदीप नाईक ने यह राज खोला है कि अपनी 42 साल की जिंदगी में उन्‍होंने बहुत सारे गीत याद किए और तमाम जगह गाए। लेकिन उनमें सबसे ज्‍यादा बार आलू मिर्ची चाय जी गाया। संदीप मेरे बहुत अच्‍छे मित्र हैं। वे बहुत अच्‍छे गायक हैं। एकलव्‍य की ग्रुप मीटिगों में उनकी म‍हफिल रात-रात भर चलती थी। पिछले आठ-दस सालों से वे भोपाल में हंगर प्रोजेक्‍ट के मप्र के राज्‍य समन्‍वयक हैं। जहां तक मैं जानता हूं उन्‍होंने अपना कैरियर एकलव्‍य के देवास केन्‍द्र से ही शुरू किया था। बल्कि वे देवास केन्‍द्र में पुस्‍तकालय आदि में आने वाले युवाओं में शामिल थे। फिर उन्‍होंने एकलव्‍य में कोई दस-बारह साल काम‍ किया। यह वही समय था जब आलू मिर्ची चाय जी देवास,उज्‍जैन के आसपास के गांवों में बच्‍चे-बच्‍चे की जुबान पर था। संदीप ने लिखा है कि जब वे गांव में जाते थे, तो बच्‍चे कहते थे आलू मिर्ची वाले आ गए। यह इसलिए क्‍योंकि संदीप बच्‍चों के बीच इस गीत को जरूर गाते थे। बहुत से बच्‍चे जो अब युवा हो गए हैं संदीप को अब भी मिर्ची वाला कहते हैं। शुक्रिया संदीप भाई। 


आलू मिर्ची के चाहने वाले और भी हैं...
मुझे पता है संदीप की तरह और भी कई मित्र हैं जो इस गीत को बच्‍चों के बीच लगातार लोकप्रिय बनाने में लगे रहे हैं। इनमें देवास एकलव्‍य के रविकांत मिश्र और उज्‍जैन एकलव्‍य के प्रेम मनमौजी का नाम तो मैं ले ही सकता हूं। होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम के एक स्रोत शिक्षक कमलनयन चांदनीवाला इस गीत को इस अदा से गाते थे कि सुनते ही नहीं देखते भी बनता था। चकमक क्‍लब से निकले गजानंद और शाकिर पठान अब भी इस गीत का उपयोग करते ही रहते हैं। परासिया,छिदंवाड़ा में होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम के स्रोत प्राध्‍यापक डॉ विजय दुआ का यह प्रिय गीत है। तो मैं आप सबको आमंत्रित करता हूं कि जिसके पास जो भी किस्‍सा हो इस गीत का, कृपया मुझे भेजें। संदीप ने शुरुआत कर दी है।

चाहने वाले जयपुर में भी हैं....
जून के तपते दिनों में जयपुर में था। वहां दो लगातार दिन दिगन्तर और संधान संस्थाओं में जाना हुआ। दोनों ही संस्थाएं शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रही हैं। दिगन्तर में शिक्षकों की एक कार्यशाला चल रही थी। उसमें लगभग 30 शिक्षक भाग ले रहे थे। अपना परिचय देने के क्रम में मैंने पूछा कि कितने शिक्षकों ने आलू,मिर्ची,चाय जी गीत गाया है। 15 ऐसे शिक्षक थे जो इस गीत को गाते रहे हैं। हालांकि वे यह नहीं जानते थे कि इसका लेखक कौन है। फिर भी मुझे इस बात की खुशी थी कि मेरा लिखा गीत यहां गाया जा रहा है।
अगले दिन संधान में जाना हुआ। वहां लोगों ने मुझे इस रूप में पहचाना कि मैं आलू,मिर्ची,चाय जी गीत का लेखक हूं। इन दोनों अनुभवों ने मुझे बताया कि रचना अमर होती है। और उसके साथ उसका लेखक भी अमर हो जाता है।

संधान की बैठक में मेरे साथ एकलव्य में मेरे सहकर्मी रहे और अब अजीम प्रेमजी फाउंडेशन में राजस्थान प्रमुख गौतम पांडेय भी थे। गीत के बारे में वे पहले से जानते रहे हैं। उसकी लोकप्रियता का एक उदाहरण उन्होंने यहां देखा।

राजस्थान से लौटने के कुछ समय बाद उनका फोन आया कि वे उस गीत को अपने न्यूजलैटर में छापना चाहते हैं। कहां मिलेगा। मैंने उन्हें स्रोत बता दिए। फिर सोचा क्यों न गुल्लक में भी दे दूं। वैसे गुल्लक में पहली ही पोस्ट इस गीत की है। पर वह संशोधित गीत है। 
चकमक के प्रवेशांक यानी जुलाई,1985 में जो गीत छपा था वह इस तरह है-

आलू,मिर्ची,चाय जी
कौन कहां से आए जी

सात समुंदर पार से
दुनिया के बाजार से
व्यापार से,उपहार से
जंग-लड़ाई मार से

हर रस्ते से आए जी
आलू,मिर्ची,चाय जी

दक्षिण अमरीकी मिर्चीरानी
मसालों की है पटरानी
मूंगफली,आलू,अमरूद
धूम मचाते करते उछलकूद

साथ टमाटर आए जी
आलू,मिर्ची,चाय जी

भिंडी है अफ्रीका की
भूरी-भूरी कॉफी भी
नक्शे में है यूरोप किधर
वहीं से आए गोभी मटर

चाय असम की बाई जी
आलू,मिर्ची,चाय जी

चीन से सोयाबीन चली
अमरीका को लगी भली
घूम-घाम कर लौटी देश
उसमें हैं गुण कई विशेष

रोब जमाकर आई जी
आलू,मिर्ची,चाय जी

बैंगन,मूली,सेम,करेला
आम,संतरा,बेर और केला
पालक,परवल,टिंडा,मैथी
हैं भाई-बहन ये सब देशी

भारत की पैदायश जी
आलू,मिर्ची,चाय जी
कौन कहां से आए जी
         *राजेश उत्साही

और यह रूमटूरीड द्वारा प्रकाशित संस्‍करण
आलू मिर्ची चाय जी
कौन कहाँ से आये जी

सात समुंदर पार से
दुनिया के बाजार से
व्यापार से, उपहार से
जंग-लड़ाई मार से

हर रस्ते से आये जी
आलू, मिर्ची, चाय जी

मेक्सिकन है अमरुद
मिर्ची ने जहाँ पाया रुप
दक्षिण अमेरिका में पली
आलू के साथ मूंगफली

साथ टमाटर भाये जी
आलू, मिर्ची, चाय जी

नक्शे में यूरोप है जो भी
जन्मे हैं वहाँ मूली- गोभी
भिंडी हरी अफ्रीका की
भूरी-भूरी कॉफी भी

दुनिया भर में छाए जी
आलू, मिर्ची,चाय जी

चीन से सोयाबीन चली
अमेरिकन को लगी भली
धूम मचा कर लौटी देश
उसमें हैं गुण कई विशेष

चाय चीन की ताई जी
आलू, मिर्ची,चाय जी

बेंगन,सेम,करेला,कटहल
गिल्की,अदरक,टिंडा,परवल
आम,संतरा,काली मिर्ची
भाई-बहन है सब देशी

भारत की पैदाइश जी
कौन-कहाँ से आये जी

आलू,मिर्ची,चाय जी!

  0 राजेश उत्साही (2007)
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