Monday, July 18, 2011

काके लागूं पांय....


गुरु गोविन्‍द दोऊ खड़े, काके लागूं पांय
बलिहारी गुरु आपकी गोविन्‍द दियो बताय
                                                                                         फोटो:राजेश उत्‍साही
कबीर का यह दोहा बचपन से सुनता आ रहा हूं और इसकी व्‍याख्‍या भी। शिक्षक और भगवान के बीच कौन श्रेष्‍ठ है या कि दोनों में से किसके आगे पहले शीश झुकाया जाना चाहिए या कि किस के चरण स्‍पर्श किए जाने चाहिए आदि आदि।

चरण स्‍पर्श यानी पैर छूना वास्‍तव में किसी के प्रति आदर और श्रद्धा व्‍यक्‍त करने का तरीका है। पर विभिन्‍न कारणों से यह सत्‍ता या अपनी प्रभुता साबित करने का भी एक जरिया बनता रहा है। हमारे समाज में इसके ढेरों उदाहरण मिल जाएंगे। मुझे लगता है इसकी शुरुआत घर से ही होती है। इसके बारे में पर्याप्‍त चर्चा किए बिना बच्‍चों से यह अपेक्षा की जाती रही है कि वे अपने से बड़ों के पैर छूएंगे, चाहे इसके लिए उनका मन गवारा करे या न करे। दूसरी तरफ कुछ ऐसे रिश्‍ते-नाते भी हैं जिनमें पैर छूना अपने आप ही तय मान लिया जाता है। और अगर आप उसका पालन न करें,तो कोपभाजन के लिए तैयार रहें। महिलाओं के साथ तो जैसे यह अनिवार्य शर्त सी हो जाती है। नई-नवेली बहू का ससुराल पक्ष अगर भरा-पूरा हो तो उसकी तो झुक झुककर कमर ही टूट जाती है।
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बहरहाल पैर छूने की यह कवायद मेरे लिए बहुत सारी खट्टी-मीठी यादों का सबब बन गई है। पैर छूने की कोई कट्टरता घर में नहीं थी। हां जब किशोर हुए तो विभिन्‍न अवसरों पर यह अपेक्षा होने लगी कि हम परम्‍परा का निर्वाह करें। जैसे जन्‍मदिन और दीवाली आदि पर माता-पिता,दादी और बहनों के पैर छुएं। रक्षाबंधन पर बहनों के। यह आज भी जारी है। कुछ अन्‍य मौकों पर अन्‍य परिचितों के पैर भी छूने की अपेक्षा होती थी। पर मुझे कभी भी ऐसा नहीं लगा कि यह बहुत मन से किया हो। या कि इनमें से किसी भी अवसर पर हम सामने वाले से इतने अभिभूत थे कि बिना किसी आडम्‍बर के झुककर सायास ही पैर छू लिए हों। हर बार किसी परम्‍परा या लिहाज का झंडा आगे-पीछे चलता ही रहा।
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कुछ ऐसे वाकये या मौके जरूर रहे हैं, जो बरबस याद आ जाते हैं। उत्‍तर भारत में आमतौर पर सास अपने दामाद के पैर छूती है। लेकिन मेरे जमीर को यह कभी गवारा नहीं हुआ। जब ऐसा मौका आया, तो मैंने इससे हरसंभव बचने का प्रयास किया। और कई मौकों पर तो उल्‍टे उनके ही पैर छू लिए। सभी महिलाओं से चाहे वे रिश्‍ते में जो भी लगती हों, मैं हमेशा पैर छुवाने से बचता रहा हूं। दक्षिण भारत  स्‍त्री-पुरुष के बजाय आयु देखी जाती है। यानी आयु में जो भी छोटा है वह अपने से बड़े के पैर छुएगा ही। यहां बंगलौर में जब मुझे एक बेटी मिली तो बड़ी विचित्र स्थिति पैदा हो गई। संस्‍कारों के चलते मुझे उसके पैर छूने थे और उसे मेरे। अंत में हम दोनों में समझौता इस बात पर हुआ कि कोई किसी के पैर नहीं छुएगा।
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मुझे दो ऐसे वाकये याद आते हैं, जब सचमुच मेरा मन किया कि सामने वाले के पैर छू लिए जाएं। पहली घटना तीन साल पहले की है। मेरा पचासवां जन्‍मदिन था। भोपाल में घर के पास के बाजार में मैं कुछ सामान खरीदने गया था। वहां अचानक जाने-माने शिक्षाविद् अनिल सद्गोपाल मिल गए। उन्‍हें मैं अनिल भाई कहता हूं। 1982 के आसपास उनके साथ काम करने का मौका मिला था। उनकी कही एक बात मेरे लिए मार्गदर्शक बन गई थी।

होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम की पत्रिका के पहले अंक की सामग्री सीमेंट की खाली बोरी में भरकर उन्‍होंने मुझे सौंपते हुए कहा था,' कि इसे भोपाल से छपवाकर लाना है।' 
मैं अवाक था। कि मैंने ऐसा कोई काम पहले कभी नहीं किया था। हां पढ़ने-लिखने में मेरी रुचि अवश्‍य रही थी। मैंने कहा था, 'मुझ से यह नहीं होगा। मुझे यह काम नहीं आता है।' उन्‍होंने तुरंत ही वह बोरा मेरे हाथ से ले लिया और कहा था, 'अगर जिन्‍दगी में आगे बढ़ना है तो किसी भी काम के लिए यह मत कहना कि यह मुझे नहीं आता है। कहना कि मैं कोशिश करूंगा। अन्‍यथा कोई काम करने का मौका नहीं देगा।' फिर तो यह बात मैंने गांठ बांध ली। इस एक सूत्र के सहारे न जाने कितने कौशल मैंने सीखे। काम किए,जिम्‍मेदारियां उठाईं।
तो पचासवें जन्‍मदिन पर आर्शीवाद प्राप्‍त करने के लिए अनिल भाई से बेहतर कौन हो सकता था। मैंने झुककर उनके पैर छू लिए। मेरे इस व्‍यवहार से वे भी हतप्रभ थे। पर जब मैंने अवसर और अपना मंतव्‍य उन्‍हें बताया तो उनकी आंखों में वह चमक उभर आई जो मैं अक्‍सर देखता था।
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दूसरी घटना पिछले बरस की है। मैं जयपुर की यात्रा पर था। रमेश थानवी जी के बारे में पढ़ता और सुनता रहा था। वे राजस्‍थान प्रौढ़ शिक्षण समिति में पिछले कई बरसों से सक्रिय हैं। समिति की  पत्रिका अनौपचारिका का संपादन कर रहे हैं। वे बच्‍चों के लिए भी लिखते रहे हैं। उनकी एक मशहूर कहानी 'घडि़यों की हड़ताल' मैंने चकमक में प्रकाशित की थी। लगभग साल भर तक अनौपचारिका के लिए मैं एक कालम भी लिखता रहा हूं। जयपुर गया तो मैंने उनसे मिलने की इच्‍छा व्‍यक्‍त की। उन्‍होंने मेरे ठहरने की जगह का पता पूछा और खुद ही कार चलाते हुए मिलने चले आए। अपने सामने उनको पाकर अनायास ही मैं उनके पैरों में झुक गया। सच कहूं तो उनका व्‍यक्तित्‍व ही ऐसा है।
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दो और ऐसे व्‍यक्ति हैं,जिनके मैंने कई अलग अलग मौकों पर बहुत आदर के साथ और मन से चरण स्‍पर्श किए हैं। इनका मेरे जीवन में स्‍थान लगभग गुरु जैसा है। एक हैं श्‍याम बोहरे। श्‍याम भाई ने मुझे ऐसे समय राह दिखाई, जब मेरे जीवन में लगभग अंधेरा छा गया था। मैं आत्‍मविश्‍वास खो चुका था। सच कहूं तो उनकी दिखाई राह पर चलकर ही यहां तक पहुंचा हूं। दूसरे हैं डॉ.सुरेश मिश्र। इन्‍होंने मुझे कॉलेज में कभी नहीं पढ़ाया, लेकिन मैं उन्‍हें 'सर' ही कहता हूं। अनजाने में ही मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा। वे उन व्‍यक्तियों में से हैं जो लगातार मेरा परिचय मुझ से कराते रहे हैं।
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दो घटनाएं ऐसी भी हैं, जब दो मित्रों को मैंने अपने पैर छूते हुए पाया। 1990 के आसपास इंदौर का एक युवा जो जनसंचार की पढ़ाई कर रहा था, छह महीने की इंटर्नशिप के लिए चकमक में आया था। उसे मेरे साथ ही काम करना था। मेरा काम करने का तरीका कुछ ऐसा था (और शायद अब भी है), मेरी प्रतिक्रिया से लगभग हर तीसरे-चौथे दिन वह रोने को हो आता। उसकी आंखें भर आतीं। मैं अपनी प्रतिक्रिया को हरसंभव बहुत सहज तरीके से व्‍यक्‍त करने की कोशिश करता। पर गलत को गलत कहने से बचना मेरे लिए संभव नहीं था। बहरहाल धीरे-धीरे दिन बीतते रहे। आखिरकार उसके जाने का समय आ गया। चलते समय औपचारिक अभिवादन के बाद जब सचमुच वह विदा होने लगा तो उसने झुककर मेरे पैर छू लिए। इस बार आंखें भर आने की मेरी बारी थी। उसने कहा, 'जितना मैंने आपसे इन छह महीनों में सीखा है, वह शायद छह साल में भी नहीं सीख पाऊंगा।' आज वह इंदौर में जनसंचार पढ़ाता है। हो सकता है वह मुझे भूल गया हो, पर संदीप पारे मैं तुम्‍हें कभी नहीं भूल पाऊंगा।
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एकलव्‍य के भोपाल केन्‍द्र का प्रभारी होने के साथ-साथ मैं एकलव्‍य की अकादमिक परिषद का सचिव भी था। इस नाते मेरी दोहरी जिम्‍मेदारी थी। एकलव्‍य में 1997 के आसपास एक नए साथी ने प्रवेश किया। साल भर के बाद जब अकादमिक परिषद में उनके काम और मानदेय आदि की समीक्षा के बाद पुनर्निधारण हुआ तो वे उससे संतुष्‍ट नजर नहीं आए। एक शाम को लगभग दो घंटे इस संबंध में मेरी और उनकी गहन चर्चा हुई। मैंने संस्‍था के कार्यकर्त्‍ता के रूप में, केन्‍द्र प्रभारी के रूप में, परिषद के सचिव के रूप में और उससे कहीं आगे बढ़कर एक दोस्‍त के नाते अपनी बात उनके सामने रखी। पता नहीं मेरे किस रूप ने यह किया कि चर्चा के बाद वे मुझे एक हद तक संतुष्‍ट से लगे। अंतत: जब वे चलने लगे तो उन्‍होंने झुककर मेरे पैर छू लिए। अनायास ही किया गया उनका वह अभिवादन आज भी मेरी थाती है। मैं अब एकलव्‍य में नहीं हूं, लेकिन राकेश खत्री हैं।
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सत्‍ताइस साल का लम्‍बा अरसा एकलव्‍य में गुजारने के बाद अब मैं यहां बंगलौर में हूं। लेकिन जब भी भोपाल जाना होता है, एकलव्‍य  जाता ही हूं। वहां के दो साथी शिवनारायण गौर और अम्‍बरीष सोनी जब मिलते हैं तो मेरे पैर छुए बिना नहीं मानते। पता नहीं उन्‍होंने मुझमें ऐसा क्‍या पाया है या मुझसे क्‍या पाया है कि वे अचानक ही मुझे जमीन से कुछ ऊपर उठा देते हैं। 
                                                               0 राजेश उत्‍साही  

Wednesday, July 13, 2011

पच्‍चीस का कबीर


नीमा,कबीर और उत्‍सव

समय कितनी जल्‍दी बीत जाता है। जैसे अभी कल ही तो मैंने कबीर पर लिखी एक पोस्‍ट हमारा कबीर लगाई थी। उसका चौबीसवां जन्‍मदिन था। आप में से कई साथियों ने अपना आर्शीवाद और शुभकामनाएं उसे दी थीं। देखते ही देखते एक साल बीत गया। आज वह अपना पच्‍चीसवां जन्‍मदिन मना रहा है।

एक बार फिर ऐसा मौका है कि मैं यहां बंगलौर में हूं और वह अपनी मां(नीमा) और छोटे भाई त्‍सव के साथ भोपाल में। भला हो इस इंटरनेट तकनॉलॉजी का। आज इसके माध्‍यम से मैंने उसे शुभकामनाओं के साथ लड्डू भेजे और उसने प्राप्‍त भी कर लिए। बस शायद कुछ बाकी है तो वह आपकी शुभकामनाएं। न्‍मदिन मुबारक हो कबीर। 
                                          0 राजेश उत्‍साही 

Thursday, June 30, 2011

शेष कहानी : वह जो शेष है !


वह दरवाजे के पास ही बैठा था। बस में ज्‍यादा लोग नहीं थे। यही कोई 20-22 लोग रहे होंगे। आशा के विपरीत बस अपने निश्चित समय पर रवाना हो गई थी। 
हाथ में बैंक काम्‍पटीशन गाइड जरूर थी पर हिचकोलों के कारण वह ठीक से पढ़ नहीं पा रहा था। वैसे ध्‍यान भी बराबर वाली सीट पर बैठी दो लड़कियों की ओर था। उम्र में एक-दो साल के अंतर वाली वे लड़कियां बात भी कुछ ऐसी ही कर रहीं थीं, कि किसी को भी सुनने में दिलचस्‍पी हो सकती थी। छोटी दिखने वाली लड़की बड़ी को मौसी कहकर संबोधित कर रही थी। वह कनखियों से उन्‍हें देख लेता और फिर गाइड पलटने लगता।

Tuesday, June 28, 2011

कहानी : वह जो शेष है !


वह दरवाजे के पास ही बैठा था। बस में ज्‍यादा लोग नहीं थे। यही कोई 20-22 लोग रहे होंगे। आशा के विपरीत बस अपने निश्चित समय पर रवाना हो गई थी।

Wednesday, June 22, 2011

100 वीं पोस्‍ट .... 26वीं पर 25वीं की याद

पिछली 23 जून को हमारे (नीमा और राजेश)  विवाह की पच्‍चीसवीं वर्षगांठ थी और आज है छब्‍बीसवीं। तेईस वर्षगांठ  हमने होशंगाबाद या भोपाल में ही मनाई थीं। चौबीसवीं वर्षगांठ पर कुछ ऐसा संयोग हुआ था कि हम साथ नहीं थे। और जो हुआ था उस पर मैंने एक पोस्‍ट ही लिख डाली थी। चाहें तो आप आज भी पढ़ सकते हैं - सालगिरह याद रखने के सत्रह सौ साठ बहाने । लेकिन पच्‍चीसवीं पर संयोग कुछ ऐसा हुआ कि हम साथ-साथ थे । नीमा मेरे कहने पर अकेले ही भोपाल से 1600 किलोमीटर का लंबा रेल सफर करके बंगलौर आ गई थीं। 23 को हम मैसूर में मित्र सरस्‍वती के घर थे। उनकी बेटी (जो हमारी भी है) राधा ने एक अनोखा आयोजन हमारे लिए किया। उसने एक-एक गुलाब हमको दिया और आग्रह किया कि हम उसे एक-दूसरे को दें। और कहा कि कसम लें कि अगले पच्‍चीसों साल तक इसी तरह लड़ते-झगड़ते रहेंगे, पर रहेंगे एक साथ ही।  हमने राधा की गवाही में ऐसी ही कुछ कसम ली भी ।
इस साल मैं भोपाल में हूं। सब कुछ वैसा ही है। बस कमी है तो बाबूजी की। वे अब नहीं हैं।  बीते बरसों में कई बार हम इस दिन आमने-सामने होते थे। पांव छूते और आर्शीवाद मिलता। और जब नहीं होते तो हम फोन पर पांव छूते और वे फोन की मार्फत ही अपना आर्शीवाद  दे देते। आज सुबह होशंगाबाद से मां ने फोन पर वही कहा जो वे हर बरस कहती रहीं हैं-खुश रहो। आवाज नहीं सुनाई दी तो वह केवल बाबूजी की। बहरहाल उनका आर्शीवाद तो साथ है ही। आज ही छोटे भाई अनिल और रानी की शादी की वर्षगांठ भी है।
                                                                                                                               0 राजेश उत्‍साही


Saturday, June 11, 2011

99....शादी का सातवां फेरा : समापन किस्‍त

तो लीजिए अपनी भी शादी हो गई। छोटी बहन से लेकर दादी तक सब खुश। सबके तरह तरह के अरमान थे हमारी शादी से जुड़े हुए। शादी के सातवें और अंतिम फेरे यानी सातवीं किस्‍त में कुछ और यादें।
अगर आपने इसके पहले की छह किस्‍तें नहीं पढ़ीं हों तो यहां उनकी लिंक है-

Friday, June 3, 2011

98....कोलम्‍बसी खोज यात्रा का समापन - शादी के लड्डू : 6


2010 की 23 जून को विवाह को पच्‍चीस बरस हो चुके हैं। इस अवसर पर मैंने गुल्‍लक पर एक शृंखला शुरू की थी-शादी के लड्डू । इसमें मैं अपने विवाह से जुड़े विभिन्‍न अनुभवों को आप सबके साथ बांटने की कोशिश कर रहा था। अपरिहार्य कारणों से यह शृंखला अधूरी रह गई थी। 23 जून फिर आ रही है। तो शेष रही कहानी पूरी करने की कोशिश कर रहा हूं। आप चाहें तो इन शृंखलाओं को फिर से पढ़ सकते हैं। लिंक यहां है-

Friday, May 27, 2011

97...एक लुहार की

अगर मैं कहूं कि 9 जुलाई, 2010 का दिन ब्‍लाग की दुनिया में एक ऐतिहासिक दिन था, तो इसमें कोई अतिश्‍योक्ति नहीं होनी चाहिए। यही वह दिन था जब डॉ सुभाष राय अपनी बात को कविता में कुछ इस तरह कहते हुए आए-
कबीर ने कहा, आओ
तुम्हें सच की भट्ठी में
पिघला दूं, खरा बना दूं


Saturday, May 7, 2011

96...व्‍यथित 'अन्‍तर्मन '


डॉ. वेद ‘व्‍यथित’ जी से मेरा पहला परिचय साखी ब्‍लाग पर हुआ था। वहां उनकी कविताएं प्रकाशित हुईं थीं। आदतन मैंने अपनी टिप्‍पणी की थी। मुझे याद है मैंने लिखा था ,वेद जी अपनी कविताओं में आत्‍मालाप करते नजर आते हैं। टिप्‍पणी थोड़ी तल्‍ख थी, पर उन्‍होंने मेरी बात को बहुत सहजता से लिया था। मैं उनका तभी से मुरीद हो गया।

पिछले दिनों मैंने गुल्‍लक में सुधा भार्गव जी पर एक टिप्‍पणी लिखी थी और उनकी कविताओं की किताब का जिक्र करते हुए कुछ कविताएं भी दी थीं। संयोग से सुधा जी और वेद जी एक-दूसरे से पहले से परिचित थे, पिछले दिनों दिल्‍ली में उनकी मुलाकात हुई तो मेरी चर्चा भी निकल आई। वेद जी ने अपनी हाल ही में प्रकाशित कविताओं का संग्रह अर्न्‍तमन मुझे कूरियर से भेजा और आग्रह किया कि मैं अपनी प्रतिक्रिया दूं।

संग्रह के पहले पन्‍ने पर उन्‍होंने लिखा है, ‘सहृदय,सजग साहित्‍यकार,समर्थ समीक्षक,बेबाक आलोचक व मेरे अभिन्‍न मित्र राजेश उत्‍साही को सादर भेंट।’ जब आपको ऐसे विशेषणों से नवाजा जाता है तो आप अचानक ही सजग हो उठते हैं, आपको उन पर खरा उतरने की कोशिश भी करना पड़ती है।

ईमानदारी से कहूं तो वेद जी के संग्रह की कविताएं पढ़ते हुए मैंने यह कोशिश की है। संग्रह में छोटी-बड़ी कुल मिलाकर 80 कविताएं हैं। वेद जी ने संग्रह की भूमिका में लिखा है कि, ‘ये कविताएं स्‍त्री-विमर्श पर हैं। लेकिन मैंने चलताऊ स्‍त्री विमर्श के नारे को इनमें कतई नहीं ढोया है। स्‍त्री विमर्श शब्‍द आते ही लगने लगता है – शोषित,अबला,सताई हुई,बेचारी दबी कुचली स्‍त्री या हर तरह से हारी हुई या जिस तरह साहित्‍यकारों ने उसे इससे भी ज्‍यादा नीचे दिखाया जाना ही स्‍त्री विमर्श माना है,परन्‍तु मेरा ऐसा मानना नहीं है। ऐसा कहना स्‍त्री के प्रति एक प्रकार का अन्‍य है।'

ज्‍यादातर कविताओं में वेद जी अपनी बात पर अडिग नजर आते हैं। पर आत्‍मालाप वाली बात मुझे यहां भी नजर आती है। वे अपनी अधिकांश कविताओं में स्‍त्री से बतियाते नजर आते हैं। पर उनका बतियाना इतना सहज है कि उसमें कोई आडम्‍बर या लिजलिजापन नजर नहीं आता । आइए कुछ उदाहरण देखें-
तो क्‍या
मैं यह मानूं
कि जो मैंने सुना है
वह ही कहा है तुमने
यदि हां तो
बस उसकी स्‍वीकृति में
मात्र हां भर दो
(स्‍वीकृति)
कवि स्‍त्री के प्रति इतना प्रतिबद्ध है कि वह ना सुनने के लिए भी तैयार है बिना किसी शिकायत के। वह आशावान है-
अस्‍वीकृति भले हो भी
तो भी मुझे विश्‍वास है
कि वह अस्‍वीकृति हो ही नहीं सकती
क्‍योंकि कठोर नहीं है
तुम्‍हारा हृदय
(विश्‍वास)
स्‍त्री का यह रूप वेद जी को केवल स्‍त्री में नहीं प्रकृति में भी दिखाई देता है-
मिट्टी के नीचे
कितने भी गहरे
चले जाएं बेशक बीज
तो भी नष्‍ट नहीं होते हैं वे
धरती मां अपनी गोद में
दुलारती रहती है उन्‍हें
(प्‍यार व दुलार)
पुरुष होने के नाते कहीं-कहीं वे अपराध बोध से भर उठते हैं। लेकिन वे इसे स्‍वीकारने में हिचकिचाते नहीं हैं-
और मैं अपने अहम् को
बचाए रखने के लिए
कभी बना तुम्‍हारा देवता
कभी स्‍वामी और
कभी परमेश्‍वर
(तुम्‍हारे प्रश्‍न)
कितने अपराधबोध ने
ग्रस लिया था मुझे
जब तुम्‍हारी निरीहता को
अपना अधिकार मान लिया था मैंने  
(पुरुषत्‍व)

वेद जी स्‍त्री के जितने आयाम हो सकते हैं उन सबकी बात करते हैं। इससे यह भी पता चलता है कि उनकी दृष्टि कितने सूक्ष्‍म अवलोकन कर सकती है। ऐसे अवलोकन करने के लिए धीरज तो चाहिए होता है, धीरज ऐसा जो किसी स्‍त्री के धीरज की तुलना में ठहर सके। ऐसा मन भी चाहिए जो स्‍त्री के मन की थाह पाने की न केवल हिम्‍मत रखता हो बल्कि जुर्रत भी कर सके। वेद जी इन कसौटियों पर खरे उतरते हैं । अपनी कविताओं में वे स्‍त्री की नेहशीलता,स्‍त्री की हंसी, उसके हृदय, उसकी क्षमाशीलता, उसकी सहनशीलता, उसकी नियति, उसके समर्पण, उसके मौन, उसके विश्‍वास, उसके संघर्ष, उसकी शक्ति, उसकी तपस्‍या, उसके धीरज, उसके सम्‍पूर्ण व्‍यक्तित्‍व और अस्तित्‍व की बात करते हैं।

कविताएं सहज भाषा में हैं, उन्‍हें पढ़ते हुए अर्थ समझने के लिए शब्‍दों में उलझना नहीं पड़ता है। बिम्‍बों का वेद जी ने भरपूर उपयोग किया है, पर वे भी गूढ़ या अमूर्तता की हद तक नहीं हैं। इन कविताओं को पढ़ना सागर की गहराई में उतरने जैसा है। गहराई में जाने पर आपको ढेर सारे मोती नजर आते हैं। इन मोतियों की चमक से आपकी आंखें चौंधिया जाती हैं। आप तय नहीं कर पाते हैं कि कौन-सा मोती उठाएं। क्‍योंकि सभी एक से बढ़कर एक हैं। इस संग्रह की हर कविता अपने आप में एक मोती है, लेकिन इन्‍हें एक साथ देखकर इनकी चमक आपस में इतनी गड्ड-मड्ड हो जाती है कि आप किसी एक को भी अपनी स्‍मृति में नहीं रख पाते। बहरहाल वेद जी ‘अन्‍तर्मन’ में तो बस ही जाते हैं।
वे कहते हैं-
मुझे सुनने में क्‍या आपत्ति है
तुम सुनाओ
मुझे देखने में क्‍या आपत्ति है
तुम दिखाओ
परन्‍तु जरूरी है
इसे देखने,सुनने और बोलने में
मर्यादा बनी रहे
हम दोनों के बीच
(मर्यादा)   
0 राजेश उत्‍साही  
पुनश्‍च: भाई सतीश सक्‍सेना ने याद दिलाया कि व्‍यथित जी का ब्‍लाग भी है,शुक्रिया। यह रही उसकी लिंक  http://sahityasrajakved.blogspot.com 

Monday, April 18, 2011

95...खुशी मिली इतनी कि ..


छत्‍तीसगढ़ के धमतरी जिले में एक ब्‍लाक है कुरूद। चार महीने पहले की बात है मैं अपनी मोटरसाइकिल सुधरवाने एक गैरेज में गया। काम थोड़ा ज्‍यादा था, सो वहां रुकना पड़ा। मैंने देखा कि मोटरसाइकिल सुधारने वाला युवक लगभग हर आधे घंटे बाद गुटखा खा रहा था।

मैंने जिज्ञासा वश उससे पूछ लिया,दिन भर में कितने पैकेट खा लेते हो।

उसने लापरवाही से उत्‍तर दिया, यही कोई 25-30 तक।

मैंने सोचा यह युवक दिन भर में कितना कमाता होगा। उसमें से 25-30 रुपए तो इसी में गंवा देता है। अपनी आदत के मुताबिक मैंने उसे गुटखे के नुकसान और बाकी चीजों पर भाषणनुमा कुछ- कुछ कहा। 
उसने उतनी ही लापरवाही से कहा, अरे भैया अब तो यह मरने के साथ ही छूटेगा।

इतनी जल्‍दी मरने की बात। मैं चुप हो गया।

मोटरसाइकिल ठीक हो गई। मैंने पैसे चुकाए और चलने लगा तो उससे कहा, कल से एक पैकेट कम खाने की कोशिश करना।
उसने मेरी तरफ देखा और बस मुस्‍करा दिया।

मैं भी भूल गया। हफ्ते भर बाद मेरा उस ओर से निकलना हुआ तो मुझे याद आया कि चलो एक बार पूछकर देखते हैं क्‍या हाल है। मुझे देखते ही बोला, भैया 20 तक आ गया हूं। 

इस बार मुस्‍कराने की बारी मेरी थी।

अब तो जैसे नियम ही बन गया। कोई काम नहीं भी होता तो भी मैं जान-बूझकर हर दूसरे-तीसरे दिन उसके गैरेज के आसपास से निकल जाता। हम एक-दूसरे को देखते, हाथ हिलाकर अभिवादन करते। अभी हाल ही में उससे बात हुई। यह जानकर मैं सुखद आश्‍चर्य से भर उठा कि अब वह हर रोज केवल तीन-चार पैकेट ही खा रहा है। मैं उम्‍मीद कर रहा हूं कि वह दिन भी जल्‍द ही आएगा जब वह गुटखा खाना ही छोड़ देगा।

मुझे पता है मैंने कोई बड़ा काम नहीं किया है। पर इससे मुझे जो खुशी मिली है वह बहुत बड़ी है।                                                                0 गोवर्धन लाल                                                                  

गोवर्धन लाल
(गोवर्धन कुरूद में अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन में कार्यरत हैं। यह रचना उनके अनुभव पर आधारित है। यह अनुभव उन्‍होंने मेल से कई साथियों को भेजा है। )

Saturday, April 9, 2011

94..नाजि़म हिकमत की ' उम्‍मीद' मेरी भी है


मैं नज्‍़में लिखता हूं
वे छप नहीं पातीं
लेकिन छपेंगी

मैं एक खुशखबरी वाले खत के इंतज़ार में हूं
मुमकिन है वो मेरे मरने के दिन आए
लेकिन आएगा ज़रूर

दुनिया सरकारों से और दौलत से नहीं चलती
अवाम की हुकूमत से चलती है
अब से सौ साल बाद सही
दुनिया अवाम की हुकूमत से ही चलेगी।
                              0 नाजि़म हिकमत

दिल्‍ली में जंतर-मंतर पर जो हुआ, उससे मुझे तुर्की के इस महान क्रांतिकारी कवि की यह नज्‍़म याद हो आई। इसे उन्‍होंने 1957 में लिखा था। तब मेरे पैदा होने में भी एक साल बाकी था। कहते हैं कवि युग दृष्‍टा होता है। इस समय दुनिया भर में अवाम की ताकत से बदलाव की जो हल्‍की-सी किरण दिखाई दे रही है, हो सकता है उसे सूरज बनने में और पचास बरस लगें, तो भी उम्‍मीद नहीं छोड़नी चाहिए। मैं भी कवि हूं और नाजि़म हिकमत की तरह ही सोचता हूं। उनकी इस नज्‍़म को (जो कि वास्‍तव में एक बयान है) मेरी भी नज्‍़म (बयान) माना जाए। 
                                       0 राजेश उत्‍साही

(नज्‍़म नाजि़म हिकमत की कविताओं के संग्रह ‘देखेंगे उजले दिन’ से साभार। अनुवादक: सुरेश सलिल। चित्र गूगल से साभार। नाजि़म हिकमत के बारे में अधिक जानकारी और उनकी कुछ अन्‍य कविताओं के लिए मेरी पुरानी पोस्‍ट नाजिम हिकमत की कविताएं पर भी एक नजर डाल सकते हैं।)

Thursday, April 7, 2011

93..हजारों हैं साथ तुम्‍हारे


मैं चाहता हूँ निज़ामे कुहन बदल डालूं,
मगर ये बात फ़क़त मेरे बस की बात नहीं!
उठो बढ़ो, मेरी दुनिया के आम इंसानों,
ये सबकी बात है, दो चार दस की बात नहीं!

                -                                           * ताज भोपाली

Monday, April 4, 2011

92 ..मैं सचमुच बहुत खुश हूं....

भारतीय टीम ने क्रिकेट का वर्ल्‍डकप जीत लिया है। यह बात अब  पुरानी हो चुकी है। पर हम इसकी चर्चा अगला वर्ल्‍डकप जीतने तक करते ही रहेंगे। तो उसी क्रम में मेरी बात।
*
भोपाल में मेरे घर के एक कमरे के दरवाजे पर पिछले दस साल से सचिन का एक बड़ा पोस्‍टर लगा है। मेरी पत्‍नी नीमा के वे बहुत प्रिय खिलाड़ी हैं। नीमा बहुत खुश हैं। आखिर क्‍यों न हों, आखिर उनके प्रिय खिलाड़ी का सपना पूरा हुआ। मैं भी सचमुच बहुत खुश हूं कि नीमा खुश हैं।
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इसमें कोई शक नहीं कि फायनल तक टीम को लाने में प्रत्‍यक्ष और अप्रत्‍यक्ष रूप से सचिन का बड़ा हाथ है। पर उनकी प्रतिभा के मान से फायनल उनके लिए थोड़ा फीका ही रहा। यह लगभग वैसी ही स्थिति है जैसी 1983 के वर्ल्‍डकप में थी। सुनील गावस्‍कर उस समय के स्‍टार खिलाड़ी थे। लेकिन वर्ल्‍डकप के लिए उनको याद नहीं किया जाता। याद किया जाता है कपिलदेव और उनके दूसरे साथियों को। तेंदुलकर भी आज के स्‍टार खिलाड़ी हैं। पर उनको इस वर्ल्‍डकप के फायनल में प्रदर्शन के लिए नहीं बल्कि इसलिए याद किया जाएगा वे इस टीम का हिस्‍सा थे। यही बात सहवाग पर भी लागू होती है। असली नायक तो धोनी बन गए हैं। कप्‍तान तो वे थे ही, फायनल में उनकी पारी ने सोने पर सुहागा कर दिया। मैं खुश हूं, कि मेरे प्रिय खिलाड़ी ने इस मैच में दिखाया कि आखिर लोग उनके दीवाने क्‍यों हैं। मैं सचमुच बहुत खुश हूं।
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फायनल के एक दिन पहले एक अंग्रेजी अखबार की हैडलाइन थी, पहले मोटेरा, फिर मोहली और अब मुम्‍बई का नंबर है। यानी तीन 'एम' । पर साथ ही यह भी कि मुम्‍बई फतह करने के लिए तीन और 'एम' से निपटना होगा यानी मुरलीधरन, मलिंगा और मैथ्‍यूज। मैथ्‍यूज तो वहां नहीं थे पर महेला थे। पर इन सारे 'एम' पर भारत का एक 'एम' यानी माही ही भारी पड़ा। वैसे 'एम' को एक और तरह से याद किया जा सकता है। 1983 में 'मैन आफ द मैच' मोहिन्‍दर अमरनाथ थे और 2011 में महेन्‍द्रसिंह धोनी। दोनों में महेन्‍द्र ही हैं। मैं सचमुच बहुत खुश हूं।
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अगर हम बल्‍लेबाजी की बात करें तो सचिन जिस उम्र में हैं क्रिकेट में वह उतार की उम्र मानी जाती है। उस पर वे पिछले 21 साल से क्रिकेट खेल रहे हैं। तो इस मान से यह वर्ल्‍डकप क्रिकेट का फायनल उतार की उम्र ने नहीं बल्कि क्रिकेट में युवा टीम ने जीता है। गंभीर,विराट,धोनी और युवराज। यह एक अच्‍छा संकेत भी है। पर इसमें संदेश यह भी है कि पुराना अनुभव कहीं न कहीं काम आता ही है। उन्‍हें स्‍थान और सम्‍मान मिलना ही चाहिए। वह युवाओं ने दिया भी। हालांकि सचिन को कंधों पर इस तरह बिठाकर किसी भी जीते हुए मैच में घुमाया जा सकता है, क्‍योंकि उन्‍होंने यह मुकाम बहुत पहले ही हासिल कर लिया है। अब वे किसी मैच में एक रन भी बनाते हैं तो वह एक नया रिकार्ड होता है। इस बात के लिए मैं सचमुच बहुत खुश हूं।
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संदेश यह भी है कि जब भी आप एकजुट होकर खेलोगे, जीतोगे। टीम किसी एक पर निर्भर नहीं होनी चाहिए। यह संदेश संगकारा की इस बात में भी छिपा है कि भारत के सामने 350 का लक्ष्‍य भी छोटा होता। वे यह बात भी टीम की एकजुटता को देखकर ही कहने पर मजबूर हुए। सोचिए आप कि भारत के चार विकेट गिर चुके थे। दो बल्‍लेबाज क्रीज पर थे और केवल रैना बचे थे। तब भी संगकारा इतने हताश थे।
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मैं सचमुच बहुत खुश हूं कि एक बार फिर भारतीय खिलाड़ी दबाव में नहीं आए। न ही उन्‍होंने अपने ऊपर सामने वाली टीम को हावी होने दिया। दो धुरंधर बल्‍लेबाजों के विकेट गिरने के बाद भी गंभीर तथा विराट जिस सहजता से खेल रहे थे, उसमें कहीं भी यह लग नहीं रहा था कि वे वर्ल्‍डकप का फायनल मैच खेल रहे हैं। लक्ष्‍य बहुत साफ था कि कम से कम पांच रन हर ओवर में बनना चाहिए। वह बनते रहेंगे तो सब कुछ आसान होगा। तनाव हमारे खिलाडि़यों पर नहीं बल्कि श्रीलंका के खिलाडियों के चेहरे पर नजर आ रहा था या फिर दर्शकों के चेहरे पर। जब विराट कोहली आउट हुए और धोनी ने आकर मैदान संभाला तब तक लंका के खिलाड़ी हथियार डाल चुके थे। संगकारा के चेहरे पर निराश साफ झलक रही थी। उन्‍हें शायद धोनी की श्रीलंका के खिलाफ 183 रन की धुआंधार पारी याद आ रही होगी। केवल एक ही बात उन्‍हें मैच जिता सकती थी, वह थी कि भारतीय खिलाड़ी गलतियां करें, हड़बड़ी दिखाएं। पिछले तीन मैच में गंभीर कुछ ऐसी ही हड़बड़ी में आउट हुए थे। लेकिन धोनी का वहां होना ही यह बताता था कि ऐसा कुछ होने वाला नहीं है। किसी कमेंटेटर ने कहा कि ड्रेसिंग रूम में बैठकर तनाव झेलने से अच्‍छा है कि आप मैदान में आकर तनाव झेलें। पर धोनी ने इसका उल्‍टा किया। वे तनाव श्रीलंका को देने आए थे। फिर भी एक-दो मौके ऐसे आए, पर संकट टल गया। धोनी ने अपना हेलीकॉप्‍टर निकाला और वर्ल्‍डकप ले उड़े। अब वे और उनके साथी कम से कम अगले चार साल के लिए पूरी दुनिया में उड़ते फिरेंगे। मैं सचमुच खुश हूं।
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2003 के वर्ल्‍डकप के फायनल को याद करें। भारतीय बल्‍लेबाजी का हाल ऐसा ही था। तब पहले ही ओवर में सचिन तेंदुलकर आउट होकर चले गए थे। इस बार सहवाग । उस बार सहवाग ने लंगर डालकर 88 रन बनाए थे। इस बार वह काम गौतम गंभीर ने किया। पर हां गेंदबाजी में हम इस बार कुछ अलग कर पाए। तब जहीरखान ने अपने पहले ही तीन ओवर में 29 रन दे दिए थे। उनके दूसरे साथी जवागल श्रीनाथ ने भी ऐसे ही रन दिए थे। श्रीनाथ का रोल निभाने के लिए इस बार श्रीसंत मौजूद थे और उन्‍होंने रन दिए भी। पर जहीर खान ने इस बार पहले तीन ओवर मेडन फेंककर श्रीलंका को शुरुआती बढ़त लेने से रोक‍ दिया। वरना कुल मिलाकर तो जहीर खान ने 10 ओवर में 60 रन दिए ही। 274 पर रोकने के लिए भी रैना,विराट और युवराज को बधाई दी जानी चाहिए। उनकी फील्डिंग लगभग ऐसी थी कि मजाल है, उनकी मर्जी के बिना कोई परिंदा पर भी मार जाए। कुल मिलाकर एक बार फिर अच्‍छी क्रिकेट देखने को मिली। सचमुच बहुत खुश हूं।
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कुछ लोग इस बात पर सवाल उठा रहे हैं कि जब सचिन को कंधे पर उठाकर साथी खिलाड़ी मैदान का चक्‍कर लगा रहे थे, तब धोनी कहां थे ? वे नजर क्‍यों नहीं आए। मुझे भी यह बात अजीब-सी लगी थी। पर शायद असलियत यह है कि बल्‍लेबाजी के दौरान धोनी की पसली की मांसपेशियों में खिंचाव आ गया था। बाद में टीवी पर आईं तस्‍वीरों में उन्‍हें पेट के बल लेटा दिखाया गया है और फिजियो कुछ एक्‍सरसाइज करवा रहे हैं। मैच खत्‍म होते ही सब  आलिंगनबद्ध हो बधाई दे रहे थे। ऐसे में उनकी तकलीफ शायद और बढ़ सकती थी। शायद बढ़ भी गई थी। इसीलिए वे तभी नजर आए जब पुरस्‍कार वितरण हो रहा था। वहां भी वे रवि शास्‍त्री से बात करते हुए बार-बार अपनी पसलियों को हाथ लगा रहे थे। किसी ने कहा कि धोनी सचिन को पसंद नहीं करते हैं, इसलिए वहां नहीं थे। मुझे लगता है यह कहना अनुचित होगा। दोनों अपनी काबिलियत के बल पर टीम में हैं। और इसीलिए मैं सचमुच बहुत खुश हूं।   
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भ्रष्‍टाचार और घोटालों की तमाम खबरों के बीच कुछ दिन के लिए ही सही वर्ल्‍डकप और भारतीय टीम ने हमें कुछ और बातें करने का मौका तो दिया। यह खुशी की बात नहीं है, पर उम्‍मीद है कि इस वर्ल्‍डकप से मिली खुशी हमें समस्‍याओं और बाधाओं से जूझने के लिए नई ऊर्जा देगी। डेढ़ महीने से चला आ रहा यह उत्‍सव खुशी देकर गया है। और वह तब जब हमारा नया साल शुरू हो रहा है। गुड़ी पड़वा, युगादि और चैतीचांद की बहुत-बहुत‍ शुभकामनाएं देते हुए मैं सचमुच बहुत खुश हूं।
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अंत में दो कल्‍पनाएं
।एक।
जब विराट कोहली आउट हुए तो युवराज ने कहा, ‘मैं नहीं जाऊंगा। मैं पिछले मैच में विराट के बाद गया था और पहली ही गेंद पर आउट हो गया था।’ इसलिए धोनी को आना पड़ा। गुस्‍से में धोनी ने वह रूप दिखाया जिसे सब देखना चाहते थे।
।दो।
जब विराट कोहली आउट हुए तो युवराज मैदान में जाने के लिए उठे। धोनी ने कहा, ‘अरे यार तू तो वैसे भी चार बार 'मैन आफ द मैच' बन चुका है। तू बैठ इस बार मैं पहले जाता हूं। और अगर मुझ से कुछ नहीं हुआ तो फिर तुझे तो संभालना ही है।’ जब तक युवराज का नंबर आया तब तक धोनी हेलीकॉप्‍टर स्‍टार्ट कर चुके थे।
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जो भी हुआ हो मैं सचमुच बहुत खुश हूं।
                                        0 राजेश उत्‍साही



Wednesday, March 30, 2011

मैं खुश हूं


मैं खुश हूं कि भारत-पाक सेमीफायनल में अच्‍छी क्रिकेट देखने को मिली। मैच एकतरफा नहीं था। समय-समय पर पलड़ा दोनों तरफ झुक रहा था।
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खुश हूं कि भारतीय खिलाड़ी दबाव में नहीं आए। हर खिलाड़ी अपनी क्षमता के अनुकूल खेलता दिखा। खुश हूं कि गलतियां होने पर भी उन्‍होंने न तो एक-दूसरे पर गुस्‍सा किया और न अपने चेहरे पर तनाव नहीं आने दिया।
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मैं खुश हूं, इसलिए नहीं कि पाक हार गया, इसलिए कि उन्‍होंने बहुत अच्‍छे खेल का प्रदर्शन किया। खुश हूं कि पाक टीम की गेंदबाजी बहुत अच्‍छी थी।
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मैं खुश हूं, इसलिए नहीं कि सचिन को चार जीवनदान मिले, इसलिए कि इसके बावजूद उन्‍होंने उन मौकों को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। खुश हूं कि उनके 85 रन कल के स्‍कोर में बहुत महत्‍व रखते हैं। पर मैं इसलिए भी खुश हूं कि उनका शतक नहीं बना। क्‍योंकि चार जीवनदानों से भरा सौवां अन्‍तर्राष्‍ट्रीय शतक बनाकर शायद सचिन भी खुश नहीं होते।   
 *
मैं खुश हूं कि सचिन को मैन आफ दी मैच दिया गया। पर अधिक खुश होता कि यह सम्‍मान पा‍क के वहाब रियाज को दिया जाता। इतने महत्‍वपूर्ण मैच में पांच विकेट लेना किसी भी मान से कम नहीं है। मेरे‍ लिए तो मैन आफ दी मैच वहाब ही है, जिसकी बाढ़ में भारत की टीम बह ही गई थी।
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मैं खुश हूं कि हमारी नकारा लग रही गेंदबाजी ने इस मैच में अपना खोया आत्‍मविश्‍वास और सम्‍मान वापस पाया। मैं खुश इसलिए भी हूं कि सातवें आसमान पर टहल रहे युवराज ने यह भी देखा कि पलक झपकते ही वे जमीन पर भी आ सकते हैं।
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मैं खुश हूं कि कुछ न्‍यूज चैनलों की तमाम कोशिशों के बाद सब कुछ शांति से बीत गया।
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मैं खुश हूं कि 1983 की विजेता टीम के कप्‍तान कपिलदेव ने मैच के बाद अपनी प्रतिक्रिया में कुछ इस तरह कहा (उसी चैनल पर ,जो पिछले एक हफ्ते से गंद मचाए हुए था ) कि, ‘हमें पाक की गेंदबाजी की प्रशंसा करनी चाहिए और वे इसके हकदार हैं। हमें अपने पड़ोसी मित्र से कहना चाहिए कि आप खुश नहीं होंगे क्‍योंकि आप नहीं जीते। क्‍योंकि जीतेगा तो कोई एक ही। लेकिन आपको खुश होना चाहिए कि आपने अच्‍छी क्रिकेट खेली। यहां जीत क्रिकेट की हुई है।’
इसमें तो कोई शक ही नहीं है। 
 *
सचमुच मैं खुश हूं कि हम अच्‍छा खेलकर सेमीफायनल में पहुंचे थे और अच्‍छा खेलकर ही फायनल में पहुंचे हैं। मैं खुश होऊंगा कि हम फायनल में भी अच्‍छा खेलें।                 
                             0 राजेश उत्‍साही

Wednesday, March 23, 2011

एक क्रांतिकारी की याद


भगतसिंह का एक दुर्लभ फोटो : गूगल से साभार
आज भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरू का शहादत दिवस है। शहीदों को सलाम। मैं बचपन से ही भग‍तसिंह से बहुत प्रभावित रहा हूं। उनकी जीवनी और कहानी तो यहां-वहां पढ़ने में आती ही रही है। उन पर बनी पर दूसरी ‘शहीद’ फिल्‍म जिसमें मनोज कुमार ने भगतसिंह का रोल किया था, अभी भी स्‍मृतियों
में है। (पहली ‘शहीद’ फिल्‍म में दिलीप कुमार ने यह रोल किया था।)  उसका एक गाना, ‘मेरा रंग दे बसंती चोला’ मुझे आज भी पूरा याद है। मुझे जहां मौका मिलता था, मैं इस गाने को अवश्‍य गाता था। भगतसिंह के बारे में जो भी किताब मिलती उसे पढ़ता था। उनके लेख 'मैं नास्तिक क्‍यों हूं।' ने भी बहुत प्रभावित किया।  
*
जब कविता लिखना शुरू किया तो भगतसिंह के जीवन पर एक लम्‍बी कविता लिखने की योजना बनाई। कुछ पन्‍ने लिखे भी। पर फिर पता नहीं क्‍या हुआ कि वह कॉपी ही खो गई। दुबारा चाहकर भी नहीं लिख पाया।
*
होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम मप्र की लगभग एक हजार माध्‍यमिक शालाओं में तीस साल (1972-2002) तक चला। उसकी पाठ्यपुस्‍तक ‘बालवैज्ञानिक’ के तीसरे कवर पर कई वर्षों तक भगतसिंह द्वारा कहा हुआ एक कथन प्रकाशित किया जाता था। कार्यक्रम का उद्देश्‍य था बच्‍चों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करना। विज्ञान की किताब में भगतसिंह का कथन देखकर कुछ लोगों को अजीब-सा लगता था। पर इसके पीछे एक गहरी सामाजिक समझ थी। कार्यक्रम को संचालित करने के लिए ही एकलव्‍य संस्‍था का गठन हुआ था, जिसमें मैंने पच्‍चीस साल काम किया। भग‍तसिंह के इस कथन के मेरे लिए आज भी बहुत मायने हैं। शायद आपके लिए भी हों-

'''आप प्रचलित विश्‍वास का विरोध करके देखें, आप निष्‍कलंक अवतार समझे जाने वाले किसी नायक, किसी महान पुरुष की आलोचना करके देखें। आपके तर्क का जवाब आपको घमंडी कहकर दिया जाएगा। इसका कारण मानसिक जड़ता है।

आलोचना और स्‍वतंत्र ढंग से सोचना क्रांतिकारी के दो मुख्‍य अनिवार्य गुण होते हैं। वे महान हैं,इसलिए उनकी कोई आलोचना न करे, वे उससे ऊपर उठ चुके हैं, इसलिए वे राजनीति या धर्म, अर्थव्‍यवस्‍था या सदाचार के बारे में कुछ भी कहें तो वह सही होता है। आप मानते हों या न मानते हों, लेकिन आपको यह जरूर कहना पड़ेगा,हां, यह बात ठीक है। ऐसी मानसिकता हमें न सिर्फ प्रगति की ओर नहीं ले जाती है बल्कि यह तो स्‍पष्‍ट तौर पर प्रतिगामी(मानसिकता) है।

एक क्रांतिकारी सबसे अधिक तर्क में विश्‍वास करता है। वह केवल तर्क और तर्क में ही विश्‍वास करता है।''                                   0 भगतसिंह   

Monday, March 7, 2011

मिलना सुधा भार्गव से


पिछले दिनों बंगलौर में एक और ब्‍लागर से मुलाकात हुई। वे हैं सुधा भार्गव ‘दृष्‍टा’। असल में उनसे मिलवाने का श्रेय जाता है जनगाथा और कथायात्रा के बलराम अग्रवाल जी को। बलराम जी से मुलाकात पिछले अक्‍टूबर में हुई थी। वे बंगलौर यात्रा पर थे। उन्‍हें मेरा सूत्र  सहज साहित्‍य के रामेश्‍वर काम्‍बोज जी ने दिया था।
बलराम जी ने मुझे सुधा जी का फोन नम्‍बर दिया था और कहा था कभी बात कर लूं। बात आई गई होगी। फिर एक दिन बलराम जी का मैसेज आया कि सुधा जी के पति नहीं रहे। मैंने सोचा अब तो फोन कर ही लूं। पर फिर एक संकोच में रह गया कि मैं उन्‍हें जानता नहीं हूं और वे भी मुझे नहीं जानतीं। एक-दो दिन तो इसी दुविधा में उलझा रहा और फिर भूल गया। 3 मार्च की शाम को सुधा जी का ही फोन आ गया, मुझे खोजते हुए। बलराम जी ने मेरा नम्‍बर उन्‍हें भी दिया था। मुझे शर्मिन्‍दा तो होना ही चाहिए ,सो हुआ और सबसे पहले उनसे माफी मांगी। भार्गव जी के नहीं रहने पर अफसोस जताया।
मैंने उनसे कहा, ‘मुझे आपको फोन करना चाहिए था।’
उन्‍होंने पलटकर तुरंत पूछा, ‘तो फिर किया क्‍यों नहीं?’
‘भूल गया।’ मैंने सरलता से जवाब दिया।
उनका प्रत्‍युत्‍तर भी उतना ही सरल था, ‘चलो कोई बात नहीं। मैं आपसे मिलना चाहती हूं।’
मैंने कहा, 'मैं शनिवार को आता हूं। उस दिन मेरी छुट्टी होती है।
वे बोली, ‘शनिवार को तो मैं लगभग महीने भर के लिए दिल्‍ली जा रही हूं।’
मैंने कहा, ‘तो मैं शुक्रवार को ही आ जाता हूं।’
 *
सुधा जी सरजापुर रोड पर एक बहुमंजिली आवासीय परिसर में रहती हैं। 12 फरवरी की सुबह-सुबह भार्गव जी चले गए। पिछले कुछ सालों से वे पार्किन्‍सन से पीडि़त थे। सुधा जी बताती हैं कि वे चिकित्‍सा के लिए ही दिल्‍ली से बंगलौर शिफ्ट हुए थे। पर वे इस बीमारी से उबर नहीं पाए। सुधा जी उनकी देखभाल करती थीं। भार्गव जी नहीं रहे, पर सुधा जी इस फ्लैट में ही रहना चाहती हैं। वहीं पास के एक अन्‍य फ्लैट में उनका छोटा बेटा और बहू रहते हैं। वे उनकी हर जरूरत का ख्‍याल रखते हैं। सुबह-शाम साथ ही होते हैं। उनकी बहू ने मेरे लिए भी नाश्‍ते में ढोकले और समोसे का
इंतजाम किया था। चाय सुधाजी ने खुद बनाकर पिलाई और एक बार नहीं दो बार।
 *
मैं उनके साथ लगभग दो घंटे रहा। इन दो घंटों की मुलाकात के बाद मुझे महसूस हुआ कि मैं उनसे पहले ही क्‍यों नहीं मिला। साहित्‍य लेखन की उनकी सुलझी हुई समझ जानकर मुझे बहुत अच्‍छा लगा। वे कम लिखती हैं, लेकिन ऐसा लिखती हैं जिससे पहले लेखक के तौर पर खुद संतुष्‍ट हों। किसी भी रचना को लिखने में वे जल्‍दबाजी नहीं करना चाहतीं। भार्गव जी का निधन हुए बहुत दिन नहीं हुए हैं। पर सुधा जी ने अपने आपको आगे की जिन्‍दगी के लिए जिस तरह तैयार कर लिया है, वह देखकर उनकी जीवटता का आभास होता है। बातों बातों में ही उन्‍होंने बताया कि 11 फरवरी की रात को भार्गव जी कुछ असहज महसूस कर रहे थे। उनका बड़ा बेटा लंदन में है,सो स्‍काइप पर उन्‍होंने बेटे को उनकी हालत से अवगत कराया। फिर भार्गव जी को नींद आ गई। सुधा जी का मन नहीं माना तो वे उनके पास ही लैपटॉप लेकर बैठ गईं। वहीं बैठे-बैठे ही उन्‍होंने बालकुंज ब्‍लाग बना डाला। सुबह चार बजे तक वे जागती रहीं।
 *
जीवन के सातवें दशक को जी रहीं सुधा जी कलकत्‍ता के बिरला हाईस्‍कूल में 22 साल तक हिन्‍दी की अध्‍यापिका रही हैं। अपने विद्यार्थी जीवन से ही उन्‍हें कविता करने का शौक था। विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताएं,कहानी,मुक्‍तक प्रकाशित होते रहें हैं। उनका एक कविता संग्रह इन दिनों प्रेस में है। 2002 में उनका पहला कविता संग्रह ‘रोशनी की तलाश में’ आया था। वह उन्‍होंने मुझे सप्रेम भेंट किया। उनके तीन ब्‍लाग हैं- बचपन के गलियारे, तूलिका सदन और बालकुंज । बालकुंज पर वे बच्‍चों के लिए कहानियां लिखना चाहती हैं। वे चाहती हैं कि कहानियों पर बच्‍चे प्रतिक्रिया दें और बताएं कि उन्‍हें कहानी कैसी लगी। वे कैसी कहानी पढ़ना चाहते हैं। अगर आपके घर में बाल पाठक हैं तो उन्‍हें इस ब्‍लाग से परिचित कराएं और प्रतिक्रिया देने के लिए कहें। जिन्‍हें भी बचपन की यादों में विचरना अब भी अच्‍छा लगता हो, उन्‍हें सुधा जी का ब्‍लाग बचपन के गलियारे जरूर देखना चाहिए।  
 *
आठ मार्च को उनका जन्‍मदिन है और संयोग से महिला दिवस भी। इस अवसर पर उनके संग्रह से उनकी तीन कविताएं प्रस्‍तुत हैं जो उनके नारी मन की सशक्‍त अभिव्‍यक्ति हैं।

एक छतरी
घर से निकली बाहर
लगे मंडराने
इर्द-गिर्द मेरे
बादल काले।

गरज-गरज कर चाहा
अलापना
अपना ही राग उन्‍होंने
और कर दिया मुझे
उपेक्षित,गूंगा और अशक्‍त।

तभी
नजर आई एक छतरी
मेघों के आगे
लगती थी वह
बौनी।

पर
मेरे लिए वह थी
आत्‍मविश्‍वास की एक छत
जिसके नीचे खड़े होकर
मैं हो गई सशक्‍त।
 *
पराश्रित
मुझसे मांगी रोशनी
मैं बन गई सूर्य
मुझसे मांगी चांदनी
मैं बन गई चंद्र
मुझसे मांगा अमृत
मैं बन गई वर्षा।

पर
जब मैंने
उनका नहीं
अपना ही अपने लिए
मांगा कुछ समय
तो भूचाल आ गया

और मैं
अचला
उनकी मजबूरी पर
हंसने लगी
मुझे आश्रिता समझने वाले
खुद पराश्रित थे।
*
नीलांबर
तुम आओ न आओ
मैंने शुरू कर दिया है
चलना,
नहीं देखूंगी पीछे मुड़कर
होती है टीस,
मगर कोहरे के बाद ही तो
छंटते हैं बादल
और साफ होता है
नीलांबर।
*
सुधा जी जन्‍मदिन बहुत-बहुत मुबारक हो।
*
आप उन्‍हें मुबारक बाद उनके ब्‍लाग तूलिका सदन पर जाकर भी दे सकते हैं।
                                0 राजेश उत्‍साही


Tuesday, March 1, 2011

हम भी हैं वर्ल्‍ड कप में


क्रिकेट वर्ल्‍ड कप का बुखार हर खेलप्रेमी पर चढ़ा हुआ है। हम भी इसके शिकार हैं। शिकार भी कुछ इस तरह हुए कि इस पर एक कविता ही लिख डाली। रूमटूरीड नाम की एक अन्‍तर्राष्‍ट्रीय संस्‍था है, जो बच्‍चों के लिए पुस्‍तकें और पुस्‍तकालय उपलब्‍ध करवाने के लिए बड़े पैमाने पर काम कर रही है। इस वर्ल्‍ड कप में रूमटूरीड भी शामिल है। आयोजकों और रूमटूरीड के बीच कुछ ऐसा तालमेल हुआ है कि वर्ल्‍डकप में लगने वाले हर छक्‍के पर रूमटूरीड को पच्‍चीस हजार रूपए मिलेंगे। इस राशि को बालिकाओं के लिए किताबें उपलब्‍ध करवाने पर व्‍यय किया जाएगा।

रूमटूरीड के साथ मेरा पुराना संबंध रहा है। रूमटूरीड ने मेरी कविताओं के चार पोस्‍टर,एक कहानी और एक फिल्‍प बुक प्रकाशित की है। ये सब बच्‍चों के लिए हैं और मैं बच्‍चों के लिए लिखे जाने वाले साहित्‍य पर काम करता रहा हूं। मेरी 30 साल की कामकाजी जिन्‍दगी के 20-22 साल इसी में गुजरे हैं। जिसमें से 17 साल तो मैंने चकमक,बालविज्ञान पत्रिका के संपादन में ही जिये हैं।

वर्ल्‍ड कप शुरू होने को था तो रूमटूरीड में विचार बना कि क्‍यों न एक ऐसा कविता पोस्‍टर प्रकाशित किया जाए जिसमें वर्ल्‍ड का शुभंकर स्‍टंपी भी हो। रूमटूरीड में कार्यरत मेरी मित्र रंजना ने मुझे फोन किया और ऐसी एक कविता का आग्रह किया। समय कम था। पर जैसी कि कहावत है जहां न पहुंचे रवि,वहां पहुंचे कवि। तो हम भी रवि तो नहीं चांद पर जा पहुंचे। कविता लिख भेजी।

कुछ दिन चुप्‍पी छाई रही। फोन करके पूछा तो पता चला कि वह तो चुन भी ली गई है और अभी उसके फ्लैक्‍स बन रहे हैं जिन्‍हें भारत-इंग्‍लैंड मैच के दौरान बंगलौर में 27 फरवरी को प्रदर्शित किया जाएगा। पोस्‍टर बाद में छपेगा। लो जी हम 27 फरवरी को मैच के दौरान टीवी पर आंखें गड़ाए बैठे रहे कि कहीं अपनी कविता नजर आ जाएगी। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ।


अब पता चला है कि रूमटूरीड ने अपना स्‍टाल वहां लगाया था जहां टीमें ठहरी थीं। तो आप भी देखिए उस अवसर के फोटो। प‍हले फोटो में रूमटूरीड की कंट्री डायरेक्‍टर सुश्री सुनिशा आहूजा भारतीय क्रिकेट टीम के सदस्‍य  विराट कोहली को रूमटूरीड के बारे में बता रहीं हैं, साथ में हैं कुछ बालिकाएं और अन्‍य लोग। दूसरे फोटो में विराट कोहली कविता के फ्लैक्‍स पर हस्‍ताक्षर कर रहे हैं। कुछ और फोटो यहां देख सकते हैं। हां फ्लैक्‍स में हमारा नाम खोजने की कोशिश न करें क्‍योंकि वह स्‍टंपी(हाथी) के चित्र के समानांतर आड़ी पंक्ति में लिखा है जो यहां नजर नहीं आ रहा। यहां अपना हाल मैदान में बैठे हजारों दर्शकों में से एक जैसा ही है। पर खुशी यही है कि अपन वहां हैं।

तो यह रही कविता-
हाथी बोला भालू से
क्रिकेट खेलें आलू से
भालू नारियल लाया
हाथी ने शॉट जमाया
नारियल गया चांद पर
दुनिया सारी फांद कर
चांद एकदम सफेद झक
जैसा अपना वर्ल्‍ड कप
                                                           0 राजेश उत्‍साही
(फोटो आईसीसी वेबसाइट के सौजन्‍य से)